वैदपुरा (नोएडा) की रियासत के स्वघोषित राजकुमार सचिन पायलट के इर्द-गिर्द भीड़ को हटाते ये युवा कोई भीड़ मैनेज करने के लिए किराए पर लाए बाउंसर नहीं हैं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की कसौटी पर खरे उतरे लाडनूं के दो बार के विधायक, पूर्व युवा कांग्रेस अध्यक्ष और राजस्थान NSUI के पूर्व अध्यक्ष मुकेश भाकर हैं। लाडनूं के सर्वसमाज—विशेषकर कांग्रेस के दलित, मुस्लिम और जाट वर्ग—ने एकतरफा उन्हें अपना विश्वास देकर सदन में भेजा है। जब एक लोकतांत्रिक प्रतिनिधि को सार्वजनिक रूप से या सोशल मीडिया रील बनाने के लिए 'राजकुमार' के चरणों में झुकने को विवश किया जाता है, तो यह केवल मुकेश भाकर का नहीं, बल्कि लाडनूं की उस जनता का अपमान है जिसने उन्हें अपना सिरमौर बनाया है।
मुकेश भाकर के साथ आज केवल एक राजनीतिक पद नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से जाट और मीणा समाज का वह सामाजिक गौरव और पुत्रवत स्नेह जुड़ा है, जिसे वैदपुरा (नोएडा) के राजकुमार के PA द्वारा बंद कमरों में राजनीतिक धमकियों या सार्वजनिक रैली में गला पकड़कर धक्के देने जैसी सामंती हरकतों से नहीं झुकाया जा सकता। सचिन पायलट को यह समझना होगा कि राजनीति जनसेवा का माध्यम है, व्यक्तिगत वैभव के प्रदर्शन का नहीं। यदि लोकतांत्रिक व्यवस्था के विधायकों और सामाजिक प्रतिष्ठा वाले जननेताओं एवं युवाओं को 'चरणवंदना' के लिए विवश करने की यह परिपाटी जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब कांग्रेस समर्थक स्वाभिमानी किसान, दलित, मुस्लिम और आदिवासी वर्ग टोंक की गलियों में इसका हिसाब मांगेगा।
अगर स्वाभिमान के स्थान पर केवल 'राजकुमार' की छवि को ही प्राथमिकता दी गई, तो आगामी समय में जनता ऐसे नेतृत्व को नकार कर उन्हें उनकी वास्तविक रियासत—वैदपुरा के सुरक्षित कमरों तक ही सीमित कर देगी। लोकतंत्र में जनता का प्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह होता है, किसी 'रियासत' के प्रति नहीं।
@Khalbaali@RahulGandhi@kharge@kcvenugopalmp@SachinPilot@MukeshBhakar_@GovindDotasra@TikaRamJullyINC@INCIndia@INCRajasthan
रावण भी ब्राह्मण ही था, आप भी ब्राह्मण ही है और समय रैना भी ब्राह्मण ही हैं
आपकी जातिगत जनगणना के खिलाफ लड़ाई है, आप अकेले लड़ें क्योंकि न तो लंकाई पंडित और न ही कश्मीरी पंडित इस लड़ाई में आपके साथ हैं, उनके मुद्दे अलग हैं 🙂
@PRMundru@AsindTeam Maali to Vidhan Sabha mein Gehlot ke kehne pe vote dete kise harana kise jitana aur fir Lok Sabha mein Sab BJP ko dete hain....Dogle
फिर भी गद्दार कैबिनेट में शामिल किए गए,
और वफ़ादार महेश जोशी टिकिट कटवा जेल में गए
जुगल काबरा तो वफ़ादारी निभाते जेल के बाद दुनिया छोड़ गए
संयम लोढ़ा , बाबूलाल नागर, महादेव सिंह, आलोक बेनीवाल तो टिकिट ना दिलवाने के बाद भी वफ़ादारी निभाते रहे
केवल छात्र संघ अध्यक्ष रहे अनिल चौपड़ा लोकसभा की टिकिट पा गए और दशकों से वफ़ादार डूडी परिवार के वारिस मानेसर संकटमोचन चेतन डूडी तो नागौर लोकसभा में कंसीडर तक नहीं किए गए
45 साल साथ रहे रग-रग से वाक़िफ़ रामेश्वर दाधीच, सुनील परिहार का त्याग तो एन चुनाव से पहले जवाब दे गया।
पुखराज पाराशर,धर्मेंद्र राठौड़, संदीप चौधरी, पवन गोदारा भले ही नारद बनकर कितनी ही महत्वपूर्ण सूचनाएं ले आए पर इनको विधानसभा लोकसभा की चौखट नसीब नहीं होने दी
मैंने हमेशा यही कहा है, फिर से कह रहा हूं कि अशोक गहलोत जादूगर नहीं बल्कि कठपुतली राजनेता हैं जिन्हें एक वर्ग अपने हितों की रक्षा के लिए मुख्यमंत्री कुर्सी पर बैठाकर रखता था और अब उस वर्ग को इनकी जरूरत खत्म हो गई है, लंबे इंतजार के बाद उन्हें अपनी पार्टी बीजेपी में अपनी मजबूत स्थिति वाली जगह मिल गई है।
इसलिए अब गहलोत जी का खेल उस वर्ग ने ही खत्म कर दिया है जिसने इन्हें कठपुतली बनाकर बैठाए रखा था, जिसकी शुरूआत काफी पहले हो चुकी थी।
आज भी हकीकत यही है कि अशोक गहलोत अपनी राजनीति को लगभग खत्म करने के बाद भी उसी वर्ग की कठपुतली बनकर खत्म होते जा रहे हैं और कांग्रेस को खत्म करने में सहयोग कर रहे हैं, जो कि बहुत ही घातक राजनीतिक स्थिति में पहुंच चुके हैं।
अगर छोटी सी सलाह सुनी और मानी होती तो आज कांग्रेस को मजबूत करने के साथ राजस्थान में सब से मजबूत वोट बैंक वाले नेता अशोक गहलोत होते और कठपुतली से निकल कर स्वतंत्र राजनेता होते, वैभव गहलोत का खुद की हैसियत एवं मेहनत से बनाया हुआ सुनहरा राजनीतिक कैरियर होता, राजनीतिक गलियारों में वैभव गहलोत की अलग इज्जत होती।
(नोट: जातिवाद करने और राजनीति एवं प्रशासनिक तंत्र में जातिवाद करने वालों को एक्सपोज करने, विरोध करने में फर्क होता है, इसलिए राजनीतिक विश्लेषण इतिहास एवं समसामयिक मुद्दों पर ऊपर से नीचे तक की स्थिति देखकर समझने का प्रयास करें न कि एक्सपोज करने वालों पर ही सवाल कर लें)
अशोक गहलोत जी ने
एक बार भी नहीं कहा कि मैंने सोनिया गांधी जी के साथ विश्वासघात किया और 25 सितम्बर, 22 को एक लाईन के प्रस्ताव की मीटिंग करवाने की जगह पीसीसी चीफ को लेकर तनोट चला गया।
25 सितम्बर से पहले सोनिया जी से उनकी बातचीत होने के बाद भी उन्होंने सोनिया जी का भरोसा तोड़ा।
बीजेपी विधायक बालमुकुंद आचार्य 🙂
जब वो बाबा साहेब के विचारों को समर्थन नहीं कर पाते हैं तो विचारों को मिटाने, खत्म करने के लिए पाखंडी सिस्टम घुसाने में लग जाते हैं।