@CommonBS786OM हम उस दौर के हैं जहाँ दिलों का मोल था,
हर रिश्ते में मोहब्बत का कुछ और ही बोल था।
आज ढूँढते हैं लोग सुकूँ सारी दुनिया में,
हमारे दौर में तो सुकूँ ही सुकूँ था।
हम उस दौर के हैं जहाँ दिलों का मोल था,
हर रिश्ते में मोहब्बत का कुछ और ही बोल था।
आज ढूँढते हैं लोग सुकूँ सारी दुनिया में,
हमारे दौर में तो सुकूँ ही सुकूँ था। ❤️
@_BazamESukhan@VakilAh60249105 “जिसे अपना समझकर हमने हर राज़ बताया था,
वही शख़्स हमारी दीवार में दरार बन गया…
हमने तो साये को भी धूप से बचाया था,
वक़्त आया तो वही साया वार बन गया।”
@ItzNaazu_ रिश्ते निभाने की चाहत थी, कोई सौदा तो नहीं था,
हमने दिल से चाहा था, मगर शायद वो उनका इरादा तो नहीं था।
जिसे अपना समझकर हर दर्द बताया था कभी,
वो किसी और का हो गया… हमें इसका गिला भी नहीं था। 😌
@051973L@arvindS1312 मजबूत बूथ-स्तरीय प्रबंधन (जैसे पन्ना प्रमुख, कैडर और वोटर टर्नआउट पर काम करना) के बिना इस जनसमर्थन को वोटों में बदलना मुश्किल साबित होता है।
ग्राउंड लेवल का यह बुनियादी ढांचा ("चुनाव जीतने वाली मशीनरी") ही किसी भी दल के लिए निर्णायक अंतर पैदा करता है।
@051973L@arvindS1312 संगठन बनाम सोशल मीडिया
डिजिटल मंचों और संसदीय बहसों में सक्रियता से माहौल तो बनता है, लेकिन चुनावी सफलता के लिए केवल ऑनलाइन मौजूदगी काफी नहीं.
@gujratsamachar यह दावा झूठा है।: क्वीन एलिज़ाबेथ का नाम तो इस दावे में ऐतिहासिक रूप से ही गलत है। 1911 में “जन गण मन” लिखा गया था, जबकि एलिज़ाबेथ द्वितीय उस समय पैदा भी नहीं हुई थीं। उस समय ब्रिटिश सम्राट King George V थे।