💔 चारों तरफ सिर्फ कीचड़… न कोई इंसान, न माँ की कोई आवाज़।
महज़ 2 साल का ये मासूम अपनी माँ से बिछड़कर अकेला खड़ा है… उसकी आँखें बस अपनी माँ को ढूंढ रही हैं। 😢
सोचिए, इस छोटे से बच्चे के दिल पर क्या गुजर रही होगी… 🥺
🙏 भगवान करे इसकी माँ इसे जल्द मिल जाए। इस वीडियो को ज्यादा स�� ज्यादा शेयर करें। ❤️
🇮🇳➡️🇳🇿 An Indian-origin woman in New Zealand asks a simple question: “Why are people leaving India?”
The accompanying voiceover points to the frustrations many cite ₹25 crore homes in Mumbai, potholes, traffic, pollution, political banners, corruption and unequal access to quality education.
Meanwhile, New Zealand is presented as a place where children in the same locality can attend government schools regardless of how rich their parents are.
The question isn't whether India has changed it has. The question is whether our cities and institutions can change fast enough to make people want to stay.
ए मां ए मां कहा हो....?
नेपाल जल प्रलय के बीच छोटा बच्चा रोते हुए अपनी मां आवाज दे रहा हैं....।
जिस जिस ने इस बच्चे के वीडियो को देखा आंखों में आंसू आ गए...!
हि��ालय की बर्बादी
हर हिमालयन डिजास्टर के बाद एक ही कहानी चलती है - जांच बैठती है, रिपोर्ट बनती है, सायरन लगाने का वादा होता है, बजट घोषित होता है।
और ठीक उसी समय उसी पहाड़ पर सड़कें चौड़ी की जाती हैं, हेलीपैड बनते हैं, रेलवे ऊपर चढ़ाई जाती है।
एक हाथ से हम पहाड़ का इलाज लिखते हैं और दूसरे हाथ से उसी के घाव को रेतते हैं।
समझिए कि हिमालय है क्या।
यह दुनिया के सबसे युवा पहाड़ हैं। भूगर्भ की दृष्टि से अभी बच्चे हैं - कमजोर, कच्चे, अनगढ़े।
इन्हें जोड़कर रखती है बर्फ, ग्लेशियर और परमाफ्रॉस्ट (यानी जमी हुई जमीन), जो ढलानों पर सीमेंट का काम करती है।
अब उस सीमेंट को गर्मी पिघला रही है, यानी पहाड़ पहले से ही कमजोर है।
और ऐसे में हम क्या कर रहे हैं? पर्यटन का मेला, चौड़े हाईवे ताकि SUV सीधी चोटी तक चढ़े, चार्टर्ड ब��ें और जैसे इतने से भी ना हो, उनके लिए पहाड़ काटकर हेलीपैड!
तीर्थ यात्री पहले पैदल चलता था, उसकी बात अलग है।
पर यह वो व्यवस्था है जो बिना चले, बिना श्रम के, बिना श्रद्धा के, भारी भीड़ को बेहद संवेदनशील इलाके में लाकर भर रही है।
और इस सब का नाम रखा है 'विकास'।
पिघलते पहाड़ में बनाई गई हर एक नई सड़क पहले से घायल शरीर पर एक और घाव है।
और हम उसी को न्योता दे रहे हैं - आओ आओ, अपनी गाड़ियों पर। नदी है, बर्फ है, मैगी है, मौज है!
तो पहला ईमानदार कदम क्या होगा?
टोल गेट पर सच बोलना। हिमालय सस्ते पर्यटन की जगह नहीं है।
जो ऊपर जाएगा वो चढ़ाई की पूरी कीमत चुकाएगा, और पूरी कीमत में वह कीमत भी शामिल है जो पहाड़ चुकाता है।
हर चढ़ती सड़क पर भारी एंट्री फी हो, हर चढ़ते वाहन पर भारी टोल टैक्स हो।
यह दंड नहीं, न्याय है।
कोई कहेगा - यह तो तीर्थ को अमीरों तक सीमित करना हो गया?
नहीं, यह तीर्थ को तीर्थ रहने देना हुआ।
देवभूमि कहते हैं ना इन पहाड़ों को, देवताओं का घर।
तो सोचिए, घर में घुसने की मशीन बनाना भक्ति है या घर को गिरने से बचाना?
आज का असली धर्म हिमालय पर चढ़ना नहीं है, उसे बचाना है।
यह समय पहाड़ चढ़कर शेखी बघारने का नहीं है, नम्र होकर उसे बचाने का समय है।
वरना ���ह पहाड़ बंजर चट्टानों के विशाल स्मारक बन जाएंगे - गिरते हुए स्मारक, क्योंकि जो बर्फ इन्हें जोड़े रखी थी वही नहीं रहेगी।
आओ आओ, यही विकास है?
नहीं, यह मृत्यु है।
यह ऐसी व्यवस्था है जो बिना किसी मेहनत, विचार या समझ के भारी भीड़ को बेहद संवेदनशील इलाके में ला-लाकर भर रही है।
Almost every house around it was destroyed in Nepal flood.
So why did this one survive?
I looked closely at the flood footage and noticed something I can’t quite explain.
The main mudflow appears to be moving right → left at very high speed.
But the drum in front of the house is moving left → right — in the opposite direction, and much more slowly.
So I started wondering if there was some kind of return flow around the house.
The water appears to have moved around the house, through the narrow gap between the house and the tree, and then rejoined the main flow.
My hypothesis:
The house may have been sitting in a relatively protected part of this flow, while its concrete structure helped it withstand the remaining impact.
But here’s the part I can’t explain:
What created that opposite-direction flow in the first place?
Was it the house itself, the tree , the surrounding terrain or any obstruction further downstream?
Or maybe combination of all of them?
Some people will probably say “God saved this house.”
Maybe.
But there may also be a physics explanation hidden in this footage that we’re not seeing yet.
If someone understands this, I would genuinely love to know what happened here.
“1947 से अब तक पाकिस्तान की ISI के साथ मिलीभगत/जासूसी के 4,000 से अधिक मामले सामने आए हैं, और पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वालों में 20% से भी कम मुसलमान थे।
ISI ने मुसलमानों की तुलना में अधिक हिंदुओं को भर्ती किया है।”
— राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल
सुन लो अंधभक्तो ये बयान कोई विपक्षी नेता नहीं तुम्हारे पप्पा के सबसे ख���सम खास बोल रहे हैं।
इस देश में बेरोजगारी की क्या हालत है, अगर यह देखना हो तो कल आए हुए KBC का एपिसोड देखना चाहिए l यह एपिसोड आपको सोचने पर मजबूर कर देगा l
इस ��पीसोड में एक युवा hot सीट पर पहुँचता है जो दिहाड़ी मजदूरी करता है l उसके पिता भी दिहाडी मजदूरी करते हैं और उसकी माता भी काम करती है l
जब यह युवा 1 लख रुपए जीतता है तो अमिताभ बच्चन उसके पिता से पूछते हैं l अब तो खुश है आप ?
तो उसका पिता हाथ जोड़कर वहां बैठे हुए सारे दर्शकों से कहता है कि अगर यहॉँ बैठे लोगों के पास कोई भी छोटी सी नौकरी हो तो मेरे बेटे को दे दीजिए l जिंदगी भर आपके लिए दुआ करेंगे l
उसके पिता की भावुक अपील के बाद अमिताभ बच्चन ने भी अपने सभी दर्शकों से अपील की कि अगर आपके पास कोई नौकरी हो तो विवेक नामक इस युवा को दे l
इस पूरे संवाद के दौरान युवा विवेक चुपचाप नीचे सर झुका कर बैठा रहता है l अगर आप इस एपिसोड को देखेंगे तो सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि जो युवा ज्ञान के मंच केबीसी की hot सीट तक तो पहुंच सकता है लेकिन उसे एक छोटी सी नौकरी इस देश में नहीं मिल सकती है l