@RailMinIndia@RailwaySeva @drmdhanbad @PMOIndia@AshwiniVaishnaw@cpgrams
पिछले कई महीनों से ट्रेन संख्या 53344 लगातार 4–5 घंटे तक विलंब से चल रही है। यह अब कभी-कभार की समस्या नहीं, बल्कि लगभग रोज़ की स्थिति बन चुकी है। समय-सारणी में ट्रेन के रात लगभग 10:30 बजे गोमो पहुँचने का समय है, लेकिन ट्रेन अक्सर रात 2:30–3:00 बजे के आसपास पहुँचती है।
इस संबंध में कई बार शिकायतें की गई हैं, रेलवे को ट्वीट भी किया गया है तथा Centralized Public Grievance Redress And Monitoring System (CPGRAMS) पर भी शिकायत दर्ज की गई, लेकिन शिकायतें ADRM अमित कुमार के द्वारा बंद कर दी जाती हैं और समस्या जस की तस बनी हुई है।
CPGRAMS शिकायत संख्या:
🔹 MORLY/E/2026/0028314
🔹 MORLY/E/2026/0029417
रेलवे प्रशासन को यह समझना होगा कि बड़का काना–गोमो के बीच चलने वाली यह ट्रेन एक महत्वपूर्ण कनेक्टिंग/लोकल ट्रेन है। शाम के समय बड़ी संख्या में यात्री इसी उम्मीद में इस ट्रेन से यात्रा करते हैं कि वे समय पर गोमो पहुँचकर वहाँ से दूसरी मेल/एक्सप्रेस ट्रेनें पकड़ सकें, जो अन्य शहरों और राज्यों की ओर जाती हैं।
लेकिन जब ट्रेन अपने निर्धारित समय से 4–5 घंटे देर से पहुँचती है, तो यात्रियों की कनेक्टिंग ट्रेनें छूट जाती हैं, पूरी यात्रा की योजना बिगड़ जाती है और उन्हें घंटों रेलवे स्टेशन पर परेशान होना पड़ता है।
समस्या केवल इसी ट्रेन तक सीमित नहीं है। दोपहर की लोकल ट्रेनें भी विलंबित हैं और शाम की लोकल ट्रेनें भी। यदि रेलवे ने समय-सारणी निर्धारित की है, तो उसका पालन सुनिश्चित करना रेलवे की जिम्मेदारी है।
यदि रेलवे इस ट्रेन को नियमित समय पर चलाने में सक्षम नहीं है, तो फिर ऐसी समय-सारणी बनाए रखने का क्या औचित्य है जिसे रोज़ पूरा ही नहीं किया जा रहा? यदि ट्रेन को समय पर चलाना संभव नहीं है, तो रेलवे को इसके संचालन और समय-सारणी की वास्तविक समीक्षा करनी चाहिए, ताकि यात्रियों को कम-से-कम एक भरोसेमंद सेवा मिल सके।
रेलवे से अनुरोध है कि इस मामले को केवल शिकायत बंद करके समाप्त न किया जाए, बल्कि ट्रेन संख्या 53344 के लगातार विलंब के वास्तविक कारण की जांच, संबंधित परिचालन व्यवस्था की समीक्षा और बड़का काना–गोमो मार्ग पर लोकल/कनेक्टिंग ट्रेनों को समयबद्ध एवं नियमित करने के लिए ठोस कार्रवाई की जाए।
समय-सारणी केवल कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर भी लागू होनी चाहिए। यात्रियों को ऐसी रेल सेवा चाहिए जिस पर वे भरोसा कर सकें।
कृपया इस मामले में जवाबदेही तय करते हुए स्थायी समाधान किया जाए।
#IndianRailways #RailwaySeva #Dhanbad #Gomoh #RailwayDelay #Train53344
#IndianRailways #RailwaySeva #Dhanbad #Gomoh #RailwayDelay #Train5334
फैक्ट्स की दुनिया में आपका स्वागत है!😄
पोस्ट में लिखा है कि मोदी ही “अकेले प्रधानमंत्री” हैं जिन्होंने सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया।
बस एक छोटी-सी दिक्कत है—1991 में नरसिंह राव सरकार ने भी मौजूदा आरक्षण से बाहर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10% आरक्षण का प्रावधान किया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने Indra Sawhney फैसले में रद्द कर दिया।
हाँ, भारत सरकार ने 2019 में 103वें संविधान संशोधन के जरिए EWS के लिए 10% आरक्षण संवैधानिक रूप से लागू किया, जो SC/ST/OBC आरक्षण से अलग है और सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में 3:2 बहुमत से इसे बरकरार रखा।
RSS ने हमेशा BJP ki मदद कियाऔर सलाह दिया, संघ बताता आया है क्या करना है, भाजपा की सुनी नहीं कभी इसलिए तो 8 संघियों पे ED का छापा करवा दिया था। अगर भाजपा का बस चले तो वो संघ में भी रिजर्वेशन ले आए
अब बाकी “BJP ही अकेली”, “RSS ही अकेला” और अंत में “सब सवर्ण विरोधी” वाला निष्कर्ष…
भाई साहब, इतिहास लिख रहे हैं या ट्विटर पर नैरेटिव बना रहे हैं? 😂
*राजनीति करिए, जरूर करिए—लेकिन फैक्ट्स को एडिट करके नहीं।
वरना अगली बार इतिहास की किताब भी मांग लेगी। 😄
झा साहब, इतिहास की जानकारी नई पीढ़ी तक पहुँचना अच्छी बात है, लेकिन लोकतंत्र में केवल इतिहास बताना ही पर्याप्त नहीं है। वर्तमान के सवालों का जवाब देना भी उतना ही जरूरी है।
सांसद किसी व्यक्ति विशेष के नहीं, जनता के प्रतिनिधि होते हैं। जनता ने उन्हें इसलिए चुना है कि वे अपने क्षेत्र की समस्याएँ संसद और सरकार तक पहुँचाएँ और सरकार की योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुँचाएँ।
लेकिन जब गोंडा जैसे क्षेत्र की वर्तमान स्थिति पर सवाल उठते हैं, युवाओं के भविष्य, बेरोजगारी, शिक्षा, पेपर लीक और उन परिवारों की पीड़ा की बात होती है जिनके बच्चों ने इन परिस्थितियों में अपनी जान तक गंवाई—तो इन सवालों को राजनीति या किसी व्यक्ति विशेष की आलोचना कहकर टाल देना उचित नहीं है।
प्रधानमंत्री हों, मुख्यमंत्री हों, सांसद हों या विधायक—लोकतंत्र में कोई भी जनता के सवालों से ऊपर नहीं है। देश में पहले भी प्रधानमंत्रियों से सवाल पूछे गए हैं और उन्होंने संसद में जवाब दिए हैं। सवाल पूछना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी ताकत है।
छात्र अगर अपने भविष्य और परीक्षा व्यवस्था को लेकर प्रदर्शन करते हैं तो उन्हें नक्सली या देशविरोधी कहना समस्या का समाधान नहीं है। उन माता-पिताओं से पूछिए जिन्होंने पेपर लीक जैसी घटनाओं में अपने बच्चों को खोया है—उनका दर्द किसी राजनीतिक बयान से छोटा नहीं हो जाता।
विपक्ष इस पीड़ा को मुद्दा बनाएगा, यह राजनीति का हिस्सा है। लेकिन सरकार का दायित्व है कि वह उस पीड़ा को सुने, जवाब दे और व्यवस्था में सुधार करे।
हम किसी व्यक्ति विशेष को वोट नहीं देते, हम सरकार चुनते हैं। और सरकार चुनने के बाद सवाल पूछना हमारा अधिकार है। यही गणतंत्र भारत की खूबसूरती है—सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह है, जनता सत्ता के प्रति नहीं।
What a truly historic and proud moment for us Indians! 🇮🇳🙏
God Himself has apparently chosen to walk among us in the form of our beloved Prime Minister. He tried so hard to keep His divine identity hidden from us mere mortals, but how could the truly enlightened Indian citizenry possibly fail to recognise Him? 😂
And now, in His own words, He has even declared Himself to be “non-biological.” Well, that certainly explains everything! Who needs ordinary biology when you have divine origins? 😇
So blessed are we to live in a country where the Prime Minister isn’t merely a Prime Minister, but apparently something far more cosmic. Our ancestors could only dream of witnessing such a miracle.
Truly, the proudest moment in Indian history: God came to Earth, became our Prime Minister, tried to hide His identity—and we figured it out anyway. Jai Hind! 🇮🇳😂🙏
देखो कैसे एक देशद्रोही रिपोर्टर देशप्रेमी नेता जी से सड़क को लेकर सवाल पूछ रहा है। 😏
और हमारे देशप्रेमी नेता जी भी कितने प्यार से जवाब दे रहे हैं—
“अगर आपको सड़क पर जाना है, तो आप सड़क बनवा लो।”
कितनी अच्छी सरकार है, कितनी अच्छी व्यवस्था है! 👏
यहाँ सड़क के बारे में सवाल पूछना भी देशद्रोह हो जाता है। सवाल पूछो तो कह दिया जाता है—“देश के बारे में नहीं सोचता!”
तो क्या सड़क के बारे में सवाल पूछना अब देशद्रोह है? 😂
भाई, मुद्दा ये नहीं होना चाहिए कि बीजेपी हटाओ, कांग्रेस हटाओ, RJD हटाओ या NCP हटाओ।
मुद्दा ये होना चाहिए कि उन भ्रष्ट और नाकारा नेताओं को हटाओ जो जनता के लिए काम नहीं करते—पार्टी कोई भी हो।
हमें ऐसी पार्टी और ऐसे राजनेता चाहिए जो अपने आपको जनता से बड़ा न समझें। आखिर वो राजनेता बने ही क्यों हैं? जनता की वजह से।
अगर हम नौकरी करते हैं और अपना काम ठीक से नहीं करते, तो कंपनी हमसे सवाल पूछती है और जवाबदेही तय करती है। फिर जब हम अपने ही पैसे से सरकार चलाने के लिए नेताओं को चुनते हैं, तो हम उनसे सवाल क्यों नहीं पूछ सकते?
जब कोई कंपनी जनता से ऊपर नहीं हो सकती, तो कोई नेता या राजनीतिक पार्टी देश और जनता से ऊपर कैसे हो सकती है?
नेता कोई भी हो, पार्टी कोई भी हो—जनता के सवालों का जवाब देना और हर काम की accountability लेना जरूरी है।
चमचा क्या है?
आपकी परिभाषा के अनुसार शायद वह व्यक्ति, जो हर सवाल को “देशद्रोह”, हर असहमति को “नकारात्मकता” और हर जवाब माँगने वाले को “दिमागी नक्सल” समझ ले।
लेकिन मेरी समझ में देशहित में सवाल पूछने वाला चमचा नहीं, नागरिक होता है।
हम इस देश में टैक्स देते हैं—प्रत्यक्ष भी, अप्रत्यक्ष भी। गाड़ी खरीदते हैं तो टैक्स, रोड टैक्स देते हैं, पेट्रोल पर टैक्स देते हैं और सड़क पर निकलते हैं तो कई जगह टोल भी देते हैं।
अब अगर इतनी कीमत चुकाने के बाद सड़क की हालत पर कोई सवाल पूछ दे कि “भाई, पैसे तो पूरे लिए, सड़क कहाँ है?” तो उसे “एक ही मुद्दे पर 12 साल से खुंदस निकालने वाला प्राणी” बताना बड़ा सुविधाजनक तर्क है।
मंदिर में चंदा जनता ने दिया, श्रद्धा जनता की थी, पैसा जनता ने दिया—तो उस पैसे के इस्तेमाल पर सवाल भी जनता ही पूछेगी।
दान देने के बाद सवाल पूछने का अधिकार खत्म नहीं हो जाता।
और हाँ, अगर कोई “राष्ट्रभक्त सेक्शन” का प्रमाणपत्र बाँटने बैठा है, तो कृपया पहले यह समझ ले कि राष्ट्रभक्ति का मतलब सरकार की हर बात पर ताली बजाना नहीं होता।
लोकतंत्र में सरकार जनता की होती है, जनता सरकार की नहीं।
वैसे “उड़ता हुआ तीर” वाली कहावत भी कमाल है।
अगर देश की समस्या को अपना मानकर सवाल पूछना “उड़ता तीर पकड़ना” है, तो फिर शायद हमें उन लोगों की भी नई श्रेणी बनानी पड़ेगी जो सड़क टूटने पर आँखें बंद कर लेते हैं, टैक्स बढ़ने पर मुस्कुरा देते हैं और सवाल पूछने वाले को ही समस्या मान लेते हैं। 😄
और “राजमाता शिवगामी” वाला तंज भी अच्छा था।
लेकिन घर की तरह देश को भी अपना मानकर उसकी व्यवस्था, उसके पैसे और उसकी संपत्ति पर सवाल करना अगर “निजी समस्या” पालना है, तो हाँ—देश की समस्या मेरी निजी समस्या है, क्योंकि यह देश मेरा भी है।
सबसे मज़ेदार बात—आपने NASA वैज्ञानिक वाली उपमा दी।
विज्ञान की सबसे पहली शर्त ही है: सवाल पूछना।
हर चीज़ को बिना जाँचे स्वीकार कर लेना विज्ञान नहीं, अंध-समर्थन है।
और अंत में “चमड़े की ज़बान फिसलती है” वाली बात बिल्कुल सही है।
ज़बान फिसल सकती है, लेकिन भगवान ने बुद्धि और विवेक इसलिए दिया है कि लिखने से पहले दो बार सोचा जाए।
इसलिए बहन, असहमति को गाली, सवाल को खुंदस और आलोचना को “दिमागी नक्सल” कहना बंद कीजिए।
देश के हित में सवाल पूछने वालों की संख्या बढ़ेगी तो लोकतंत्र मजबूत होगा—चमचों की संख्या बढ़ेगी तो सिर्फ़ ताली तेज़ बजेगी। 😌
बाकी फैसला जनता कर लेगी कि देश को वैज्ञानिक सोच चाहिए या “हाँ जी” वाली सोच।
क्या अब अपने ही देश की दुर्व्यवस्था, नीतियों या सरकार के कामकाज पर सवाल पूछना भी गद्दारी हो गया है?
अगर कोई नागरिक या जनप्रतिनिधि सरकार और मंत्रियों से देश की व्यवस्था, जनता की समस्याओं, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई या विकास को लेकर सवाल पूछता है, तो उसे तुरंत “गद्दार”, “देशविरोधी” या “नकारात्मक” बताने की यह कैसी राजनीति है?
लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं, जिम्मेदारी है।
सरकार जनता के प्रति जवाबदेह है और सवाल पूछना उसी जवाबदेही का हिस्सा है।
देश से प्यार करने का मतलब यह नहीं कि देश की हर कमी पर आँखें बंद कर ली जाएँ।
बल्कि सच्चा देशप्रेम तो यही है कि जहाँ कमी दिखे, वहाँ उसे सुधारने की आवाज़ उठाई जाए।
और एक बात याद रखिए—
सिर्फ़ पढ़ा-लिखा होना काफी नहीं है, समझदार और विवेकशील होना भी ज़रूरी है।
किताबें पढ़कर डिग्री मिल सकती है,
लेकिन लोकतंत्र समझने के लिए सवाल पूछने की हिम्मत और जवाब सुनने का धैर्य दोनों चाहिए। 🇮🇳
दुबे जी, रिंकिया के पापा ने क्या कह दिया कि आप उसे इतना सीरियस लेकर बैठ गए? 😏
जिन्हें उनके अपने घर वाले सीरियस नहीं लेते, उस पर आप अपना इतना कीमती समय क्यों बर्बाद कर रहे हैं?
पुरानी-पुरानी चिट्ठियाँ निकाल रहे हैं, तस्वीरें ढूँढ रहे हैं, गूगल पर दस्तावेज़ खंगाल रहे हैं… अरे भाई, हम सब भारतीय पढ़े-लिखे हैं। हमें पता है कि नेहरू जी ने क्या किया, बाबासाहेब ने क्या किया, अटल जी ने क्या किया और पुराने प्रधानमंत्रियों ने क्या किया।
इतिहास अपनी जगह है, लेकिन जनता ने आपको इतिहास की चिट्ठीबाज़ी करने के लिए नहीं, काम करने के लिए चुना है।
अपना समय लगाइए कि गोड्डा ऐसी मिसाल बने कि दूसरे राज्यों के लोग भी कहें—
“हमारी constituency भी गोड्डा जैसी होनी चाहिए।”
अच्छे स्कूल बनें, अस्पताल बेहतर हों, सड़कें बनें, रोजगार आए, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएँ बढ़ें, लोगों का जीवन आसान हो—यही असली राजनीति है, यही असली काबिलियत है।
जनता अब यह नहीं पूछ रही कि रिंकिया के पापा ने क्या कहा था।
जनता पूछ रही है—“दुबे जी, आपने हमारे लिए क्या किया?”
और हाँ दुबे जी… किसी की तारीफ़ सुनकर इतना मत फूलिए।
हम सब इंसान हैं, चमड़ी की ज़ुबान है—फिसल जाती है। 😄
इतिहास की फाइलें बाद में भी खुल जाएँगी,
पहले जनता की फाइल खोलिए। 🇮🇳
@nishikant_dubey अरे दुबे जी, 1950-60 की चिट्ठियाँ निकालने में आपने जो मेहनत लगाई है, उसका आधा भी अगर गोड्डा की सड़कों, स्कूलों और बच्चों के मिड-डे मील की हालत सुधारने में लगा देते, तो जनता आपको चिट्ठियों के लिए नहीं, काम के लिए याद करती। 😏
हर सवाल का जवाब “कांग्रेस ने क्या किया?” में ढूँढना अब बंद कीजिए। जनता ने आपको इतिहास की किताबें खंगालने के लिए नहीं, आज की समस्याएँ सुलझाने के लिए चुना है।
सड़कें बदहाल हैं, स्कूलों की स्थिति चिंताजनक है, बच्चों को मिड-डे मील के नाम पर खराब खाना मिलने की शिकायतें हैं और दूसरी तरफ आप दशकों पुरानी चिट्ठियाँ खोज-खोजकर सोशल मीडिया पर उपलब्धि गिना रहे हैं!
गंगा एक्सप्रेसवे को अभी छह महीने भी नहीं हुए और उसकी गुणवत्ता को लेकर सवाल उठ रहे हैं—तो ज़रा अपनी सरकार के जिम्मेदार लोगों से भी पूछिए कि काम किस गुणवत्ता मानक पर हुआ है। जनता के टैक्स के पैसे से बनी सड़क अगर इतनी जल्दी सवालों के घेरे में आ जाए, तो सवाल पूछना जनता का अधिकार है।
दुबे जी, विपक्ष में रहते हुए सवाल पूछना आसान था; सत्ता में रहते हुए जवाब देना और काम करके दिखाना असली परीक्षा है।
और रही बात कांग्रेस की—वो इतिहास है। आप वर्तमान हैं और जनता आपका हिसाब वर्तमान के काम से करेगी।
इसलिए पुरानी चिट्ठियों की फाइल बंद कीजिए और अपने संसदीय क्षेत्र की फाइल खोलिए।
जनता को 1950 की चिट्ठियाँ नहीं, 2026 में सड़क, स्कूल, रोजगार और बेहतर सुविधाएँ चाहिए।
वरना अगली बार जनता भी यही पूछेगी—
“दुबे जी, चिट्ठियाँ तो बहुत ढूँढ लीं… अब थोड़ा काम भी ढूँढ लीजिए!” 😏
यह बहुत ही चिंतनीय विषय है।
अगर केंद्र में वर्षों से BJP की सरकार है और उत्तराखंड में भी कई वर्षों से BJP की सरकार है, तो पहाड़ों की संवेदनशीलता, बढ़ता पर्यटन, तीर्थस्थलों पर बढ़ता दबाव और आपदा के जोखिम का सिर्फ मूल्यांकन और गणना इतने वर्षों तक क्यों होती रही? सवाल यह है कि ठोस समाधान कब लागू किए गए?
सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ समस्या बताना या रिपोर्ट बनाना नहीं है। सरकार की असली जिम्मेदारी समाधान तैयार करना, उसे समय पर लागू करना और ऐसा सिस्टम बनाना है जिसे जनता स्वीकार कर सके।
अगर केदारनाथ, बद्रीनाथ और दूसरे पहाड़ी क्षेत्रों में यात्रियों की संख्या, पर्यावरणीय दबाव या सुरक्षा को लेकर आज नए नियम और सीमाएँ जरूरी लग रही हैं, तो सवाल यह भी होना चाहिए कि इन परिस्थितियों के लिए पिछले वर्षों में दीर्घकालिक योजना क्यों नहीं बनाई गई?
और जब हमें 2047 का विकसित भारत बनाने का सपना दिखाया जाता है, तो विकास का मतलब सिर्फ बड़े लक्ष्य और भाषण नहीं होना चाहिए। हमें आज ही ऐसे सिस्टम चाहिए जो सुरक्षित, टिकाऊ, वैज्ञानिक और जनता के लिए व्यावहारिक हों।
समस्या हर सरकार बता सकती है।
असली परीक्षा समाधान लागू करने की होती है।
जनता को तारीख नहीं, काम और परिणाम चाहिए।
आजकल सोशल मीडिया पर एक नैरेटिव चल रहा है कि अगर आप सरकार से सवाल पूछेंगे तो या तो आपको “देशद्रोही” कह दिया जाएगा, या अपने ही लोग आपको ट्रोल करने लगेंगे।
लेकिन शायद हमें एक बहुत आसान उदाहरण से समझना चाहिए—देश और सरकार एक चीज़ नहीं हैं।
मान लीजिए आपकी एक गाड़ी है। गाड़ी आपकी है, लेकिन आपने उसकी देखभाल के लिए एक सर्विस स्टेशन को जिम्मेदारी दी है। अब अगर गाड़ी में खराबी आती है, तो क्या आप गाड़ी को दोष देंगे? नहीं। आप उस सर्विस स्टेशन से सवाल करेंगे, जिसे आपने गाड़ी की देखभाल की जिम्मेदारी दी है।
ठीक यही रिश्ता देश और सरकार का है।
देश हमारा है—जनता का है। सरकार सिर्फ कुछ वर्षों के लिए चुनी गई व्यवस्था है, जिसे हमने देश चलाने और उसकी देखभाल करने की जिम्मेदारी दी है।
अगर सड़क खराब है, बेरोजगारी बढ़ रही है, महंगाई परेशान कर रही है, शिक्षा या स्वास्थ्य व्यवस्था में कमी है, भ्रष्टाचार है या सरकारी पैसे का गलत इस्तेमाल हो रहा है—तो सरकार से सवाल करना देश के खिलाफ जाना नहीं है।
बल्कि जिस देश को हम अपना घर मानते हैं, उसकी हालत बेहतर करने के लिए सवाल पूछना हमारी जिम्मेदारी है।
सरकार की आलोचना = देश की आलोचना नहीं।
सरकार से सवाल = देशद्रोह नहीं।
सरकार बदल सकती है, देश हमारा रहता है।
इस फर्क को समझना लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है।
देश से प्रेम का मतलब सरकार से अंधी भक्ति नहीं, बल्कि देश की बेहतरी के लिए सत्ता से सवाल करने का साहस भी है। 🇮🇳
महंगाई कोई भी सरकार जादू की छड़ी से खत्म नहीं कर सकती, राज भाई। लेकिन सरकार को जवाबदेह तो होना ही पड़ेगा। लोकतंत्र में जनता सिर्फ वोट देने के लिए नहीं होती, सवाल पूछने और हिसाब मांगने के लिए भी होती है।
हमारी सबसे बड़ी गलती यही है कि हम अपने नेताओं को नेता नहीं, भगवान बना देते हैं। फिर उनकी हर नीति का बचाव करते हैं, हर आलोचना को देशद्रोह समझ लेते हैं और सवाल पूछने वाले से ही लड़ने लगते हैं।
चाहे सरकार BJP की हो, कांग्रेस की हो या किसी और पार्टी की—सत्ता में बैठे हर व्यक्ति से सवाल होना चाहिए। चुनाव आयोग भी राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च और फंडिंग में पारदर्शिता व जवाबदेही पर जोर देता है।
महंगाई बढ़ी तो सरकार से सवाल, बेरोजगारी है तो सवाल, सरकारी पैसे का इस्तेमाल हुआ तो सवाल, किसी योजना में भ्रष्टाचार या लापरवाही हुई तो सवाल। और अगर सरकार ने अच्छा काम किया है तो उसकी तारीफ भी होनी चाहिए।
अंधभक्ति लोकतंत्र को मजबूत नहीं करती, सवाल करते नागरिक करते हैं।
नेता हमारे प्रतिनिधि हैं, मालिक नहीं।
भक्ति व्यक्ति की नहीं, संविधान और लोकतंत्र की होनी चाहिए।
जिस दिन इंटरनेट आम भारतीय की पहुँच से महँगा कर दिया जाएगा, उसी दिन बीजेपी IT सेल, सोशल मीडिया कैंपेन और ऑनलाइन प्रचार टीम बेरोज़गार हो जाएंगे।
लेकिन दूसरी तरफ प्रचार पर सरकारी खर्च भी कम नहीं रहा। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014-15 से 2024-25 के बीच केंद्र सरकार ने विज्ञापनों पर कुल ₹5,987.46 करोड़ खर्च किए—औसतन करीब ₹1.5 करोड़ प्रतिदिन।
और 2024 लोकसभा चुनाव में ADR के अनुसार BJP ने करीब ₹1,494 करोड़ खर्च किए, जो सभी दलों के घोषित चुनावी खर्च का लगभग 44.56% था।
तो सवाल सीधा है:
अगर सरकार और राजनीतिक दल अपनी बात जनता तक पहुँचाने के लिए करोड़ों रुपये प्रचार पर खर्च कर सकते हैं, तो क्या आम भारतीय को सस्ता और सुलभ इंटरनेट उपलब्ध कराना भी प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए?
इंटरनेट जनता की जरूरत है, किसी पार्टी की जागीर नहीं।
टैक्स जनता दे, प्रचार जनता के पैसे से हो और बोझ भी जनता ही उठाए—यह सवाल तो पूछा जाएगा।
#Internet #DigitalIndia #TaxpayersMoney #Accountability
उस पर कैसे बोलेंगे भाई? समाज में भेदभाव और बढ़ाना जो है!
पहले हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर समाज को बाँटा गया, अब हिन्दू समाज के भीतर ही जाति और वर्ण के नाम पर खाई बढ़ाई जा रही है। जब तक इंसान को इंसान से लड़ाने का सिलसिला चलता रहेगा, तब तक असली मुद्दे—रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और भ्रष्टाचार—पीछे छूटते रहेंगे।
हमें एक-दूसरे के खून का प्यासा नहीं, एक-दूसरे के साथ खड़ा होने वाला समाज बनाना है।
जाति और धर्म से ऊपर उठकर बराबरी, इंसानियत और भाईचारे की बात करनी होगी।
जनता के टैक्स का पैसा, जनता का सवाल
बहन जी, बच्चों को दिया जाने वाला “फ्री भोजन” किसी नेता या पार्टी की जेब से नहीं आता। यह हम सबके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टैक्स से चलने वाली सरकारी व्यवस्था है। इसलिए जब मिड-डे मील में नमक की जगह डिटर्जेंट जैसी गंभीर लापरवाही सामने आती है और बच्चे बीमार पड़ते हैं, तो सवाल सिर्फ खाने का नहीं, जवाबदेही और व्यवस्था की गुणवत्ता का है।
दूसरी तरफ, बड़े कर्जदारों के हजारों करोड़ के कर्ज OTS/सेटलमेंट के जरिए बहुत कम रकम में निपटाए जाने की खबरें सामने आती हैं। अगर ₹22,600 करोड़ के कर्ज को ₹6.5 करोड़ में सेटल करने का दावा सही है, तो इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए—किसका कर्ज था, किस बैंक का था, किस आधार पर सेटलमेंट हुआ और बैंक को कितना नुकसान हुआ?
आम आदमी की एक EMI में देरी पर नोटिस, पेनल्टी और कुर्की तक की कार्रवाई हो सकती है। फिर बड़े कर्जदारों के मामले में नियम, प्रक्रिया और जवाबदेही इतनी अलग क्यों दिखाई देती है?
गरीब के बच्चे हों या टैक्स देने वाला आम नागरिक—पैसा जनता का है, तो हिसाब भी जनता को चाहिए।
#MidDayMeal #TaxpayersMoney #BankLoans #Accountability
@RailMinIndia@RailwaySeva @drmdhanbad @PMOIndia@AshwiniVaishnaw@cpgrams
पिछले कई महीनों से ट्रेन संख्या 53344 लगातार 4–5 घंटे तक विलंब से चल रही है। यह अब कभी-कभार की समस्या नहीं, बल्कि लगभग रोज़ की स्थिति बन चुकी है। समय-सारणी में ट्रेन के रात लगभग 10:30 बजे गोमो पहुँचने का समय है, लेकिन ट्रेन अक्सर रात 2:30–3:00 बजे के आसपास पहुँचती है।
इस संबंध में कई बार शिकायतें की गई हैं, रेलवे को ट्वीट भी किया गया है तथा Centralized Public Grievance Redress And Monitoring System (CPGRAMS) पर भी शिकायत दर्ज की गई, लेकिन शिकायतें ADRM अमित कुमार के द्वारा बंद कर दी जाती हैं और समस्या जस की तस बनी हुई है।
CPGRAMS शिकायत संख्या:
🔹 MORLY/E/2026/0028314
🔹 MORLY/E/2026/0029417
रेलवे प्रशासन को यह समझना होगा कि बड़का काना–गोमो के बीच चलने वाली यह ट्रेन एक महत्वपूर्ण कनेक्टिंग/लोकल ट्रेन है। शाम के समय बड़ी संख्या में यात्री इसी उम्मीद में इस ट्रेन से यात्रा करते हैं कि वे समय पर गोमो पहुँचकर वहाँ से दूसरी मेल/एक्सप्रेस ट्रेनें पकड़ सकें, जो अन्य शहरों और राज्यों की ओर जाती हैं।
लेकिन जब ट्रेन अपने निर्धारित समय से 4–5 घंटे देर से पहुँचती है, तो यात्रियों की कनेक्टिंग ट्रेनें छूट जाती हैं, पूरी यात्रा की योजना बिगड़ जाती है और उन्हें घंटों रेलवे स्टेशन पर परेशान होना पड़ता है।
समस्या केवल इसी ट्रेन तक सीमित नहीं है। दोपहर की लोकल ट्रेनें भी विलंबित हैं और शाम की लोकल ट्रेनें भी। यदि रेलवे ने समय-सारणी निर्धारित की है, तो उसका पालन सुनिश्चित करना रेलवे की जिम्मेदारी है।
यदि रेलवे इस ट्रेन को नियमित समय पर चलाने में सक्षम नहीं है, तो फिर ऐसी समय-सारणी बनाए रखने का क्या औचित्य है जिसे रोज़ पूरा ही नहीं किया जा रहा? यदि ट्रेन को समय पर चलाना संभव नहीं है, तो रेलवे को इसके संचालन और समय-सारणी की वास्तविक समीक्षा करनी चाहिए, ताकि यात्रियों को कम-से-कम एक भरोसेमंद सेवा मिल सके।
रेलवे से अनुरोध है कि इस मामले को केवल शिकायत बंद करके समाप्त न किया जाए, बल्कि ट्रेन संख्या 53344 के लगातार विलंब के वास्तविक कारण की जांच, संबंधित परिचालन व्यवस्था की समीक्षा और बड़का काना–गोमो मार्ग पर लोकल/कनेक्टिंग ट्रेनों को समयबद्ध एवं नियमित करने के लिए ठोस कार्रवाई की जाए।
समय-सारणी केवल कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर भी लागू होनी चाहिए। यात्रियों को ऐसी रेल सेवा चाहिए जिस पर वे भरोसा कर सकें।
कृपया इस मामले में जवाबदेही तय करते हुए स्थायी समाधान किया जाए।
#IndianRailways #RailwaySeva #Dhanbad #Gomoh #RailwayDelay #Train53344
#IndianRailways #RailwaySeva #Dhanbad #Gomoh #RailwayDelay #Train5334
@ashwinravi99@RailwaySeva @DRM_Dhanbad Railway’s handling of this is shameless. Despite multiple complaints, there’s still no improvement. Train 53344 was delayed by 4+ hours yesterday—and today too. How long are passengers expected to suffer this daily negligence
दुबे जी, अच्छा लगा अपने पेपर की कटिंग लगाई और लोगों के स्वास्थ्य की चिंता जताई अपितु कुछ और कमियां है उसपे भी ध्यान दें
गोड्डा की जमीनी हकीकत: विकास के बीच 10 बड़ी समस्याएँ
गोड्डा (झारखंड) में विकास के दावों के साथ-साथ जमीनी स्तर की कई गंभीर चुनौतियाँ आज भी मौजूद हैं। उपलब्ध सरकारी रिपोर्टों और हालिया रिपोर्टिंग के आधार पर 10 प्रमुख मुद्दे👇
1️⃣ पेयजल संकट — 2023-24 के झारखंड आर्थिक सर्वेक्षण में गोड्डा उन जिलों में था जहाँ नल-जल कवरेज 40% से कम था। 2025 में भी ऐसे क्षेत्रों के लिए नए चापाकल/ट्यूबवेल की जरूरत पर सरकारी टेंडर जारी हुआ।
📌 स्रोत: Jharkhand Economic Survey 2023-24; Jharkhand e-Procurement, 2025
2️⃣ स्वास्थ्य सेवाओं की कमी — 2021-22 की जिला स्वास्थ्य योजना में PHC में बेसिक लैब, एम्बुलेंस, मानव संसाधन और दवाओं की उपलब्धता में सुधार की जरूरत बताई गई थी। 2025 में सुंदरपहाड़ी-बोआरीजोर में मलेरिया/कालाजार जैसी बीमारियों की समस्या भी सामने आई।
📌 स्रोत: PIP-Godda 2021-22; Hindustan, July 2025
3️⃣ शिक्षा की चुनौती — खासकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शिक्षकों और बुनियादी सुविधाओं तक समान पहुंच एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
4️⃣ रोजगार की कमी — स्थानीय स्तर पर पर्याप्त गैर-कृषि रोजगार नहीं होने के कारण ग्रामीण परिवारों की आय के विकल्प सीमित रहते हैं।
5️⃣ सिंचाई की समस्या — गोड्डा की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन सिंचाई की कमी और वर्षा पर निर्भरता किसानों के लिए बड़ी बाधा है।
6️⃣ गरीबी और बुनियादी सुविधाओं की कमी — जिले के दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्रों में गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सेवाओं की कमी आपस में जुड़ी हुई समस्याएँ हैं।
7️⃣ बिजली की गुणवत्ता — बिजली कनेक्शन होने के बावजूद कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित और पर्याप्त वोल्टेज की समस्या की रिपोर्टिंग हुई है।
8️⃣ सड़क और कनेक्टिविटी — दूरस्थ गांवों से स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल और बाजार तक पहुंच आज भी विकास का महत्वपूर्ण मुद्दा है।
9️⃣ खनन/औद्योगिक विकास का स्थानीय प्रभाव — कोयला और बिजली परियोजनाओं के आसपास भूमि, पानी, आजीविका और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
🔟 जल-स्रोतों पर दबाव — कुछ क्षेत्रों में भूजल स्तर और पारंपरिक जलस्रोतों पर दबाव की समस्या सामने आई है, जबकि दूसरी ओर पेयजल की मांग बढ़ रही है।
👉 सवाल यह है: अगर गोड्डा में बड़े ऊर्जा और खनन प्रोजेक्ट हैं, तो क्या उसका लाभ स्थानीय ग्रामीणों तक पर्याप्त रूप से पहुँच रहा है?
📚 मुख्य संदर्भ:
• Jharkhand Economic Survey 2023-24
• Jharkhand Economic Survey 2025-26
• Jal Jeevan Mission, Ministry of Jal Shakti
• Godda District Health PIP 2021-22
• Jharkhand e-Procurement, 2025
• Hindustan, July 2025
• https://t.co/m03Mxw2GhR, Godda ground report, 2025
#Godda #गोड्डा #Jharkhand #झारखंड #Development #विकास #GroundReality