दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं
- राजेश रेड्डी
कुछ पंक्तियां ज़िंदगी की हक़ीक़त बन जाती हैं
जैसे साहिर की ये
“चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों”
ऐसे शब्दों को जीने की लोग हिमाक़त नहीं करते,
पर मैं तो इन्हीं पे मरता हूँ
एक अजीब दिन
आज सारे दिन बाहर घूमता रहा और कोई दुर्घटना नहीं हुई। आज सारे दिन लोगों से मिलता रहा और कहीं अपमानित नहीं हुआ। आज सारे दिन सच बोलता रहा और किसी ने बुरा न माना। आज सबका यकीन किया और कहीं धोखा नहीं खाया।
हम सबके पास एक कहानी होती है, जो हमें सच ठहराती है. वो भले ही सच न हो, पर बार बार दुहराने के बाद वो हमारे लिए सत्य बन जाता है। और उस सत्य के मानदंड पर जीते जीते हम और चूकते जाते हैं, रीतते जाते हैं। मगर न तो सत्य हमारा होता है, न तो सत्य के हम होते हैं. क्या आपका भी सत्य ऐसा है?