सोचिए, ऐसा क्या गुनाह किया था इन बच्चों ने कि इन्हें गोली मार दी गई?
इन्होंने सरकार से सिर���फ़ तीन चीज़ें माँगी थीं - शिक्षा, रोज़गार, और जवाबदेही।
एक छात्र के पैर की हड्डी AK 47 की गोली से टूट गई। सेना में जाकर देश की सेवा करने का उसका सपना भी उसी के साथ चला गया। दो और छात्रों के कंधों को गोली चीरती हुई निकल गई।
ये अपराधी नही��� थे। ये ग़रीब घरों के वो बच्चे थे जो अपने परिवार के सपने लेकर पढ़ने निकले थे - किसी को अच्छी नौकरी चाहिए थी, किसी को अपने घर के हालात बदलने थे।
गोली के घाव भर जाएंगे - पर जो डर इन बच्चों के भीतर बैठ गया है, उसका इलाज किस अस्पताल में होता है?
प्रधानमंत्री जी, मुख्यमंत्री जी - इनकी टूटी हड्डी तो जुड़ जाएगी। क्या इनका टूटा हुआ सपना आप लौटा सकते हैं?
आज फिर संविधान का कत्ल हुआ, लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ाई गईं और कानून को कुचला गया।
सहारनपुर में सुबह 5 बजे एक षड्यंत्र रच कर हमारी मस्जिद को शहीद कर दिया गया। यह सिर्फ एक मस्जिद पर हमला नहीं, बल्कि संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।
क्या देश में मुसलमान होना जुर्म होगया है ?
एक नमाज़ी पर FIR करना मुस्लिम महिला पत्रकारों पर लाठी डंडे बरसाना ये मुसलमानों पर ज़ुल्म है।
इसका जवाब जनता अपने वोट से देगी और बीजेपी को सत्ता से उखाड़ फेंकेगी।
सहारनपुर कलेक्ट्रेट में स्थित प्राचीन मस्जिद का ध्वस्तीकरण अत्यंत अफसोसजनक है। इस कार्रवाई ने एक बार फिर यह बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर संविधान और कानून सभी के लिए समान हैं तो उनके लागू करने में दोहरा मापदंड क्यों दिखाई देता है? आज बुलडोजर न्याय ���ी निशानी कम और बदले, भेदभाव और नफरत की राजनीति का हथियार बनता जा रहा है।
यह मामला केवल एक मस्जिद का नहीं, बल्कि संविधान की सर्वोच्चता, कानून के शासन, धार्मिक स्वतंत्रता, नागरिक समानता और राज्य की निष्पक्ष भूमिका का सवाल है।
1991 का Places of Worship Act आज भी मौजूद है। इसी तरह नए वक्फ कानून में ��ी “वक्फ बाई यूजर” की धारा मौजूद है। यह मस्जिद वक्फ बोर्ड में दर्ज है जिसका नंबर 451 है। जबकि जमीन के पुराने रिकॉर्ड में याकूब खान और वहीद खान के से जमीन दर्ज हैं। मस्जिद कमेटी ने अदालत में 1911 से संबंधित दस्तावेज, नगरपालिका रिकॉर्ड और पुराने राजस्व अभिलेख प्रस्तुत करके यह पक्ष रखा था। ऐसे ऐतिहासिक और कानूनी साक्ष्यों को नजरअंदाज करके ध्वस्तीकरण की कार्रवाई न्याय की उसूलों पर गंभीर सवाल खड़े ��रती है।
अगर अवैध कब्जा या अतिक्रमण ही कार्रवाई का मापदंड है तो यही मापदंड हर धर्म और हर वर्ग के लिए समान होना चाहिए। देश के विभिन्न हिस्सों में सरकारी जमीनों, सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर दशकों से मौजूद दूसरी धार्मिक निर्माणों के खिलाफ भी क्या प्रशासन इसी जल्दबाजी, सख्ती और मापदंड से कार्रवाई करता है? अगर नहीं, ��ो किसी एक धार्मिक स्थल के खिलाफ असाधारण सख्ती समान न्याय के सिद्धांत के विपरीत महसूस होती है।
भारत किसी एक धर्म या वर्ग का नहीं, हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और सभी धर्मों को मानने वालों का साझा वतन है। संविधान ने किसी को पहले और किसी को दूसरे दर्जे का नागरिक नहीं बनाया है।
हम किसी विशेष रियायत के इच्छुक नहीं हैं, केवल समान न्याय चाहते हैं। हमारा सवाल सीधा है: जो कानून मस्जिद के लिए है, वही हर धार्मिक स्थल के लिए क्यों नहीं? जो मापदंड मुसलमान के लिए है, वही दूसरे नागरिक के लिए क्यों नहीं? संविधान और कानून अगर सभी के लिए हैं तो उनका संरक्षण और लागू करना भी सभी के लिए समान होना चाहिए।
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