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BJP ने कल यह फ़र्ज़ी दस्तावेज़ चला के दावा किया कि सोनिया गांधी का नाम उनके भारतीय नागरिक बनने से पहले ही वोटर लिस्ट में डाल दिया गया।
यह फ़र्ज़ी क्यों है?
इसमें लिखा है National Capital Territory of Delhi। हक़ीक़त यह कि 1980 में National Capital Territory of Delhi थी ही नहीं, इसे 1 फरवरी 1992 को बनाया गया। [https://t.co/9sYC9qpGj0]
सोचिए कितनी बड़ी फ्रॉड है बीजेपी!
Air India Aircraft Maintenance is taken care by
Air India Engineering Services Limited (AIESL)
Still owned by: Government of India
Managed by: Ministry of Civil Aviation.
AIESL is due for sale by Govt and is being divested but it hasn't happened yet. Technically, it is still govt owned and Air India use their services for most of their planes.
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बोधगया में बोधिवृक्ष है।
किसी ने पूछा- क्या यह वही बोधिवृक्ष है?? जिसके नीचे बैठकर सिद्धार्थ बुद्ध हुए थे?"
उत्तर कठिन है।
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ऑरिजिनल है, और नही भी।
मूल बोधिवृक्ष तो कब का गल गया। खत्म हो गया। पर शाखाएं, जो दुनिया के कोने कोने में ले जाकर लगाई गई थी, नई पौध वहां से लाकर फिर बोधगया में, उसी जगह लगाई गई।
मौजूदा बोधिवृक्ष 250 BCE से रोपित है।
ढाई हजार सालों में ये वृक्ष कई बार तूफानों में गिरा, हवाओ में टूटा। लोगो की आंख में खटका, दुश्मन कई हुए।
अशोक की पत्नी तिष्यरक्षिता ने अशोक के राज्य के 19 वे वर्ष में इसे कटवा दिया। यह फिर उग आया।
7वी शताब्दी में गौड़ के राजा शशांक ने इसे जलवा दिया। पीके फिर फूटे।
बोधिवृक्ष आज भी खड़ा है।
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लेकिन बोधिवृक्ष सदा से बोधिवृक्ष न था।
पीपल का मामूली पेड़ था। किसी पक्षी या जानवर ने बीज लाकर रख दिया। वह बढ़ा, जंगल के और पेड़ो की तरह।
तब चिड़ियों, कव्वो और गिलहरियों का घर रहा होगा। कुछ राहगीर उसके नीचे विश्राम कर लेते होंगे। लेकिन एक पूर्णिमा की रात उसके पाँवों तले एक देह आकर बैठी।
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6 साल से साधनारत, विचार मग्न वह शख्स, प्रबोधन के अंतिम चरण में था। इस वृक्ष तले, उसने एकाएक महसूस किया कि हां...
मध्यम मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ है।
बस, उस क्षण धरती पर एक नया दौर जन्मा। रौशनी फूटी, धम्म का प्रादुर्भाव हुआ। इसका प्रथम साक्षी वह वृक्ष था-
तो जिस पल में सिद्धार्थ.. भगवान और बुद्ध हुए, उसी पल वह वृक्ष भी असाधारण हो गया-
"बोधिवृक्ष"
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कांग्रेस वही बोधिवृक्ष है।
साधारण सँगठन, कुछ लोगो का झुंड। बना तो था अंग्रेजो के सुभीते के लिए। सुना कि किसी ह्यूम ने इसका बीज लगाया था।
30 साल बाद, इसके नीचे एक महात्मा आकर बैठा। उसने भारत को फिर एक बार, मध्यम मार्ग का ज्ञान दिया।
अहिंसा, निडरता, सत्य के प्रति आग्रह की शिक्षा दी। नफरत, गैरबराबरी, शोषण के खिलाफ लड़ने को कहा। अनुशासन और सँघर्ष की नींव डाली।
हमें आजादी के मायने दिए।
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यह सवाल हम सुनते है-
- क्या यह असली कांग्रेस है?
- कांग्रेस तो अंग्रेजो ने बनाई थी।
- असली कांग्रेस तो आजादी के बाद खतम हो गई।
- ये अब नकली गांधी है,
- अरे, ये नकली कांग्रेस है।
सच है, ये वो कांग्रेस कहाँ?
ये कई बार टूटी है। जली है। उखाड़ने, गिराने की कोशिशों का शिकार बनी। लेकिन लेकिन बोधगया के उस वृक्ष की तरह वह करोड़ो आशाओं केंद्र है।
तो आस्था की उस धरती पर वह फिर फिर उग आती है, जो गांधी का रंगमंच रही।
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गांधी का रंगमंच, याने हम हिंदुस्तानियों का जेहनो दिल।
इस जमीन पर नफरत की घास चाहे जितना उगाने की कोशिश कर लें, मोहब्बत के फूल उग उग आयंगे।
जैसे बोधिवृक्ष अपने अंश से बार बार रोपित होता है, कांग्रेस अपने अंश से फिर खड़ी होती है। चाहे जितनी बार टूटे, गिरे, जलाई, या उखाड़ी जाए। हर बार नये सिरे से खड़ी, एक नई कांग्रेस होती है।
और ये वही पुरानी, ऑरिजिनल कांग्रेस होती है।
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जो सबको लेकर चलती है। जो मिटाने, हटाने, खत्म करने, औकात दिखाने के दावे नही करती। जो गालियों, अपमानों, दबावों, जेल और दमन से खौफजदा नही होती।
जो गांधी के मध्यम मार्ग, सत्य, अहिंसा और आजादी के असल मायनों के साथ बढ़ने वाली तंजीम हो, वह सदा गांधी की कांग्रेस होगी।
असली कांग्रेस होगी।
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जो अपना खून देकर शांति खरीदे, महात्मा से राजीव तक, गांधी की वह विरासत कांग्रेस है।
जो विरोध का भी दमन नही करती, सबको मौका देती है। जहां लेफ्ट जिया, दक्षिणपंथ न मिटाया गया। यहाँ खुद कांग्रेस की जमीन पर क्षेत्रीय दलों को स्थान मिला। जिसने भाषा, धर्म, रंग, जाति और विचारधारा के झगड़ो में बीच बचाव का मार्ग निकाला। इस राष्ट्र की उम्र दराज की।
मध्यमार्ग की पोषक वही कांग्रेस है।
भला इसमे शंका का स्थान कहाँ है।
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बोधिवृक्ष के तले जहां सिद्धार्थ ने ज्ञान पाया, अशोक ने वह भूमि सुरक्षित करवा दी। डायमंड थ्रोन कहते है उसे।
परिपाटी है कि उस डायमंड थ्रोन पर बैठने का हक किसी को नही। जो बैठे, तो कोई बुद्ध ही होगा, भले ही बुद्धत्व का थोड़ा अंश ही क्यो न हो..
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आजाद भारत का डायमंड थ्रोन जो गांधी ने बनाया, उसकी एक एक चूल मे वही कांग्रेस है। जिसकी आत्मा में गांधी ने तपस्या की महक है।
तो आप लाल किले पर परचम फहरा सकते हैं। लेकिन हिंदुस्तान के हृदय के डायमंड थ्रोन पर सिर्फ वही बैठ सकता है, जो गांधी जैसा हो।
पूरा नही, तो अधूरा
थोड़ा सा ही सही।
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जो कांग्रेस के खत्म होने की आशा में खुद कब्र की ओर बढ़ रहे है, याद रखें। बोधिवृक्ष भले बूढ़ा हो जाये, गल जाए, गिर जाए। और बेहया की झाड़ियां कितना भी फैल जायें, वे कभी पूजी न जायेंगी।
क्योकि पूजने को बोधिवृक्ष,
सतत रोपा जाता रहेगा।
❤️
पहलगाम
ढोल पीटा गया था "370 हट गया, हमने हटा दिया" अब अमन आएगा, अब आतंक भागेगा। लेकिन पहलगाम में जो हुआ, वह बताता है कि ढोल में सिर्फ आवाज थी, भरोसा नहीं।
गृह मंत्री जी, संसद में आपने सीना ठोक कर कहा था "जान दे देंगे इसके लिए!"
अब जब जानें गईं, वो भी आम नागरिकों की, तो क्या आप और आपकी सरकार भी कोई जवाब देंगे? या सिर्फ भाषणों में ही बहादुरी दिखेगी?
प्रधानमंत्री जी, आपने कहा था "नया कश्मीर", "विकास की गंगा", "शांति का सूरज"...बला बला बला..... अच्छा लगा था सुनने में.....
लेकिन हकीकत ये है कि कश्मीर छावनी बना है, और फिर भी लोग मारे जा रहे हैं। तो ये सुरक्षा किसके लिए थी?
और हां, सर एक बात और,
लोग आपसे सवाल नहीं पूछते,
डरते हैं।
क्योंकि सवाल पूछना आजकल राजद्रोह बन गया है,
क्योंकि आपकी सरकार में सवाल पूछना यानी जेल जाना,
क्योंकि आपने माहौल ऐसा बना दिया है कि
"सवाल उठाओ, और अगला पता, पुलिस, NIA या ED का हो सकता है।"
पर फिर भी पूछना पड़ेगा, और सबको डाल दीजिएगा जेल में, जो भी इस घटना पर आपसे या आपकी सरकार से सवाल पूछेगा तो।
जब सरकार सुरक्षा का ढोल पीटती है, और फिर लोग मारे जाते हैं, तो जवाबदेही किसकी होती है?
सिर्फ आम आदमी की जान जाने पर एक लाइन की निंदा…
इतनी सस्ती हो गई है क्या जान, साहब?