हे निराकार आपको कोटि कोटि धन्यवाद प्रणाम नमस्कार बारम्बार। आप देख रहे आपकी सृष्टि को मुझे दिखाई दे रहा मेरा संसार। आपकी सृष्टि में प्रेम और आनन्द ही आनन्द .......अतः आपको कोटि कोटि धन्यवाद प्रणाम नमस्कार बारम्बार हे निराकार। 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
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हे निराकार आपको कोटि कोटि धन्यवाद प्रणाम नमस्कार बारम्बार। आपकी कृपा से इस देह को एक और नई सुबह मिल गई। आपकी कृपा से ही इस देह का इस सृष्टि में अस्तित्व है और आपकी कृपा से ही सुबह हुई नयी....कोटि कोटि धन्यवाद प्रणाम नमस्कार बारम्बार आपको हे निराकार। 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
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जो देना है दे ऐ जिन्दगी मौज से मौज में होगी तेरी बंदगी। जब मैं कुछ नहीं तो क्यूं कहूं तु मेरी है ज़िन्दगी। मेरी उसकी नहीं तु तो बस हैं ज़िन्दगी। जो मान लें अपनी उसी की हो जाए ज़िन्दगी।
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महाभारत घटित हो रही सदा हम सब में ही। हमारा सत्य, बुद्ध स्वरूप कृष्ण तत्व ही। कौरव आसुरी प्रवृत्तियां है सभी पांडव दैवीय संपदा सही.....परन्तु इस बुद्धि विलास के प्रयास पर यह संजय आप सभी का मार्गदर्शन चाहेगा। धन्यवाद, राधे राधे जी 🙏🏻🙏🏻
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स्वयं की ओर जब कदम मैं बढ़ाऊंगा तो पाऊंगा स्थूल नहीं हूं मैं सूक्ष्म होता जाऊंगा। सूक्ष्मतम जब अपने को पाऊंगा तो कारण भी सभी गौण हो जायेगें, स्वयं को एकमात्र असीम् दृष्टा ही.......यहीं से प्रारंभ होगा और स्वयं ही स्वयं की ओर बढ़ता जाऊंगा। राधे राधे जी 🙏🏻🙏🏻
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पहचान यदि स्वयं ही स्वयं को स्वयं के प्रति यदि पूर्ण सजग हो पाऊंगा। तो स्वयं ही स्वयं को हर कर्म में श्रेष्ठता से उजागर कर पाऊंगा। विलग नहीं कहीं किसी..... सहज होगा सदा सबकुछ क्यों की स्वयं में स्वयं की सजगता को ही सहजता पाऊंगा। जी राधे राधे जी 🙏🏻🙏🏻
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मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, मैं क्या चाहता हूं, मेरा उद्देश्य क्या है, यह सब जाने बिना सजगता संभव नहीं.....सजगता यदि पूर्ण है तो लक्ष्य मेरे साथ ही खड़ा, इसे प्राप्त करने के लिए मुझे कुछ भी करना नहीं पड़ा। धन्यवाद राधे राधे जी 🙏🏻🙏🏻
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इस मानव देह को सत्य मानकर बहुत ही कठिन है, प्रकृति के या इस सम्पूर्ण अस्तित्व के पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर...परन्तु पता नहीं फिर मैं किस मैं को सबसे अलग केवल इस मैं को प्रकृति या इस सम्पूर्ण अस्तित्व का रखवाला बताता हूं। जी राधे राधे जी 🙏🏻🙏🏻
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मैं, यह , वह यानी सभी देह प्रकृति है, प्रकृति को ही समझाने के लिए। परब्रह्म एकमात्र स्वकृति है, प्रकृति को दर्शाने के लिए। विज्ञान प्रकृति में है, प्रकृति को ही समझा सकता है...... द्वारा स्व को जान स्व में स्वस्थित होना ही स्वधर्म है। राधे राधे जी 🙏🏻🙏🏻
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इस देह को सशक्त बनाना चाहता हूं। हां हां मैं अपने को अस्तित्व से अलग मान अस्तित्व की सारी शक्तियां पाना चाहता हूं। अपने भीतर के रावण को जिन्दा रख मैं...….मैं हूं बस मैं ही हूं यही भाव तो शुद्ध, शान्त, शाश्वत, सनातन परब्रह्म है। धन्यवाद राधे राधे जी 🙏🏻🙏🏻
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इस देह को सभी कुछ अस्तित्व से मिला है। निमित्त भले ही बनी हो यह देह अस्तित्व की क्रियाओं में परन्तु ऐसा कुछ नहीं जो इस देह ने...नहीं बदलनी मुझे मेरा स्वयं से बस एक ही प्रश्न है क्या मैं स्वयं को बदल सकता हूं? जी प्रणाम राधे राधे जी 🙏🏻🙏🏻
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मैं देह नहीं, न ही कोई विशेष देह है मेरी पर देह को दिखाई दे रही सब देह उकेरी। बस भेद यहीं से हुआ प्रारंभ और पल गया भ्रम एक देह मेरी, एक देह तेरी। जब तक है यह भ्रम, तब तक भ्रम का धर्म....यही तो सनातन और वेदों का सिखाना है। धन्यवाद राधे राधे जी 🙏🏻🙏🏻
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जब तक मैं ने अपने आप को कुछ भी माना हुआ है तब तक चलते रहने के अलावा और कोई चारा नहीं होगा। परन्तु मिथ्या मोह यदि मोहन में लीन हो गया तो न रहेगी कोई राह न ही कोई चलने वाला होगा। एक परम् तत्व... हमारा हम सबका नित्य, सत्य, चित्त बुद्ध स्वरूप होगा। 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
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भौतिक अस्तित्व इस मानव देह का है और यह देह इस सम्पूर्ण अस्तित्व का बहुत ही छोटा सा भाग है। यह इस अस्तित्व में इस अस्तित्व या प्रकृति के द्वारा ही निर्मित और विकसित हुई है। और जहां तक.....…इस सम्पूर्ण अस्तित्व की इच्छा अनुसार ही प्रणाम राधे राधे जी 🙏🏻🙏🏻
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