जानाँ! अब मानो भी तुम बात हमारी
हर बार इनकार कहाँ अच्छा लगता है
है वस्ल की रातें तेरा उदास सा चेहरा
ये मिलन की आरजू पर पहरा लगता है
ये गुस्सा नाक ही पर अच्छा लगता है
गर दिल तक जाए तो खतरा लगता है
जानाँ! तेरा झगड़ा तो अच्छा लगता है
पर ज्यादा तगड़ा कब अच्छा लगता है
~सौरभ ✍️✍️