"ब्राह्मणों से झाड़ू पोछा लगवाएंगे!
हज़ारों सालों से हमको नीच बनाकर रखा,
अब हम तय करेंगे, नीच कौन बनेगा!"
ये भाषण सत्यशोधक समाज के स्टेज पर लगाया गया है!
तालियाँ भी बज रही हैं इस भाषण पर!
सरेआम एक समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है, क्या ये जातिवाद नहीं?
तो क्या GC प्रोटेक्शन एक्ट की ज़रूरत नहीं, ताकि ऐसे hate speech पर लगाम लग सके??
जो सरकार आरक्षितों के लिए कई जिलों में फ्री हॉस्टल, फ्री कोचिंग, फ्री फ़ूड, कम मूल्य पर फॉर्म और पास होने पर फ्री कोर्स फी, फ्री हॉस्टल फी आदि देती हो, उनके चटुए हमें SC/ST/OBC/minority छात्रवृत्ति पर प्रश्न पूछने पर, 'सामान्य वर्ग को भी छात्रवृत्ति दी' का चूरन ना दें।
91% आरक्षण पर हाई कोर्ट की दो बार अवमानना करने के बाद सुप्रीम कोर्ट तक जाने के बाद, हमें यह मत बताओ कि सामान्य वर्ग की भी चिंता है। हमें पता है कि ओडिशा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में क्या नाटक चल रहा है। भाजपा की ही सरकार है।
जब गड्ढे में हो, तो खोदना बंद करो। नीचे से पानी निकल आएगा और डूब जाओगे।
IIT बॉम्बे के छात्र की जान जातिवाद की वजह से नहीं गयी,
लेकिन देवा द्विवेदी की गई है!!
22 साल के देवा द्विवेदी ने SC/ST एक्ट लगाए जाने और उससे हुए मानसिक दबाव में आत्महत्या कर ली!
तो अब देवा को न्याय कौन देगा?
SC/ST एक्ट हटाओ या अब सवर्ण atrocity एक्ट भी दो!
बहुत हुआ!
2.65 लाख डॉक्टरों में से आधे न्यूनतम अंक (36%) नहीं ला सके। GC/EWS का कटऑफ 262 रहा। 256 को शून्य, अंतिम रैंक में इम्प्रूवमेंट रही। अब अंतिम रैंक पाने वाला -40 की जगह -19 पर आ चुका है। @narendramodi को नमन कीजिए क्योंकि उन्हीं की कृपा से यह सब संभव हो पा रहा है। दलीत-पीड़ीत डॉक्टर बन रहा है।
‼️खुशखबरी‼️
उत्तरप्रदेश के 4 SCP मेडिकल कॉलेजों का पहला Counselling round, जो 91% आरक्षण के हिसाब से हुआ था, उसको कैंसिल कर दिया गया है!
अब 50% आरक्षण के हिसाब से ही Counselling होगा!
Govt needs to stop hiding behind Harsh Dubey.
If you are copying our demands, come & talk to us directly. Fulfil all the demands.
Otherwise, the movement won’t STOP !!
आज का लाइव ऐसा होगा
फिर कभी नहीं जैसा होगा
एट्रोसिटी एक्ट के खोलेंगे धागे
रख कर दलितों को ही आगे
चुन-चुन कर वीडियो लाएँगे
सब तथ्य दिखाए जाएँगे
मंचों के बोल भी आएँगे
हर इमेज सजाए जाएँगे
सवर्णों की भी बेटी होती है
उसकी भी इज्जत होती है
वो राह चलती वेश्या नहीं
मैं चुप सुनने वाला प्रेश्या नहीं
हर रंग दिखाऊँगा तुमको
धो-धो के सुखाऊँगा सबको
—
मित्रों, आप सबके स्नेह और समर्थन का आभार! मेरी बहन आपकी भी बहन है, और आपकी बहन मेरी भी बहन है। मेरे वचन तब कटु हुए जब किसी ने उसे राह चलती किसी वस्तु की तरह देखा। मेरी बहन का ऑब्जेक्टिफिकेशन किसी नारीवादी को नहीं दिखा, पर जब एक कथित रावण समर्थक को मैंने लक्षित करके कुछ कहा तो तुम्हें ध्यान आया कि मेरी मानसिकता सड़ी हुई है।
मैं जहाँ से आता हूँ, यदि यह बात मुझे कोई सामने से कहता तो मेरे ऊपर यह धाराएँ नहीं लगती, वो कोई और धारा होती। मैं आत्मनियंत्रण वाला व्यक्ति हूँ और ट्रोल की ट्रोलिंग को उसी तरह से थामना जानता हूँ।
बाकी, जो भी होगा वह प्रारब्ध है। पर हाँ, सवर्णों की बेटियाँ किसी भी शोषित-वंचित के डिजिटल उपभोग या विकृत यौन मानसिकता के प्रयोग की वस्तु नहीं।
70% of the freedom fighters executed by the British were Brahmins.
They sacrificed their lives for the country. But what exactly did their sacrifice achieve?
Today their children and grandchildren are discriminated against by the Government. They are labelled as "oppressors" and systematically barred from education and jobs.
Is this how a country should honor those who gave up their lives for her?
Source: The plight of Brahmins by renowned historian Meenakshi Jain @IndicMeenakshi
(PS: I have not independently verified the numbers)
तर्क: हमारे साथ 5000 वर्षों से डिस्क्रिमिनेशन हुआ। अतः आरक्षण सकारात्मक डिस्क्रिमिनेशन है और उचित है।
उत्तर: हिन्दुओं का नरसंहार मुगलों के समय में हुआ, बलात्कार हुआ, गाँव जलाए गए। यह 4-500 वर्ष पहले की ही बात है। तो क्या वर्तमान मुसलमानों का, उपरिलिखित तर्क से, नरसंहार उचित हो जाएगा?
—
इस पर तुरंत भीम वाले पगला जाएँगे कि ऐसे कैसे तुम आरक्षण के डिबेट में लॉजिकल बातें ले आते हो। आज तक ये 5,000 वर्ष का कोई भी प्राइमरी सोर्स ले कर आए नहीं। और उस समय किसने किया, क्या किया, मैं उसका लोड क्यों लेता फिरूँ?
जिन जातियों को आरक्षण से हटाने के लिए 1960 के ही दशक में सिफारिश हुई, वो आज तक टिकी हुई हैं लिस्ट में, सबसे अधिक आरक्षण खा रही है। जिन जातियों को मुगलों के समय में जमींदारी दी गई, वो आज ओबीसी लिस्ट में हैं।
यदि सरकार को लगता है कि ये सारे डॉक्यूमेंट प्रधानमंत्रियों के तकिए की खोली में रखे होते हैं, तो वो भूल जाएँ। ये सब सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आँकड़े और तथ्य हैं।
‘व्हाइट पेपर’ तो लाना ही होगा। नहीं लाओगे तो हम निकलवा लेंगे या ऐसे आँकड़े रख देंगे जो तुम्हें और भी असहज करेगा।
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एक बात संघ के लिए भी है: मूर्ख बनाना बंद करो ये सब लीक करवा कर कि ‘UGC पर तो हमें न उगलते बन रहा, न निगलते’। यह ऐसा स्तरहीन तर्क है कि सामने मिले ऐसा आदमी तो पूछूँ कि तुम्हारी बुद्धि घास चरने चली गई?
इसमें ‘उगलना-निगलना’ क्या है? सीधा वक्तव्य यह दो: “आज के संदर्भ में, जब विश्वविद्यालयों की दीवारों पर सवर्णों के नरसंहार की बातें लिखी जाती हैं, हर सप्ताह कब्र खुदने के नारे लगते हैं, तो यह मानना अनुचित है कि उनको लेकर जातिगत घृणा नहीं है। अतः उन्हें भी इस लिस्ट का हिस्सा होना चाहिए।”
तत्पश्चात्, इसमें एक और बिन्दु जोड़ा जाए: यदि कोई भी शिकायत झूठी निकली, उस पर दोगुना जुर्माना और जेल का दंड होगा।
ऐसा कोई रॉकेट साइंस नहीं है।
RHA को ले कर सरकार से कुछ बात और माँगें
सरकार अपने स्तर से हर आंदोलन को फूट, समझौता, बल-प्रयोग, समझदारी, मिसइन्फॉर्मेशन कैम्पेन या कायरता दिखा कर कर समाप्त करना चाहती है। और वही उनका कार्य भी है। RHA का नाम ले कर कुछ लोगों ने आंदोलन के लिए जनता को बुलाया और लगभग 7000 की भीड़ जंतर मंतर पर भीतर दिखी, उतने को ही बाहर होल्ड किया गया या लौटा दिया गया।
मैंने केवल दिल्ली पुलिस की बकलोली की अवज्ञा के लिए इसमें भाग लेने की बात की और फिर बहुत लोग मेरे आने पर भी आए। फिर दुबे को पाठक जी ने नेता मान कर एक ऐसे पत्र पर चर्चा के लिए आश्वासन दिया जिसमें आरक्षण शब्द ही नहीं है।
खैर, मैं ये सब तकनीक देखता और जानता आया हूँ। मुझे इस विषय पर सरकार को भीड़ दिखाने की आवश्यकता न पहले थी, न आज है, पर जब चाहूँ वह भी कर सकता हूँ। अगली बार बिना अनुमति के भी ऐसा किया जा सकता है यदि प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट चाहिए, तो वह भी दिखा देंगे। पर मेरा लक्ष्य वह है ही नहीं।
सरकार को ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ से इसलिए नहीं डरना चाहिए क्योंकि एक भीड़ पूरे कनॉट प्लेस को घर कर पत्थरबाजी करते हुए संसद घेर लेगी। सरकार को इसलिए डरना चाहिए कि ऐसी कोई भीड़ ही नहीं है, न ही हम संसद को घेरने की योजना बना रहे हैं।
आंदोलन की तपन केवल जलती हुई कार की आग और अराजक भीड़ की ही नहीं होती। एक तपन ऐसी भी होती है जब जनमानस को वैचारिक रूप से इतना सक्षम बना दिया जाता है कि वह स्वयं ही अपने लिए वह निर्णय कर ले, जो वो कल तक किसी दूसरे बहकावे में आ कर कर रहा था।
हमारी माँगें:
१. आरक्षण पर श्वेत-पत्र: क्या लाभ हुआ, किन जातियों को अनुपात से अधिक लाभ लगातार मिला, कौन सी जातियाँ पूर्णतः छूट गईं। आरक्षण किस तरह से देश या समाज के उत्थान में सहायक है, उसके लिए आँकड़े क्या कहते हैं आदि आदि! इस से जुड़ी हर वह रिपोर्ट और सर्वेक्षण जो सार्वजनिक नहीं हुई।
२. EWS को हर वह आर्थिक सहायता दी जाए जो SC को मिलती है। निःशुल्क कोचिंग, निःशुल्क फॉर्म, शून्य हॉस्टल और कोर्स फीस। फिर भी लोन यदि लेना पड़े तो उसमें भी सुविधा।
३. तीनों ही आरक्षित वर्ग में ‘कोटा विदिन कोटा’ लागू हो ताकि वास्तविक दलित-पीड़ित-वंचित जातियों तक लाभ पहुँचे। अभी SC और OBC में हजार-हजार जातियाँ ऐसी हैं जिन्हें नगण्य आरक्षण मिला है। और 4-5 जातियाँ ऐसी हैं जो 70-80% आरक्षण खा रही हैं। इसका आधार पारिवारिक आय हो, न कि वैयक्तिक और दुरुपयोग की संभावना न रहे।
४. मेरिट का सम्मान हो। आरक्षित वर्ग का कटऑफ किसी भी हालत में सामान्य वर्ग के कटऑफ के (से नहीं) 10% के रेंज से बाहर न जाए। और यह भी आज की परीक्षा के अधिकतम आयु सीमा वाले बच्चों की आयु के बाद समाप्त किया जाए। न्यूनतम क्वालिफाइंग मार्क्स तो तय होना ही चाहिए।
५. सरकार यह सर्वेक्षण करे कि क्या गरीबी, भेदभाव या पिछड़ेपन से किसी की बौद्धिक क्षमता घट या बढ़ सकती है? इम्पीरिकल एविडेंस सार्वजनिक करें और उसी आधार पर आरक्षण की नीतियाँ बनें।
६. एक व्यक्ति को एक बार आरक्षण मिले। एक परिवार को एक बार आरक्षण मिले।
७. दशकीय समीक्षा हो। समाप्ति के लिए एक ‘सनसेट क्लॉज’ या रोडमैप कि कब तक रहेगा।
८. कॉलेज/यूनिवर्सिटी पुस्तकालयों में पुस्तकों के अलॉटमेंट का आरक्षण तत्काल निरस्त हो। इसका कोई लॉजिक नहीं है। यह आरक्षण से लड़ कर वहाँ पहुँचे बच्चों को सताने की व्यवस्था मात्र है। या आप पुस्तकों की मात्रा दोगुनी कीजिए और वहाँ ‘आरक्षित सेक्शन’ लिख दीजिए।
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अन्य माँगें:
९. यूजीसी नियमावली निरस्त हो या समीक्षा कर के हर जाति समूह को इसमें सम्मिलित किया जाए।
१०. SC/ST Act की तर्ज पर ‘सवर्ण उत्पीड़न (रोकथाम) कानून पास’ हो। दोनों ही कानून में केस झूठा पाए जाने पर, उस केस में होने वाला दंड आरोप लगाने वाले को झेलना पड़े। आर्थिक जुर्माना भी वसूला जाए।
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सरकार और सुधिजन देख लें। बाकी, चाहे आप दुबे, शेखावत या अन्य को मैनेज कर लें, आंदोलन चलता रहेगा।
हो सकता है हमारे भी दो सांसद पहुँच जाएँ कल को। 50 विधायक पहुँच जाएँ। और सवर्ण केवल संख्या नहीं है, एक विधायक दस को प्रोत्साहित करता है।
अगर बात नहीं सुनेंगे, तो हम आगे बढ़ेंगे। मुझे राजनीति का कोई शौक नहीं है, लेकिन जिनको करना है, वो करें। मेरा पूर्ण समर्थन रहेगा।
तो क्या यहाँ से एक नई पॉलिटिकल पार्टी का आगाज हो सकता है?
पॉसिबिलिटी बिल्कुल है, और होना चाहिए।
BREAKING: Bill tabled in Parliament making it mandatory for the President, the Prime Minister, the Chief Justice, and all their near and dear ones to be treated for their medical needs and emergencies only by doctors who obtained -40 marks out of 800 in NEET-PG medical exam.
NEET-PG 2025, cut-off:
A) Orthopaedics seat filled at:
4 marks out of 800.
B) Obstetrics and Gynaecology seat:
44 marks out of 800.
C) General Surgery seat filled at:
47 marks out of 800.
D) Biochemistry:
minus -8 marks out of 800.
E) Transfusion Medicine:
10 marks out of 800.
F) Anatomy:
11 marks out of 800.
G) MS Orthopaedics seat filled at:
1 mark out of 800 in a medical college in Hyderabad.
H) MD Forensic Medicine seat filled at:
12 marks out of 800 in a Govt medical college.
I) MD Pathology seat filled at:
24 marks out of 800 in a Govt medical college.
In NEET-PG 2025, candidates with scores as low as –40 out of 800 were allowed to participate in PG counselling. A negative score was considered qualifying.
These extremely low scores, at which seats were actually allotted, indicate a serious crisis in academic standards. A reasonable minimum qualifying merit must be established to maintain the integrity of medical education and the healthcare system.
Forget about dialogue or discussion. So far, neither the Government nor the Opposition has said a word about this because it does not suit their agenda, and it would affect their vote banks and political interests.
Even those who are protesting today in the name of concerns about the education system are not addressing this issue because they too have political ambitions and know that speaking about it could cost them support rather than gain it.
Oracle fired 12,000 of its Indian workforce and is expected to sack more.
Another reminder of how fragile stability is in the private sector. One secures employment, income begins to flow, long-term plans take shape, home, car, loans, EMIs. And then, a single decision by the corporate to “rationalize” or “downsize,” and everything collapses overnight.
Unless you quickly re-enter the job market, fixed liabilities don’t pause; they compound stress and can upend an otherwise steady life.
While you earn, you must pay taxes. The moment you lose your job, you’re on your own. In fact, you even have to pay tax on the severance also.
Maybe it’s time to introduce reforms, such as mandating severance pay ranging from three months to one year based on an employee’s tenure, as is the norm in the West; allowing EMI pauses for a 3-6 months; and providing a time-bound monthly allowance from the govt for involuntary job losses.
If Ladla/Ladlis can get free money, free ration, free water, and electricity, without paying any income tax, why not support a worker who has been paying taxes and contributing?
सारण वाले ‘शुद्धिकरण’ मामले को भी नरेन्द्र मोदी के मीडिया सलाहकार ब्लैक आउट करवा देंगे?
क्या कोई भी एंकर, इस बलात्कार-हत्या के घटना मात्र के इतर, इस बात पर प्रश्न उठाएगा/गी कि समाज इस स्थिति में पहुँचा कैसे कि बलात्कार के बाद ‘दुल्हन बना कर ले जाएँगे’ वाले भोजपुरी गीत विजय के भाव के साथ लगाए जाते हैं?
मीडिया में बिहारी भरे पड़े हैं, पर यह घटना उनके मुखारविंद से रिपोर्ट तो होगी, चर्चा योग्य नहीं समझी जाएगी।
मीडिया में सवर्ण पटे पड़े हैं, पर सत्ता की धौंस और पैसों के मोह में अपने समाज की बच्ची पर होने वाले इस नॉर्मलीइज्ड रेप के कारणों पर वो चर्चा नहीं करेंगे।
मीडिया में मानवतावादी और संवेदनशील लोग भी हैं, पर यह घटना उनके जातिवादी फ्लोचार्ट के लाइन में नहीं दिखेगी, अतः यह दस मिनट में सौ खबरों के बीच बिना अपराधियों की जाति का नाम लिए खपा दी जाएगी।
क्यों @BJP4India अब तो गृह मंत्री तुम्हारा है, पुलिस तुम्हारी है, अब ऐसा क्यों? पटना की नीट वाली लड़की को तुमने दबाया, अब इसे भी दबवा ही दोगे!
कैम्पसों में छात्र पार्टियाँ बनाना आरंभ करो। अलग राष्ट्र, अलग राजनैतिक पार्टी बनाने से अच्छा विकल्प यही है।
ब्रह्मेश्वर मुखिया बनो, अपमान का प्रतिशोध लो, अपनी जगह वहीं बनाओ, जहाँ तुम्हें सताया जा रहा है।
सभी लोग आपस में लड़ कर रहे हैं। कोई धमकियाँ दे रहा है तो कोई डरा रहा है कि हमारे साथ बहुत बुरा होने वाला है। कोई बात नहीं, हो जाने दो। कौन-सा पिछले सत्तर वर्षों में हमारे साथ कुछ भी अच्छा हुआ है कि अब और बिगाड़ लोगे?
कश्मीर और महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मणों से लेकर बिहार के ‘भूरा बाल साफ़ करो’ तक, हमारे साथ आज तक कुछ अच्छा तो हुआ ही नहीं है।
सीएचएस में पहली बार माइनस में अंक लाने वाले को प्रवेश लेते देखा है — जो मेरे अच्छे अंक आने के बाद भी नहीं हुआ था। तब पहली बार जाति का अर्थ समझा था।
आज भी शिक्षा को ही जीवन का कटु सत्य मानकर अपनी एक-एक पाई जोड़ते हुए सामान्य वर्ग के माता-पिता को देखा है।
निर्धन माता-पिता को बच्चे के प्रवेश के लिए घर के आभूषणों को मुथूट में गिरवी रखते देखा है। उन काँपते हाथों को देखा है, उन दबे हुए आँसुओं को देखा है।
प्रवेश और नौकरी की परीक्षा में एक अंक भी कम होने के कारण घर के चिरागों को फाँसी पर लटकते देखा है।
अरे भाई, प्रत्यक्ष रूप से भूखमरी देखी है मैंने तो कोविड के समय ब्राह्मणों की।
क्या ही डरा लोगे तुम? तुम ऐसा क्या ही उखाड़ लोगे, जो पहले ही स्टेट ने नहीं उखाड़ रखा है? इस बार बस यह हुआ है कि यूजीसी के मुद्दे ने वर्षों से दबे इस क्रोध को सामने ला दिया है।
अब यह सामान्य वर्ग बिना लिए नहीं मानेगा। अब धमकी दो, जेल में डलवा दो, फाँसी दो, या सीधे encounter ही कर दो।
यह पढ़ा-लिखा वर्ग है; राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान नहीं पहुँचाता है तुम्हारे पाले हुए रावण की तरह। बस चुनावों में तुम्हारी कमर तोड़ देता है।
#SaveMeritInMP
किसी को लग रहा है कि यति नरसिंहानंद राजनैतिक पार्टी बनाना चाहते हैं, तो उसको शीघ्रातिशीघ्र मानसिक चिकित्सालय में जाना चाहिए।
घृणा करो यूजीसी समर्थकों से। उन्हें बिका हुआ कह लो क्योंकि तुम्हारे पास कोई तर्क बचता नहीं। उन पर पर्सनल आक्षेप कर लो, क्योंकि उनके प्रश्नों का उत्तर नहीं है तुम्हारे पास, पर ऐसे हास्यास्पद आरोप मत लगाओ।
यति नरसिंहानंद को मैं छः वर्षों से जानता हूँ। कितने चुनाव हो चुके हैं, कोई पार्टी नहीं बनी। जो व्यक्ति केवल और केवल हिन्दू एकता के लिए 95% मुल्लों के बीच खड़ा है, उसको अपनी राजनैतिक दासत्व से सनी सोच का पात्र मत बनाओ।
तुम भाजपा की चाटो, किसी ने नहीं रोका है पर यदि तुम बाहर बैठ कर डासना, यति जी जैसों पर पार्टी बनाने के लांछन लगाते हो तो तुम थूकने योग्य भी नहीं हो। जो व्यक्ति किसी तरह अपने शिष्यों के लिए दो काल की रोटी और मंदिर के रखरखाव का दायित्व लिए वहाँ सनातन की लड़ाई लड़ने के लिए टिका हुआ है, उसे मत लपेटो।
जिस व्यक्ति ने तुमसे बहुत माँगा तो तुम्हारी एकता माँगी, जिसने बहुत माँगा तो 108 दिवस के यज्ञ के लिए तेल-समिधा-सामग्री हेतु धन माँगा, उसे अपनी संकुचित सोच का निशाना मत बनाओ।
कुछ भ्रम है तो एक बार मिल लो, दूर हो जाएँगे।