@dr_prashantsb जिच्या वर maz prem ahe ti स्त्री बायको
Ek sunder lal रंगाचा डौलदार घोडा
त्याच्याजवळ जाऊन कुरवाळत लाड करने
1 bungalow average size
कुंपण नाही पण पाण्याच तळ
टेबलावर फळ
लगभग 100 साल पुरानी बात है।
एक वकील थे।
उन्हें कसरत का बहुत शौक था। कसरत की वजह से उनके कपड़े रोज ही पसीने से तर हो जाते थे। कपड़े धुल नहीं पाते थे तो, बदबू आती थी।
वकील साहब के एक बेटे थे, जो पिता की सेवा में लगे थे। उनके कपड़े धोने लगे।आख़िर पिता को मैले कपड़े पहने कैसे देख पाते?
बताना भूल गया। आप सोच रहे होंगे कि वकील थे तो कोई नौकर चाकर धो देता। और बेटे ने कपड़े धो दिए तो क्या हो गया?
बाप बेटे दोनों ही जेल में बन्द थे।
जेल में एक कुआँ था।
उसी से पानी खींचना पड़ता था।
एक दिन एक साथी कैदी ने देखा कि बेटा कुआं से पानी खींच कर निकाल रहा है। कुआं के पास रखे पत्थर पर कपड़े पड़े हैं।
साथी कैदी ने बेटे से पूछा, ‘ये तो बहुत ज्यादा कपड़े हैं?’ बेटे ने जवाब दिया, ‘पिताजी के भी हैं।’
साथी कैदी ने कहा, ‘अरे! मैं किसी को बुला देता हूं।’
बेटे ने कहा, ‘मैं उनका पुत्र हूं। दूसरे से कपड़े क्यों धुलवाऊं।’
साथ ही बेटा अपने बैरक की भी अपने हाथों सफाई करता था।
इस दौरान वह जेल में बंद अनपढ़ लोगों को पढ़ाया करता।
गांधी ने आह्वान दिया और आज के हिसाब से करोड़ों रुपये सालाना टैक्स देने वाले वकील बाप बेटे महलों को छोड़कर सड़कों और जेल में रहने लगे।
साल था 1922, लखनऊ जेल।
साथी कैदी का नाम जॉर्ज जोसेफ़, वकील बाप मोतीलाल नेहरू और बेटा...समझ ही गए होंगे? जवाहरलाल...
अरे वही...व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम के अनुसार जिसके कपड़े पेरिस धुलने जाते थे, और अब वो कुएं से पानी खींच कर जेल में अपने पिता के कपड़े धोता था।
किस क़िरदार को जवाहरलाल ने नहीं निभाया?
देश की आज़ादी के लिए जेल दर जेल भटकते हुए भी एक पति, पिता , पुत्र और बाद में देश का प्रधानमंत्री...
एक पिता मोतीलाल, एक पुत्र जवाहरलाल
एक पिता जवाहरलाल, एक पुत्री प्रियदर्शिनी इंदिरा
#HappyFathersDay
(अगर कोई जोम्बी लिंक या रिफ्रेंस मांगे तो बोलना सर्च कर लो, और दामु का कोई फोटो दिखाओ)
(पुरानी पोस्ट का एक अंश)
त्यांच्यासाठी प्रश्न मांसाहाराचा नव्हताच. प्रश्न आहे तो वर्चस्ववादी विचारसरणीचा. स्वतःला इतरांपेक्षा श्रेष्ठ समजण्याचा आणि वेगळे सिद्ध करण्याचा.
स्वतःसाठी वेगळ्या वसाहती, वेगळ्या इमारती जिथे मराठी माणसाला घर घेणे कठीण आहे, वेगळ्या खाद्यपद्धती, वेगळ्या चालीरीती. पण जेव्हा या गोष्टींच्या आधारे इतरांना कनिष्ठ मानले जाते तेव्हा प्रश्न केवळ परंपरेचा राहत नाही तो वर्चस्ववादाचा बनतो.
अंजना ओम कश्यप ने पत्रकारिता नामकी चीज कभी नहीं की।
शुरू में थोड़ा समय एक चैनल के लिये फील्ड रिपोर्टिंग की फिर टीवी एंकरिंग ही कर रही हैं।
एक टीवी एंकर और पत्रकार में बहुत अंतर होता है।
प्रिंट मीडिया का एक खबरची पत्रकार बहुत कुछ झेलता है और उसके हजारों हाथ हो जाते हैं अगर ईमानदारी से काम कर रहा है तो।
उसके दोस्त दुश्मन भी कायदे के होते हैं।
टीवी के स्टूडियो से एंकरिंग करने वाले और कभी कभी नोएडा छोड़ जॉब में ही हॉलिडे मनाने वाले एंकर्स को पत्रकार कहना वैसा है जैसे घरेलू पालतू बिल्ली को तेंदुआ बोलना।
आपका शौक है।
बिल्ली का नाम आप टाइग्रेस रखेंगे या लायनेस।
पर दरअसल वो एक घरेलू बिल्ली ही है जिसने जंगल का एंवायरमेंट देखा ही नहीं।
दोस्त दुश्मन दूर की बात।
उनका नाम मोहम्मद आमिर खान था।
20 फरवरी 1998 की रात, उनकी मां ने उन्हें पुरानी दिल्ली में दवा लेने भेजा था। वह सिर्फ 18 साल के थे।
लेकिन वह कभी दुकान तक नहीं पहुंच पाए।
सादे कपड़ों में कुछ लोगों ने रास्ते में उन्हें रोक लिया। आमिर को नहीं पता था कि वे पुलिस वाले हैं। उन्हें एक सुनसान इमारत में ले जाया गया। सात दिनों तक गैरकानूनी हिरासत में रखा गया। यातनाएं दी गईं। खाली कागज़ों पर जबरन हस्ताक्षर करवाए गए।
फिर दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने उन्हें अदालत में पेश किया और 1996 से 1997 के बीच दिल्ली, गाज़ियाबाद, रोहतक और सोनीपत में हुए 19 बम धमाकों का आरोपी बना दिया।
मीडिया के सामने उन्हें आतंकवादी घोषित कर दिया गया।
परिवार को कोई सूचना नहीं दी गई। उनके घरवाले कई दिनों तक थानों के चक्कर लगाते रहे।
आमिर ने 14 साल जेल में बिताए। टॉर्चर सहा। एकांत कैद झेली। अदालत में एक-एक कर केस टूटते गए, सबूत फर्जी साबित होते गए।
2012 में उन्हें 19 में से 17 मामलों में बरी कर दिया गया। बाकी दो केस लंबित रहे। तब तक वह जेल में उतना समय काट चुके थे, जितनी सजा सभी मामलों में दोषी साबित होने पर भी नहीं होती।
जनवरी 2012 में वह जेल से बाहर आए।
लेकिन तब तक उनके पिता की मौत हो चुकी थी। उनकी मां को इतना गहरा स्ट्रोक आया था कि वह अपने बेटे को पहचान तक नहीं पाईं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिल्ली सरकार को उन्हें मुआवज़ा देने का आदेश दिया।
राशि थी सिर्फ 5 लाख रुपये।
दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के किसी अधिकारी पर कार्रवाई नहीं हुई। कोई निलंबन नहीं। कोई जांच नहीं।
आमिर ने अपनी कहानी पर एक किताब लिखी
“Framed As A Terrorist: My 14 Year Struggle To Prove My Innocence”
आज वह उन लोगों की मदद करते हैं जिन्हें झूठे मामलों में फंसाया गया है।
भारत ने उन्हें 5 लाख रुपये दिए…
और उसे इंसाफ कह दिया।
ऐसी सच्ची कहानियों के लिए फॉलो करें, जो कभी सुर्खियां नहीं बनतीं।
Her name is Pratiksha Tondwalkar.
She was born in 1964 in Pune into a Scheduled Caste family.
When she was in Class 7, her father decided to pull her out of school and get her married. Her teacher begged him to let her continue. She even offered to pay for Pratiksha’s education herself. Her father refused.
She was married at 17. Her husband Sadashiv Kadu worked as a bookbinder at a Mumbai branch of the State Bank of India.
When she was 20, he died in a road accident. She was left with a two year old son and no education.
She walked into the same SBI branch to collect her late husband’s dues. She told the bank she needed any job they could give her.
They gave her a broom.
She swept floors. She dusted furniture. She cleaned restrooms. She earned Rs 65 a month.
She said in an interview whenever my son asked for a packet of biscuits I would get off the bus one stop early just to save the fare money to buy them for him.
After work, she enrolled in night college in Vikhroli. She completed Class 10 with first class marks. Then Class 12. Then a psychology degree. Bank colleagues helped her study whenever they could.
Her parents pressured her to remarry immediately. She refused until she had graduated.
She was promoted from sweeper to messenger to clerk.
She remarried in 1993. Her husband Pramod Tondwalkar encouraged her to take the banking officer exams. She cleared them.
She rose from trainee officer to Scale 4 to Chief General Manager.
In 2022, she became Assistant General Manager of the State Bank of India.
The same bank where she once cleaned restrooms for Rs 65 a month gave her its highest management honour 40 years later.
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24 तास व 365 दिवस चेहर्यावर चिंता बाळगणारी आणि दर दहा मिनिटांनी पॅनिक अटॅक येऊन आपला टीव्ही हलवून सोडणारी ही अगतिक स्त्री पात्र लिहिणारे लेखक हे मराठी स्त्रियांच्या अधःपतनास सर्वात मोठ्या प्रमाणात दोषी आहेत.
अंधश्रद्धा वाढविणारया व स्त्रियांचे आत्मभान संपवून टाकणार्या या मराठी मालिका बंद करायला हव्यात😠
किशोर बेठेकर : ब्रिस्टॉल विद्यापीठाची स्कॉलरशिप मिळणारा पहिला कोरकू तरुण
QS World ranking मध्ये जगातील 51 वी रँक असलेली UK मधील प्रसिद्ध Bristol University मध्ये मेळघाट या आदिवासी भागातील कोरकू जमातीतील विद्यार्थी ज्याला ही प्रेरणादायी Schilarship मिळाली.
@Prksh_Ambedkar
रीजीम चैंज के मक़सद से शुरू हुआ युद्ध, परमाणु हथियार नष्ट करने तक पहुंचा जो इरान के पास है नहीं, फिर युद्ध दो कदम आगे बढ़ा और होर्मुज खोलने तक पहुंचा जो युद्ध के पहले भी खुला था, फिर युद्ध चार क़दम और आगे बढ़ा और उस अमेरिकी पायलट के रैस्क्यू तक पहुंचा, जो युद्ध से पहले अमेरिका मे
ईरान ये जानते हुए भी कि उसके पड़ोसी अमेरिका को उस पर हमले करने के लिए अपनी ज़मीन मुहैया करा रहे, अपने पड़ोसियों से हमले के लिए माफ़ी माँग रहा और उनपर हमले ना करने की बात कह रहा है
लेकिन मुस्लिम ब्रदरहुड का डंका पीटने वाले वो पड़ोसी इतनी हिम्मत नहीं दिखा पा रहे कि अमेरिका की गुंडागर्दी का विरोध करें और कहें कि तुम्हें अगर लड़ाई लड़नी ही है तो अपनी ज़मीन से अपने बूते लड़ो। हम अपनी ज़मीन का इस्तेमाल नहीं करने देंगे।
अमेरिका की गुंडागर्दी सिर्फ़ इसलिए चल पा रही क्यूँकि अपने अपने फ़ायदों के चक्कर में अमेरिका के “आतंकवाद” के ख़िलाफ़ दुनिया एक नहीं हो रही।
सकाळी चहा घेताना कप हातातुन निसटला,
पण मी तो पडु दिला नाही,
हसत बायकोकडे बघत म्हणालो
"वाचला"
बायको म्हणाली "वाचला" नाही...
"वाचलात "...!
एकाच शब्दा मधला "त" चा फरक
पण दहशत जाणवून गेला !!!
"मराठी राजभाषा दिनाच्या हार्दिक शुभेच्छा"
Watching this Ranji Trophy campaign and following it closely , one thing I can say for certain
For all the young boys and girls out there playing this sport and wanting to represent the country,
Do it the AQUIB NABI way
Can't think of any pacer/player in a long time doing what he's done
Domination from start to end and almost single handedly winning the domestic tournament that matters the most to get into the national side
Fitness across the whole campaign , bowling those longgg spells and across different soils , weather conditions and whether there's been any help for a pacer or not , he's been there for his team with the belief every time he's had the ball to STRIKE for his team .
Hats off to you AQUIB , you're an absolute champion and hope you get a lot of success that come your way and may you be the lesson on
" How it's done to break the doors through sheer will power , skill and resilience "
⭐⭐⭐
#RanjiTrophy