Kotappakonda: the sacred Trikūṭādri of Andhra Pradesh.
Rising to about 1,587 feet, this remarkable hill is known as Trikūṭāchalam, Trikūṭādri or Trikūṭa Parvatham, for its three distinctive peaks: Brahma, Vishnu and Rudra.
Kotappakonda is also popularly described as the “Hill of Eagles,” referring to the majestic birds traditionally associated with the hill.
Shivprabhat 🙏🏽
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कौन किसी से क्या बना .....
किसको कितना #ज्ञान..…
ज्ञान #धरा के गर्भ में ......
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अतरंगी आख्यान : चतुर्मास विशेष
योगनिद्रा से प्रबोधन तक - एक अंतर्य�����्रा
खंड चतुर्थ : साधना
प्रकरण ४१ : साधना में अनुशासन का वास्तविक रहस्य क्या है?
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पिछले प्रकरण के अंत में हमने एक प्रश्न छोड़ा था-
यदि मन को अनुशासित करना ही साधना है...
तो यह अनुशासन आता कैसे है?
क्या केवल संकल्प से...
या छोटी-छोटी दैनिक आदतों से?
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जब भी अनुशासन की बात आती है...
तो मन में कठोर नियमों का विचार आता है।
मानो स्वयं को जितना अधिक कष्ट देंगे...
उतने ही बड़े साधक बन जाएँगे।
लेकिन क्या वास्तव में अनुशासन का अर्थ यही है?
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भारतीय परम्परा में अनुशासन...
दण्ड नहीं है।
दिशा है।
यह स्वयं को दबाना नहीं...
स्वयं को सही दिशा में ले जाना है।
जिस प्रकार नदी अपने तटों के कारण समुद्र तक पहुँचती है...
उसी प्रकार जीवन भी अनुशासन के कारण अपने लक्ष्य तक पहुँचता है।
तट बन्धन नहीं...
मार्गदर्शक होते हैं।
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हम प्रायः बड़े परिवर्तन चाहते हैं।
कल से सब बदल जाएगा।
कल से क्रोध नहीं करेंगे।
कल से नियमित ध्यान करेंगे।
कल से जीवन नया होगा।
लेकिन जीवन...
"कल" से नहीं बदलता।
आज की छोटी-छोटी आदतों से बदलता है।
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सोचिए-
यदि कोई प्रतिदिन केवल एक बूँद जल भी किसी पात्र में डालता रहे...
तो एक दिन वह भर जाता है।
और यदि प्रतिदिन एक छोटा-सा छेद बना रहे...
तो भरा हुआ प��त्र भी खाली हो जाता है।
जीवन भी ऐसा ही है।
महान परिवर्तन...
छोटे, निरन्तर प्रयासों का परिणाम होते हैं।
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इसीलिए ऋषियों ने साधना को उत्साह का नहीं...
निरन्तरता का मार्ग कहा।
कभी बहुत अधिक करना...
और फिर कई दिनों तक कुछ न करना...
यह साधना नहीं।
प्रतिदिन थोड़ा करना...
चाहे कम करना...
पर लगातार करना...
यही साधना का स्वभाव है।
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अब स्वयं से पूछिए-
क्या मेरी आध्यात्मिक यात्रा...
केवल प्रेरणा पर चलती है?
या अनुशासन पर?
क्योंकि प्रेरणा आती-जाती रहती है।
मन कभी उत्साहित होता है...
कभी नहीं।
लेकिन अनुशासन...
मन की प्रतीक्षा नहीं करता।
वह सही कार्य करता है...
चाहे मन तैयार हो या नहीं।
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इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन कठोर हो जाए।
अनुशासन का उद्देश्य आनंद छीनना नहीं...
अनावश्यक भटकाव कम करना है।
जैसे माली समय-समय पर पौधे की छँटाई करता है...
ताकि वह और अधिक विकसित हो सके।
वैसे ही अनुशासन...
हमारे जीवन से अनावश��यक को हटाता है...
आवश्यक को नहीं।
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शायद इसी कारण चतुर्मास में छोटे-छोटे नियम रखने की परम्परा है।
कोई एक पदार्थ का त्याग करता है।
कोई नियमित जप करता है।
कोई प्रतिदिन शास्त्र पढ़ता है।
इन नियमों का उद्देश्य भगवान को प्रसन्न करना नहीं...
स्वयं को स्थिर करना है।
जो छोटी बातों में स्वयं को संभाल लेता है...
वह बड़ी परिस्थितियों में भी सहज रह पाता है।
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धीरे-धीरे साधना का अनुशासन...
स्वभाव बन जाता है।
तब जप करना प्रयास नहीं लगता।
सत्य बोलना निर्णय नहीं लगता।
सेवा करना कर्तव्य नहीं लगता।
वे जीवन का सहज प्रवाह बन जाते हैं।
यही साधना क��� परिपक्वता है।
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अब प्रश्न यह नहीं रह जाता-
मैंने कितने नियम बनाए?
प्रश्न यह हो जाता है-
क्या मेरे छोटे-छोटे अभ्यास...
धीरे-धीरे मेरे स्वभाव को बदल रहे हैं?
यदि उत्तर "हाँ" है...
तो समझिए...
साधना केवल दिनचर्या नहीं रही।
वह चरित्र बनने लगी है।
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लेकिन एक प्रश्न अभी भी शेष है-
यदि अनुशासन साधना को स्थिर करता है...
तो साधना की सबसे बड़ी परीक्षा कब होती है?
क्या एकान्त में...
या सम्बन्धों क�� बीच?
अगले प्रकरण में हम खोजेंगे-साधना की सबसे कठिन परीक्षा कहाँ होती है?
|| ॐ नमो नारायण ||
सिद्धपीठ श्री हनुमानगढ़ी अयोध्या धाम श्री हनुमान जी महाराज के 03-09-26 गुरुवार के अद्भुत एव�� अलौकिक दर्शन!
श्री हनुमान जी की कृपा आप सभी पर बनी रहे!
ऐसी ��ंगल कामना..!!
|| जय श्री राम ~ जय बजरंगबली ||
🕉️ भगवान नारायण के २४ अवतार | प्रकरण १
🐟 मत्स्य अवतार - जब भगवान ने केवल संसार नहीं, ज्ञान की भी रक्षा की
एक प्रश्न से शुरुआत करते हैं-
यदि किसी दिन पूरी दुनिया नष्ट हो जाए,
तो सबसे पहले क्या बचाया जाना चाहिए?
सोना?
महल?
सत्ता?
या मनुष्य?
पुराण कहते हैं-
इन सबसे पहले बचाया जाना चाहिए-ज्ञान।
क्योंकि धन खो जाए तो फिर कमाया जा सकता है।
राज्य नष्ट हो जाए तो फिर बसाया जा सकता है।
लेकिन यदि ज्ञान नष्ट हो जाए,
तो पूरी सभ्यता फिर से अज्ञान के अंधकार में चली जाती है।
इसी संदेश के साथ भगवान नारायण ने अपना प्रथम अवतार ���ारण किया-
मत्स्य अवतार।
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सत्ययुग में राजा सत्यव्रत प्रतिदिन की भाँति नदी में स्नान और तर्पण कर रहे थे।
तभी उनकी अंजलि में एक छोटी-सी मछली आ गई।
उसने मानो करुण स्वर में कहा-
"राजन! मुझे बड़ी मछलियों से बचाइए।"
राजा का हृदय दया से भर गया।
उन्होंने उसे अपने कमंडल में रख लिया।
लेकिन कुछ ही समय में वह इतनी बड़ी हो गई कि कमंडल छोटा पड़ गया।
उसे घड़े में रखा गया।
फिर तालाब में।
फिर झील में।
फिर नदी में।
और अंततः समुद्र में।
तब राजा समझ गए-
"यह कोई साधारण मछली नहीं,
स्वयं भगवान विष्णु हैं।"
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भगवान ने सत्यव्रत से कहा-
शीघ्र ही महाप्रलय आने वाला है।
पूरा संसार जलमग्न हो जाएगा।
लेकिन यह प्रलय केवल विनाश के लिए नहीं,
नई सृष्टि की तैयारी के लिए होगा।
उन्होंने आदेश दिया कि एक विशाल नौका तैयार की जाए।
उसमें सप्तर्षियों,
विभिन्न वनस्पतियों के बीज,
औषधियाँ,
और जीवन को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक तत्व सुरक्षित रखे जाएँ।
जब प्रलय आए,
तो उस नौका को मेरे सींग से बाँध देना।
मैं तुम्हें सुरक्षित मार्ग दिखाऊँगा।
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समय आया।
प्रलय का जल चारों ओर फैल गया।
पर्वत डूब गए।
धरती जल में विलीन हो गई।
तब भगवान विशाल मत्स्य रूप में प्रकट हुए।
राजा सत्यव्रत ने नौका को उनके सींग से बाँध दिया।
भगवान उस नौका को अनंत जलराशि के बीच सुरक्षित ले चले।
कहा जाता है कि उसी समय भगव���न ने सत्यव्रत और सप्तर्षियों को सृष्टि, धर्म और जीवन का गूढ़ ज्ञान भी प्रदान किया,
जिसके आधार पर नई सृष्टि का आरंभ हुआ।
इसी कारण मत्स्य अवतार केवल जीवन बचाने का नहीं,
ज्ञान बचाने का भी प्रतीक है।
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एक अन्य कथा के अनुसार,
जब ब्रह्माजी निद्रा में थे,
तब हयग्रीव नामक दैत्य वेदों का हरण कर ले गया।
वेदों के बिना सृष्टि का ज्ञान अधूरा हो गया।
तब भगवान मत्स्य रूप में प्रकट हुए,
दैत्य का वध क���या,
और वेदों को पुनः ब्रह्माजी को सौंप दिया।
यह कथा हमें बताती है-
"जब ��्ञान खो जाता है,
तब स्वयं ईश्वर उसकी रक्षा के लिए अवतरित होते हैं।"
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यदि इस कथा को आज के समय में देखें,
तो प्रलय केवल जल की नहीं होती।
कभी-कभी समाज में भी प्रलय आती है।
जब झूठ सत्य से बड़ा हो जाए…
जब स्वार्थ, सेवा पर भारी पड़ जाए…
जब लोग जानकारी तो बहुत रखें,
लेकिन ज्ञान खो दें…
वह भी एक प्रकार की प्रलय है।
ऐसे समय में हमें भी अपने भीतर
सत्य, संस्कार और विवेक के बीज बचाकर रखने होते हैं।
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मत्स्य अवतार हमें एक और अद्भुत शिक्षा देता है।
राजा सत्यव्रत ने उस छोटी-सी मछली की उपेक्षा नहीं की।
यदि वे सोचते-
"इस छोटी-सी मछली से मुझे क्या लाभ?"
तो शायद वे स्वयं भी प्रलय से नहीं बच पाते।
जीवन में भी कई बार
महान अवसर छोटे रूप में आते हैं।
छोटी-सी सीख…
एक अच्छी पुस्तक…
एक संत का एक वाक्य…
या किसी साधारण व्यक्ति की सलाह…
जो बाद में पूरे जीवन की दिशा बदल देती है।
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"ईश्वर जब कृ���ा करते हैं,
तो वे हमेशा विराट रूप में नहीं आते।
कभी-कभी वे एक छोटी-सी संभावना बनकर हम���रे जीवन में प्रवेश करते हैं।
उन्हें पहचानना ही बुद्धिमानी है।"
यही मत्स्य अवतार का संदेश है।
"सभ्यता की रक्षा शस्त्रों से नहीं,
ज्ञान से होती है।"
और जो समाज अपने ज्ञान,
अपने शास्त्र,
अपने संस्कार और अपने सत्य की रक्षा करता है,
उसे कोई प्रलय कभी समाप्त नहीं कर सकती।
🔱 अगले प्रकरण में-
कूर्म अवतार।
जहाँ भगवान नारायण बताएँगे कि-
"जो सबसे अधिक भार उठाता है,
वह अक्सर सबसे कम दिखाई दे��ा है।"
जय श्रीहरि। 🕉️
|| ॐ नमो नारायण ||
॥ शिव और सती : संवाद और कथा ॥
प्रकरण ७ - ब्रह्मा का प्रस्ताव और विवाह की तैयारी
"जब दो आत्माओं का मिलन केवल उन���ा निजी निर्णय न होकर सृष्टि के संतुलन का कारण बन जाए, तब उसे लीला कहते हैं।"
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📖 कथा
भगवान शिव द्वारा सती को अर्धांगिनी रूप में स्वीकार करने के पश्चात् भी एक कार्य शेष था।
विवाह।
भगवान शिव स्वयं किसी औपचारिकता के इच्छुक नहीं थे। उनके लिए प्रेम ही पर्याप्त था।
किन्तु धर्म की मर्यादा और लोकव्यवहार भी आवश्यक थे।
शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव ब्रह्मा के पास पहुँचे और कहा-
"मैंने सती को स्वीकार किया है। अब उचित यही है कि उनके पिता दक्ष से विधिपूर्वक उनका वरण किया जाए।"
ब्रह्मा प्रसन्न हुए।
उन्होंने भगवान विष्णु तथा देवताओं को साथ लिया और दक्ष की सभा में पहुँचे।
दक्ष ने आदरपूर्वक उनका स्वागत किया।
ब्रह्मा ने कहा-
"हे दक्ष! तुम्हारी पुत्री सती ने तप द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न किया है। स्वयं महादेव उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार कर चुके हैं। अब धर्मसम्मत रीति से उनका विवाह सम्पन्न होना चाहिए।"
दक्ष कुछ क्षण मौन र���े।
वे जानते थे कि शिव कोई साधारण देव नहीं हैं।
पर उनके मन में एक प्रश्न अब भी था-
"क्या मेरी राजकुमारी उस विरक्त योगी के साथ सुखी रह पाएगी?"
फिर भी ब्रह्मा और विष्णु की उपस्थिति तथा देवताओं की सहमति देखकर उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
उन्होंने कहा-
"यदि यही देवों की इच्छा और मेरी पुत्री का संकल्प है, तो मैं इस विवाह के लिए सहमत हूँ।"
समस्त देवगण प्रसन्न हो उठे।
विवाह की तैयारियाँ प्रारम्भ हो गईं।
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🕉️ शिव–सती संवाद
उस रात्रि सती ध्यान में बैठीं।
शिव का स्मरण करते ही उनका हृदय आनंद से भर उठा।
उन्होंने पूछा-
"प्रभो... अब जब हमारा विवाह निश्चित हो गया है, तो क्या मेरे जीवन में कोई परिवर्तन आएगा?"
शिव ने मुस्कुराकर कहा-
"परिवर्तन अवश्य आएगा, पर प्रेम नहीं बदलेगा।"
सती ने कहा-
"लोग कहते हैं विवाह दो जीवनों को बाँध देता है।"
शिव बोले-
"बंधन वह है जिसमें स्वतंत्रता छिन जाए।
विवाह वह है जिसमें दो स्वतंत्र आत्माएँ एक ही सत्य की ओर साथ चलें।"
सती ने पूछा-
"और ��दि कभी हमारे मार्ग कठिन हो जाएँ?"
शिव ने उत्तर दिया-
"जहाँ विश्वास जीवित हो, वहाँ कठिन मार्ग भी दूरी नहीं बनाते।"
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🔱 आध्यात्मिक रहस्य
शिव और सती का विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं है।
यह तप और करुणा, वैराग्य और शक्ति, योग और भक्ति का समागम है।
शास्त्र इसलिए इस विवाह को दिव्य कहते हैं, क्योंकि यह इच्छा से अधिक धर्म पर आधारित है।
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🌿 अतरंगी चिंतन
एक बात विचार कीजिए...
दक्ष ने विवा��� स्वीकार तो कर लिया...
पर क्या उन्होंने वास्तव में शिव को स्वीकार किया?
कभी-कभी हम किसी व्यक्ति के न��र्णय को मान लेते हैं...
लेकिन उसके अस्तित्व को नहीं।
यहीं से भविष्य के संघर्ष जन्म लेते हैं।
बाहरी सहमति...
और भीतरी असहमति...
दोनों एक साथ अधिक समय तक नहीं चल सकते।
दक्ष का मौन अभी शांत था।
पर उसके भीतर अहंकार की अग्नि पूरी तरह बुझी नहीं थी।
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✨ शिवसूत्र
"जहाँ प्रेम के साथ सम्मान भी हो, वहीं संबंध टिकते हैं; केवल स्वीकृति पर्याप्त नहीं होती।"
|| हर हर महादेव ||
|| ॐ नमो नारायण ||
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लेखकीय ��िप्पणी
इस श्रृंखला की कथा शिवपुराण, देवीभागवत, भागवत महापुराण आदि के आधार पर है। जहाँ शास्त्र मौन हैं, वहाँ संवाद और कुछ भावात्मक प्रसंग शास्त्रीय सिद्धांतों के अनुरूप साहित्यिक कल्पना के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं।
मुक��तक -
फूलों ने कभी ऊँची आवाज़ ही नहीं की,
ख़ुशबू ने भी अपनी पहचान नहीं लिखी।
जो जो लोग सच में ही बेमिसाल होते हैं,
वो तारीफ़ की कभी इच्छा ही नहीं करते।
#अशोक_मसरूफ़
दोहे -
1
हवा कहे मत बाँधना,जीवन की तुम चाल।
बहना ही पहचान है, रुकना केवल जाल॥
2
सूरज हर रोज़ सिखा रहा, बाँटो बिना हिसाब।
जल कर भी जग को देता,उजियारा बे��िसाब॥
3
बादल भर कर प्रेम से, बरसे खेत-खलिहान।
प्रकृति जहाँ मुस्काए तो,खिल उठता संसार॥
4
प्रकृति हमारी साँस है, इसका रखना मान।
पेड़ बचेंगे तब ही बचेगा, आने वाला प्राण॥
5
माँ की ममता छाँव सी, पिता धूप में ढाल।
दोनों मिलकर बाँधते,जीवन की हर चाल॥
#अशोक_मसरूफ़
हाइकु -
पुराना छाता,
बरसों बाद खुला
बादल हँसा।
रात दिल पे,
तारों ने लिख दि��ा
अधूरा प्यार।
प्रातः काल ही
ओस ने रख दिया
चुप से दिन ।
धूप की चिट्ठी,
खिड़की से ही बोली
दिन है अभी।
नदी रात में,
रेत पे रख गई
ये ठंडी यादें।
#अशोक_मसरूफ़
"वक़्त की बेरूखी”
#वक़्त की बेरूखी ने हमें आज़माया,
हर मोड़ पर मग़र राह दर्द ने दिखाई।
हँसी के रंग फीके पड़ गए,
और आँसुओं ने किताबें लिख डाली।
जितना भी रोका, समय बढ़ता रहा,
ख्वाब टूटे,फ़िर भी चलना पड़ा।
अँधेरे में भी उम्मीद की लौ जली,
सबर की डोर से दिल जुड़ा रहा।
कभी ख़ुशी क�� बारिश आई अचानक,
कभी तूफ़ान में नाव हिली।
वक़्त के हर खेल ने समझाया,
जीवन में कभी दर्द की भी महक मिली।
पुरानी यादें कानों में गूंजती हैं,
कुछ पल हँसी के, कुछ ग़म के।
हर एक छाया में सीख छुपी है,
#वक़्त की बेरूखी भी दिल से है।
#अशोक_मसरूफ़
#बज़्म_काव्य_मंच
#बज़्म #वक़्त
#वक़्त ..
एक अदृश्य दस्ता���ेज़ है,
जिस पर हम अपने होने के निशान
बार-बार मिटाते रहते हैं।
हर दिन एक सवाल है,
जिसका जवाब ख़ुद रात लिखती है
और सुबह उसे पढ़ नहीं पाती।
ख़ामोशी अब आवाज़ नहीं रोकती,
वो तो खुद बोलने लगी है.
हर सन्नाटा किसी पुराने सच की गवाही देता है।
#अशोक_मसरूफ़
#बज़्म_काव्य_मंच
#बज़्म #वक़्त