अयोध्या में श्रीराम मन्दिर से चढ़ावे की हुई चोरी, ग़बन व हेराफेरी आदि करने की मीडिया में आएदिन क़िस्म-क़िस्म की आ रही ख़बरें अति-गम्भीर व चिन्तनीय। ऐसे लोग क़तई भी बख़्शे नहीं जाने चाहिये, लेकिन इस मामले का राजनीतिकरण करना भी ठीक नहीं।
साथ ही, अब यहाँ मन्दिर में श्रद्धा के चढ़ावे आदि में आगे कोई भी शिकायत ना आये, इसके लिए देश के दूसरे विख्यात व प्रसिद्ध मन्दिरों में चढ़ावे आदि के हिसाब-किताब के लिए जो वहाँ व्यवस्था है तो उनका यहाँ अयोध्या में भी अनुशरण करके इस प्रकरण को जल्दी ही सुलझाना चाहिये तो यह उचित होगा।
इतना ही नहीं बल्कि देश में राजनीति का अपराधीकरण व अपराध का राजनीतिकरण तथा धर्म का राजनीतिकरण एवं राजनीति का अंध धर्मीकरण ना किया जाये तो यह सही व संवैधानिक होगा, ऐसी बी.एस.पी. की राजनीतिक पार्टियों को देश व जनहित में सलाह और साथ ही देशवासियों से भी यह अपील।
राम मंदिर चढ़ावा केस में नया मोड़, सवालों के घेरे में गोपाल राव की भूमिका। ट्रस्ट पर फुल कंट्रोल। "बाप जी" वाली भूमिका में रहते थे।
अयोध्या में राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण में अब गोपाल राव की भूमिका चर्चा के केंद्र में आ गई है। गोपाल राव ट्रस्ट में किसी घोषित पद पर नहीं हैं, लेकिन मंदिर प्रबंधन में उन्हें चंपतराय के बाद दूसरा सबसे प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है। कर्नाटक के मूल निवासी गोपाल राव पूर्व में संघ के प्रांत प्रचारक रहे हैं और वर्तमान में विहिप के केंद्रीय सह मंत्री हैं। जानकारों के मुताबिक मंदिर के आयोजनों, भोग सामग्री, पुजारियों के प्रबंधन, दर्शन-आरती पास और भूमि खरीद जैसे अहम कामों में उनकी सीधी या परोक्ष भूमिका रही है। बड़ा सवाल यही है कि जब ट्रस्ट में उनकी भूमिका आधिकारिक रूप से स्पष्ट नहीं थी, तब राम मंदिर की इतनी महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं उनके प्रभाव में कैसे चलती रहीं? चढ़ावा चोरी प्रकरण की जांच के बीच गोपाल राव का नाम अब सबसे अहम किरदारों में गिना जा रहा है।
#Rammandirscam #Ayodhya @ChampatRaiVHP@dmayodhya@UPGovt@CMOfficeUP@ShriRamTeerth@ayodhya_police@Adv_Anil_Mishra@Uppolice@LucknowDivision
एक भ्रष्ट सिस्टम बनता है भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों(IAS,IPS,Doctors, Engineers etc etc),बाबुओं,पत्रकारों की मिलीभगत से... आज भी शायद इस पूरे सिस्टम में 25-30% ईमानदार लोग होंगे लेकिन वो स्वार्थ/डर से चुप बैठे रहते हैं..अगर अब भी इन सब ईमानदार लोगों ने एकजुट होकर अपने ही सिस्टम के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई तो देश की पूरी तरह से बर्बादी तय है..अपने निजी स्वार्थ और डर से ऊपर उठकर सबको बोलना होगा..हम सब इस भ्रष्ट सिस्टम का ही हिस्सा तो हैं..
#IndiaNeedsWhistleblowers
Indian twitter was doing very well in countering that Marxist journalist until Ambassador Sibi George came.
MEA should start a new training module for these babus, it was embarrassing to listen to him.
Could have handled better.
CM Suvendu Adhikari will retain Bhawanipore and leave the Nandigram seat. There's plan to bring in a most abled Finance Minister, given State's dire condition— There's a ₹8lakh crore in Debt, continuous Revenue Deficits, BJP will look for a full Corporate experienced individual to fit the role.
@BJP4India Leave such analysis for the psephologists. There is no upside for dividing communities and deriving some kind of conclusion. It was a vote to eradicate a despot. Respect that, and work hard to repay the trust people of WB has put in you. We have faith 🙏
ये तेजस्वी पत्रकार अजीत साही ने लिखा है और बहुत कम शब्दों में भारतीय राजनीति और राजनेताओं और मूर्ख लोगों का शानदार वर्णन किया है।
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राघव चड्ढा बीजेपी में शामिल हो गया है. मुझे पंद्रह साल पहले का एक वाकया याद आ रहा है.
2011 में अन्ना हज़ारे ने जंतर मंतर पर अनशन शुरु किया. देश को लगा भ्रष्टाचार अब जल्द ख़त्म हो जाएगा. हज़ारों की भीड़ जमा हो गई. क्रांति को नाम मिला India Against Corruption. नामी गिरामी एक्टिविस्ट, वकील, बाबा, पत्रकार, एक्टर, कॉमेडियन, आर्टिस्ट और न जाने कौन कौन उसमें शामिल हो गए. मेरी एक मुंहबोली बहन भी उनमें थीं. मैं ख़ुद तो वहाँ कभी नहीं गया. उन्होंने मुझे कहा, “अन्ना गांधी हैं और अरविंद नेहरू हैं.”
कुछ हफ़्तों बाद आग्रह कर उन्होंने मुझे महाराष्ट्र भवन में मुझे अन्ना हज़ारे से मिलवाया.
एक दिन मैंने बहन से कहा: “आप इस मूवमेंट में अपनी जगह पुख़्ता कर लें. कल ये एक पार्टी बनेगा. आप चांदनी चौक लोकसभा का टिकट लें. आपको मुसलमान और हिंदू दोनों वोट देंगे. बस बीजेपी से समझौता करना होगा वो अपना उम्मीदवार न खड़ा करें.”
बहन को बात नागवार गुज़री. बोलीं, “मुझे अफ़सोस है कि आप इतने सिनिकल हैं. अन्ना और अरविंद पार्टी बनाने की सोच भी नहीं सकते हैं. हम इंडिया बदलने निकले हैं. आपकी सोच बहुत छोटी है. ये एक दूसरी आज़ादी है. वी आर मेकिंग हिस्ट्री.”
मुझे बरबस बचपन और जवानी का ख़याल आ गया.
मैं ग्यारह साल का था जब इमरजेंसी ख़त्म हुई थी. 1977 में जब इंदिरा गाँधी चुनाव हारीं और जनता पार्टी चुनवा जीती तो पूरे मुहल्ले में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. मैं भी इस ख़ुशी में दीवाना हो गया.
ढाई साल बाद 1980 में जनता पार्टी की सरकार गिरी और इंदिरा गाँधी चुनाव जीत गईं. पूरे मुहल्ले में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. मैं भी इस ख़ुशी में शामिल हो गया.
फिर 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या हो गई. दो महीने बाद लोकसभा चुनाव हुआ. इलाहाबाद से अमिताभ बच्चन ने चुनाव लड़ा. मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ता था. सिविल लाइंस जाकर मैंने खादी का नया कुर्ता पैजामा ख़रीदा और अमिताभ बच्चन की कैंपेनिंग में लग गया.
चुनाव से चौबीस घंटे पहले एक जीप में छंटे हुए कांग्रेसी गुंडों के साथ मुझे गांवों की ओर भेज दिया गया. मैंने वहाँ बूथ मैनेजमेंट का पावन अनुभव किया.
आधी रात खेतों के बीच घुप अंधेरे में कच्ची सड़क पर दो जीपें आमने सामने रुकीं. मैं अपनी जीप में बैठा रहा. मेरी जीप के गुंडे और दूसरी जीप के गुंडे जीपों की हेडलाइट में गुटखा खाते बातें करते रहे. फिर दूसरी जीप पर से विपक्षी पार्टी का झंडा उतर गया. आवाज़ लगा कर मुझे कांग्रेस का झंडा लाने को कहा गया. उसे दूसरी जीप पर लगा दिया गया. फिर दोनों जीपें अपने अपने अपने रस्ते निकल लीं.
राजीव गाँधी ने बंपर जीत हासिल की. अमिताभ बच्चन ने भी. तब तक मेरा परिवार ननिहाल छोड़ कर सरकारी अफ़सरों के मुहल्ले में रहने लगा था. इस मुहल्ले में भी ख़ुशी की लहर दौड़ गई. मैं भी इस ख़ुशी में शामिल हो गया.
फिर 1989 आया. अब मैं दिल्ली के इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में रिपोर्टर की नौकरी कर रहा था. देश जान गया था कि राजीव गाँधी भ्रष्ट है. देश ये भी जान गया था कि वी पी सिंह देवता है. राजीव गाँधी हार गया. वी पी सिंह जीत गया. जिस मुहल्ले में मैं रहता था वहाँ भी ख़ुशी की लहर दौड़ गई.
ख़ैर.
जैसा कि मैंने अपनी मुंहबोली बहन से कहा था, India Against Corruption से पार्टी निकली. उस मकाम पर केजरीवाल ने अन्ना हज़ारे को थैंक्यू बोल दिया. मेरी बहन गाँधी को छोड़ कर नेहरू के साथ चली गईं. तमाम और लोगों ने भी यही मुश्किल फ़ैसला लिया.
उस दौर में पार्टी के एक दूसरे भारी नेता थे. मैं उनकी तब भी और आज भी इज़्जत करता हूँ. उन्होने मुझे घर बुलाया. केजरीवाल भी थे. दोनों बोले हम पार्टी शुरू कर रहे हैं और एक खोजी पत्रकारिता की वेबसाइट बना रहे हैं. तुम हमारे साथ आ कर उसे चलाओ. विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़ कर मैंने बताया मैं इस नेक काम के काबिल नहीं हूँ. बाद में नेहरू ने उन दूसरे नेता को भी पार्टी से निकाल दिया.
मेरी बहन ने भी वक़्त आने पर नेहरू को छोड़ दिया. आज वो पार्टीगत राजनीति की माननीय सदस्या हैं. मेरी मनोकामना है कि देर से ही सही, उनको संसद की सदस्यता मिलनी चाहिए. और ऐसा क्यों न हो?
अगर आप सोच रहे हैं कि इस कहानी का कोई क्लाइमेक्स है तो मैं माफ़ी चाहता हूँ, इस कहानी का कोई क्लाइमेक्स नहीं है. भारतीय समाज जिस रुआब से अपनी पीठ थपथपाता है दरअसल वो भीतर से उतना ही खोखला और लचर है. हम उस मरीज़ की तरह हैं जो दुनिया से जानलेवा मर्ज़ छुपा कर सोचता है कि कोई मर्ज़ है ही नहीं.
लेकिन दुनिया जानती है कि मर्ज़ लाइलाज है. पूरा भारतीय समाज राघव चड्ढा है.
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