Mr @SudhanshuTrived,
इलेक्शन कमीशन के खुलासों और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब यह साफ हो गया है कि पिछले दो-तीन सालों में जो भी बीजेपी सरकारें बनी हैं, वे वोट चोरी और धोखाधड़ी के कारण बनी हैं।
बीजेपी की राष्ट्रीय सरकार चोरों और चोरी की सरकार है।
न तो ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा और न ही किसी कोर्ट की जांच इस डकैती की सजा के बराबर है।
अब एकमात्र रास्ता यही बचता है कि भारत सरकार को बर्खास्त किया जाए और लोकसभा के चुनाव दोबारा करवाए जाएं।
बंगाल में बने ट्रिब्यूनल के जज ख़ुद बता रहे हैं SIR की भीषण सच्चाई.
न नोटिस दे सकते हैं
न वर्चुअल सुनवाई कर सकते हैं
न वोटर को उसका वोट काटने के सूचना दे सकते हैं
और अगर सुनवाई में वोटर जेनुइन है तो भी उसे पोर्टल पर अपलोड नहीं कर सकते
बिना एप्लीकेशन के 16 लाख अज्ञात वोटर जोड़ दिये गए ये गेम का थर्ड पार्ट है, फर्स्ट पार्ट SIR, second part है form 7 और ये थर्ड पार्ट है घोस्ट वोटर जो वोटिंग वाले दिन ही प्रकट होंगे !!
फिर आप सोचेंगे कि लोग बीजेपी के खिलाफ बोल तो रहे थे पर वोट बीजेपी को ही दे दिया, ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल के थ्रू इसे वैलिड कर दिया जाएगा !!
यूपी के सभी पार्टियों को ये 16 लाख की लिस्ट मांगनी चाहिए और कार्यकर्ता भेजकर वेरिफिकेशन करवाना चाहिए ।।
वाजपेयी आडवाणी सबसे लंबे समय तक विपक्ष में रहे क्या किसी ने देखा कि पुलिस ने कभी उनके साथ बदसलूकी की हो?
पुलिस वैसा ही करती है जैसा उसे करवाया जाता है।
राहुल गांधी के साथ कई बार हो चुका है। अभी सड़क पर खींचा घसीटा गया नाक से खून निकला।
इससे पहले हाथरस जाते हुए सड़क पर धक्का मार कर गिरा दिया गया।
प्रियंका ने अपने हाथों पर लाठियां रोकीं।
दिग्विजय सिंह अशोक गहलोत जीतू पटवारी दीपेंद्र हुड्डा बहुत सारे नेताओं पर पानी की तेज धार उन्हें चोट पहुंचाने के उद्देश्य से मारी गई।
अभी जन्तर मन्तर पर आम लड़के लड़कियों के साथ क्या हो रहा है सब देख रहे हैं।
लड़कियों के साथ महिला पत्रकारों के साथ यौन हिंसा हो रही है।
और आरोपियों को बचाने के लिए पूरा इकोसिस्टम लगा दिया जाता है।
इससे पहले कभी नहीं सुना की लड़कियों पर ही उल्टे आरोप लगाए जा रहे हों।
उन्हें ही कस्टडी में लिया जा रहा हो।
यही फर्क है।
वहां सुषमा स्वराज झूठे आरोप लगाने में माहिर थीं।
एक बता देते हैं उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने फाइल फेंक कर मारी।
वे भी कभी कांग्रेस के समय में पुलिस पर ऐसे आरोप नहीं लगा सकीं।
बात-बात पे पूछते हैं- 2014 से पहले क्या होता था?
अरे भाई, भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन होते थे। सत्ता में बैठे लोगों पर भी आरोप लगते थे तो गिरफ्तारी होती थी। ए. राजा और कनिमोई जेल गए थे, जबकि उनकी पार्टी सरकार का हिस्सा थी।
आज अपनी सरकार के लोगों पर आरोप लगें तो जाँच और जवाबदेही माँगकर देख लो। सवाल पूछने वाले से ही पूछने लगते हैं- 2014 से पहले क्या होता था!
भाई, उसी भ्रष्टाचार को खत्म करने के नाम पर तो वोट लिया था। अब उसी का उदाहरण देकर अपने लिए छूट क्यों माँगते हो?
ज्ञानेश कुमार ने सफाई देनी बंद कर दी। लेकिन भाजपाइयों की सफाई रुक नहीं रही है, क्योंकि असली चोर ज्ञानेश नहीं, भाजपा है।
ज्ञानेश तो आज सुप्रीम कोर्ट में फॉर्म 6 के मुद्दे पर फंस चुके हैं। जैसे-जैसे SIR की वैधता जांची जाएगी, ज्ञानेश फंसेंगे।
जस्टिस नरीमन, जस्टिस भुइयां जैसे लोग कह रहे हैं कि SIR में गैरकानूनी काम हुआ है लेकिन भाजपाई उसे शुद्धता बता रहे हैं। चोरी को शुद्धता साबित करना ही इनका राष्ट्रवाद है।
यह सुप्रीम कोर्ट ही है जिसने कहा था कि "SIR में कोई बाधा बर्दाश्त नहीं करेंगे।"
योगेंद्र यादव खुद कोर्ट में पेश हुए। तार्किक ढंग से दलील दी कि यह सब गलत हो रहा है। जिंदा लोगों को कोर्ट में पेश किया कि इनके नाम कैसे काटे जा सकते हैं। माननीय कोर्ट ने क्या किया? आधार को मान्य करार दिया और योगेंद्र यादव की तारीफ करके मामला रफा-दफा कर दिया।
ममता बनर्जी खुद कोर्ट में पेश हुईं। दलील दी कि योग्य मतदाताओं के नाम काटना गलत है। राज्य में 27 लाख लोग वोटर लिस्ट से हटा दिए गए। आखिरकार कोर्ट ने क्या किया? कहा "कोई बात नहीं, अगली बार वोट दे देना।"
क्या बिना वजह, कुछ दिन या कुछ साल के लिए लोकतंत्र को सस्पेंड भी किया जा सकता है? क्या मेरी नागरिकता किसी की इच्छा या दया पर आधारित है? क्या नागरिकता सरकार की मनमानी के बावजूद मिली हुई भीख है?
यह कैसे कहा गया कि "अगली बार वोट दे देना"? जिन 1 लाख लोगों की अपील पर फैसला हुआ, उसमें से 93% नागरिकों के पक्ष में फैसला हुआ, क्या अब भी कोर्ट को नहीं लगा कि उनसे गलती हुई है?
मीडिया में सैकड़ों रिपोर्ट आईं कि कैसे SIR के बहाने लोकतंत्र का जनाजा निकाला जा रहा है, लेकिन कोर्ट ने कोई संज्ञान नहीं लिया।
पिछले कई सालों से बड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट का रवैया अजीब रहा है। वे केस सुनने को तैयार होते हैं। सुनवाई करते हैं। बहुत तार्किक और उम्मीद जगाने वाली टिप्पणियां करते हैं। लेकिन फैसला वह आता है जो नहीं आना चाहिए।
क्या सुप्रीम कोर्ट कभी यह बताएगा कि उनकी निगहबानी में बंगाल के 27 लाख लोगों से वोट का अधिकार क्यों छीना गया? क्या कोर्ट यह चाहता है कि लोग कोर्ट से न्याय की आशा और संविधान में भरोसा करना छोड़ दें?
(मैं कोई सुप्रीम कोर्ट की आलोचना के लायक नहीं हूं। जो देख रहा हूं, बस वही कह रहा हूं। इसे कोर्ट के प्रति एक सामान्य नागरिक की निराशा समझा जाए।)
"हमने बदले हुए फॉर्म-6 को अप्रूव नहीं किया, अगर गैरकानूनी काम हुआ है तो नतीजे भुगतने पड़ेंगे" - सुप्रीम कोर्ट
लगता है कि ज्ञानेश समेत सभी वोट चोरों और लोकतंत्र के लुटेरों के पाप का घड़ा भर गया है।
In 2002, an IIT Kanpur civil engineer working as an IES officer wrote to Prime Minister Vajpayee, exposing corruption in the $10 billion Golden Quadrilateral Corridor - India's biggest highway project.
Designed to construct 14,000 km of 4-lane expressways connecting Delhi, Mumbai, Chennai, and Kolkata, it stands as the modern bedrock of Indian infrastructure.
He left his letter to the Prime Minister's Office (PMO) unsigned. Knowing the deadly stakes, Dubey attached his credentials on a separate sheet with an explicit instruction:
"Before moving the file, please remove the attachment containing my particulars to ensure secrecy."
But the PMO did not redact that information. It forwarded his complaint down the ministry chain with his identity attached. His name reached the very people he had exposed.
One year later, on his 31st birthday, Satyendra Dubey was shot dead outside Gaya railway station by the mafia.
They called it armed robbery. His family never believed it. The men who ran the murder racket were never touched, even after a CBI probe.
His death led to the Whistleblowers Protection Act in 2014. It was never brought into force, and it still doesn't protect a whistleblower's identity to this day.
His father, a poor sugar mill clerk with 7 kids, spent his entire life’s savings to raise an honest son who went to
@IITKanpur and then joined the IES to serve the nation.
On November 27, 2003, instead of celebrating Satyendra’s 31st birthday, that old man received his son’s bullet-riddled body in a wooden box, forced to weep over the casket of a hero he spent a lifetime raising for a country that wasn't brave enough to keep him alive.
'Form 6 में बदलाव को हमने अप्रूव नहीं किया था '
बोले CJI सूर्यकांत.
इतना बोलकर सुप्रीम कोर्ट का काम खत्म हो गया ?
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट का नाम लेकर लिखित बयान में झूठ बोला तो बुलाइए कोर्ट में झूठे ज्ञानेश कुमार को .
तब जानें कि आप सुप्रीम कोर्ट हैं .
चुनाव आयोग ने दावा किया था कि SIR प्रक्रिया के लिए ऑनलाइन 'फॉर्म 6' के साथ जोड़े गए नए बदलाव को सुप्रीम कोर्ट ने मंज़ूरी दी थी।लेकिन आज CJI सूर्य कांत ने साफ़ कर दिया है कि सुप्रीम कोर्ट ने SIR के दौरान वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 के किसी भी बदले हुए रूप को मंज़ूरी नहीं दी है।यानि एक और झूठ पकड़ा गया…
NSA को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा की डीएम के खिलाफ सख़्त फ़ैसला दिया है। डीएम मेधा रूपम ने आकृति चौधरी पर फ़र्ज़ी आधार पर NSA लगा दिया और महीनों जेल में डाल दिया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ज़िलाधिकारी मेधा रूपम की सैलरी से पाँच लाख का हर्जाना वसूल कर आकृति को देने के लिए कहा है। फ़ैसले के इसी हिस्से पर सुप्रीम कोर्ट ने अभी रोक लगाई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में IAS/IPS के फ़र्ज़ीवाड़े को लेकर चेतावनी भी दी है।
दूसरा मामला देखिए। सुप्रीम कोर्ट ने संभल मामले में फैसला दिया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मुल्ला अफ़रोज़ को ज़मानत दे थी मगर उन पर NSA लगा दिया और जेल में डाल दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शक्तियों का अवैध इस्तेमाल हुआ है। यूपी सरकार पर दस लाख का जुर्माना लगा दिया है।
फ़र्ज़ी तरीके से NSA लगाना, महीनों जेल में डालना भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का रूटीन काम हो गया है। व्यवस्था के भीतर एक तरह की अराजकता को मान्यता मिल गई है। कोर्ट भी ऐसे मामलों में याचिकाओं को टहलाता रहता है। जब तक फैसला आता है, व्यक्ति कई महीने जेल में रह चुका होता है। कोई बड़ी बात नहीं कि ऐसा प्रयास हो। क्योंकि भारतीय व्यवस्था किसी को फ़र्ज़ी केस में फँसाना छोड़ दे तो लोग संवैधानिक पदों पर बैठना छोड़ देंगे। एक आदमी नहीं मिलेगा इन पदों पर काम करने के लिए। उन्हें पावर इसीलिए चाहिए होता है कि फ़र्ज़ी मामले में जेल में डाल दें, घर मकान तोड़ दें और अब वोट का अधिकार छीन लें।
इसमें आरक्षण वर्गीकरण कहाँ से आ गया?
डॉक्टर ने आरक्षण वर्गीकरण देखा था या फिर मरीज की जाति देखकर उसके इलाज से मना कर दिया?
यहाँ पर डॉक्टर सवर्ण जाति से था, इसलिए उसने मुसहर जाति से आने वाली महिला का इलाज करने से मना कर दिया।
SC/ST एक्ट, जिसे जीजा एक्ट कहा जाता है, कुछ नहीं कर पा रहा है,
इसके कारण जातिवादियों के हौसले बुलंद हैं।
जीजा एक्ट को थोड़ा और कठोर बनाना पड़ेगा, तभी ऐसी जातिवादी मानसिकता रखने वाले लोग सुधरेंगे।