आँखें बंद करके गहरी साँस लेकर
सुंदरता को दिल में उतरने देना चाहिए
ख़ुद के मन में सुंदर वाक्य उपजे
इसके लिए इतना जतन ज़रूरी है
गहरा हो मन में प्रेम
इसके लिए यह जतन ज़रूरी है
प्रेमी से मिलने के बाद
कुछ देर तक किसी से नहीं मिलना चाहिए।
• लवली गोस्वामी
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एक हिंदी लेखक का अनुभव-संसार प्राय: बहुत सीमित-संक्षिप्त होता है। यह पाया गया है कि वह तीस-पैंतीस-चालीस की उम्र तक आते-आते पूरी तरह व्यक्त हो जाता है। उसका श्रेष्ठ-श्रेष्ठतम, औसत-औसततम, निकृष्ट-निकृष्टतम—सब कुछ इस दरमियान ही तय हो रहता है। वह अगर अपवाद या लेट ब्लूमर [Late bloomer] न हो या उसके पास अगर प्रकाशित से ज़्यादा अप्रकाशित न हो तो वह इसके बाद बस स्वयं को दोहराता रहता है। यहाँ तक आते-आते अगर उसमें विकलताएँ शेष रह जाएँ तो वह कम लिखना और कम दिखना पसंद करता है और यहाँ तक आते-आते अगर वह अपनी विकलताएँ खो दे, तब वह एक बहुत ज़्यादा नज़र आने-खाने वाले जोकर या भालू में बदल जाता है।
• अविनाश मिश्र
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कृष्ण बलदेव वैद उन लेखकों में हैं, जिन्होंने भारत-पाक-विभाजन की यातना और याद का अपने जीवन और लेखन दोनों में ही सीधा साक्षात्कार किया। 6 फ़रवरी 2020 को न्यूयॉर्क [अमेरिका] में उनका देहांत हुआ। भाषा और कथ्य के इस उस्ताद ने अपनी डायरी में तन्हाई, ख़ामोशी, उदासीनता, अवज्ञा और अवहेलना को अपनी ज़िंदगी का हासिल क़रार दिया है। यहाँ पेश है, उनके मार्फ़त मुझे कभी न लिखा गया एक ख़त...
• अविनाश मिश्र @nayaashekhar
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संपादक होने के लिए एक उम्र वाक्यभक्ति में गुज़ारनी पड़ती है। यह इतना सहज नहीं है, जितना आजकल समझा जा रहा है। संपादन सेवानिवृत्ति के बाद का या अन्य सेवाओं के समानांतर चलने वाला शुग़्ल नहीं है। गए दिनों तीन हो रहे कवियों ने अपनी कविताएँ एक ऑनलाइन प्रकाशन-स्थल से यह कहकर हटवाईं कि इस उपक्रम के संपादक ने हमारे एक साथी की कविताओं-रचनाओं के साथ टेम्परिंग की है! अब ये तीन-चार जन बहुत ख़ुश-संतुष्ट हैं कि इनकी रचनाएँ अन्य नई जगहों पर बहुत करुण ढंग से, पर बग़ैर टेम्परिंग के जस की तस छप रही हैं। आजकल के ऑनलाइन संपादकों [?] का काम ही यही है, वह महज़ प्रस्तोता भर हैं और अपने जैसा सोचने-समझने वाले या अपने से सहमत दस-बारह लोगों की कथित रचनाओं का सफलतापूर्वक एक जगह ctrl+c — ctrl+v करते रहते हैं। इस प्रकार की चार पोस्ट डैशबोर्ड पर सबमिट/पब्लिश करते ही; वे सब जगह अपना परिचय बहुत गर्व-गुमान के साथ एक संपादक के रूप में देने लगते हैं, जबकि संपादन इन्होंने कभी अपनी रचनाओं तक का नहीं किया होता।
• अविनाश मिश्र
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