आज हम इंटरनेट और Gen-Z के इस आधुनिक युग में आ गए हैं, लेकिन यह देखकर बहुत दुख होता है कि कुछ लोग आज भी सोशल मीडिया पर आरक्षण के संवैधानिक अधिकार को 'भीख' या 'कैंसर' कहकर अपमानित करते हैं। यह सोचकर मन व्यथित होता है कि ऐसी नफरत भरी बातें पढ़कर हमारे आरक्षित और वंचित वर्ग के युवाओं के दिलों पर क्या बीतती होगी।
आज हालात ऐसे बन गए हैं कि कई जगहों पर हमारे युवा अपनी जाति बताने से भी शर्माते हैं। जब मैं इंटरनेट पर आने वाले भद्दे कमेंट्स और उनका हमारे युवाओं पर पड़ने वाला मानसिक परिणाम देखता हूँ, तो साफ लगता है कि कुछ लोग अपनी ओछी राजनीति चमकाने के लिए समाज को किस तरह से तोड़ रहे हैं।
सोशल मीडिया पर जिस 'क्रिएटिव' तरीके से यह भावनात्मक भेदभाव किया जा रहा है, मैं इसे 'राष्ट्रद्रोह' की तरह देखता हूँ; क्योंकि यह देश को बांटने का काम है। कुछ ताकतों ने हमारे बच्चों के दिलों में बहुत बड़ी गलतफहमी खड़ी कर दी है। उनके मन में द्वेष का जो जहर घोल दिया गया है, हमें उसे हर हाल में दूर करना है।
हम विकास में बहुत आगे आ गए हैं, लेकिन कुछ लोगों की मानसिकता में आज भी बीमारी है। पर मेरे युवा साथियों, हमें निराश नहीं होना है! हमें इस नफरत को प्यार से हराना है और समानता का सपना सच करना है। ऐसे जाहिल लोगों की बातों पर बिल्कुल ध्यान न दें।
आज भी कई बच्चे जाति या पैसे की कमी के कारण अपने मुकाम तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। उन सभी को न्याय और अवसर दिलाना ही हमारा लक्ष्य है।
एकजुट रहें, आगे बढ़ें!
भारत सरकार ने SC ST के लोगो को उद्योगपति बनाने के लिए बिजनेस में आरक्षण दिया है ये सरकार का बहुत ही शानदार फैसला है अब SC ST के लोगों को भी नौकरी देने का मौका मिलेगा ये प्राइवेट सेक्टर में दलितों आदिवासियों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने का पहला कदम है।
जय भीम @narendramodi जी बहुत बहुत आभार @Profdilipmandal जी
संविधान विरोधी लंपट बच्चों को फ़ैल करवा कर छोड़ेंगे। वीडियो में बच्चा कह रहा है सवाल आया था संविधान का निर्माण किसने किया तो यह शान से लिखा आया बी एन राव
अब फेल हो जाएगा तो रोयेगा कि आरक्षण की वजह से फेल हुआ है
उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी किसी भी धर्म के पर्व, त्योहार, पूजापाठ, स्नान आदि में राजनीतिक लोगों का हस्तक्षेप एवं प्रभाव पिछले कुछ वर्षों से काफी बढ़ गया है, जो नये-नये विवाद, तनाव व संघर्ष आदि का कारण बन रहा है, यह सही नहीं है तथा इन सबको लेकर लोगों में दुख एवं चिन्ता की लहर स्वाभाविक है।
वास्तव में संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ के लिये धर्म को राजनीति तथा राजनीति को धर्म से जोड़ने के कई ख़तरे हमेशा बने रहते हैं तथा प्रयागराज में स्नान आदि को लेकर चल रहा विवाद, एक-दूसरे का अनादर व आरोप-प्रत्यारोप इसका ताजा़ उदाहरण है। इससे हर हाल में ज़रूर बचा जाना ही बेहतर।
वैसे भी देश का संविधान व क़ानून ईमानदारी से जनहित व जनकल्याणकारी कर्म को ही वास्तविक राष्ट्रीय धर्म मानकर राजनीति को धर्म से तथा धर्म को राजनीति से दूर रखता है, जिस पर सही नीयत व नीति से अमल हो, ताकि राजनेतागण अपना सही संवैधानिक दायित्व, बिना किसी द्वेष व पक्षपात के, सर्वसमाज के सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक हित में ईमानदारी व निष्ठापूर्वक निभा सकें, वर्तमान हालात में भी लोगों की यही अपेक्षा। अतः प्रयागराज में स्नान को लेकर चल रहा कड़वा विवाद आपसी सहमति से जितना जल्द सुलझ जाये उतना बेहतर।
इसके साथ ही, आज ’उत्तर प्रदेश दिवस’ की सभी लोगों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें।
आजकल इंस्टाग्राम पर 'बुआ' को विलेन बनाने वाले रील्स की बौछार है। एक ज़माना था जब लाख झगड़ा-झंझट के बावजूद बहन-बेटी के यहाँ विभिन्न मौक़ों पर सनेस/सनेसा भेजा ही जाता था।
बिहार के भोजपुरी-मैथिली क्षेत्रों में मैंने भी बचपन में इसे क़रीब से देखा है। नेपाल के मधेस में भी 'कोसेली' भेजने की परंपरा रही है। वैसे अर्थ के हिसाब से देखें तो 'सनेस/सनेसा' का मतलब है सन्देश या Message. लेकिन, ये सिर्फ़ कोई लिखित सन्देश नहीं होता था बल्कि उसके साथ-साथ खाने-पीने की वस्तुएँ भी आती थीं।
छठ के बाद लगभग 2 हफ़्तों तक विवाहित बेटियों के घर प्रसाद भेजे जाते थे। इसी तरह, मकर संक्रांति के दौरान लाई पहुँचाते थे। इसके साथ-साथ साड़ी, चूड़ी-बिंदी सहित श्रृंगार के सामान भी भेजे जाते थे। कई बार नकद रुपए भी होते थे। कभी परिवार का कोई सदस्य तो कभी किसी क़रीबी जना-बनिहार (मजदूर) को भेजते थे। ये लोग घर से अलग नहीं होते थे, बल्कि जिन बहन-बेटियों के यहाँ ये जाते थे उन्हें इन्होंने गोद में खिलाया रहता था। उन्हें देखकर भी ससुराल में विवाहित बेटियों को ऐसा ही लगता था जैसे मायके से पिता या भाई आ गए हों, उनके स्वागत में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जाती थीं। वो साथ में घर का हालचाल भी लेकर जाते थे।
इसी तरह, फगुआ (होली) के दौरान भी 'सनेस' भेजा जाता था। आम वगैरह के मौसम में फल तोड़े जाने के बाद भी भेजे जाते थे। साल में दो-चार बार ऐसा हो ही जाता था। मैंने बुजुर्ग महिलाओं तक के नइहर (मायका) से सनेस आते हुए देखा है। महानगरों में तो आजकल के बच्चों को तो पता तक नहीं होगा कि उनके दादी के मौके में कौन-कौन हैं।
ये सही है कि आज पूरी दुनिया ऑनलाइन हो गई है और सब एक-दूसरे से कनेक्टेड हैं, लेकिन इसने इन लोक-परंपराओं को लगभग ख़त्म सा कर दिया है। आजकल कोई भी चीज कहीं से कहीं ऑनलाइन ऑर्डर की जा सकती है। वैसे आजकल जब प्लास्टिक पैक्ड चीजें ख़रीदकर खाने का युग है, ऐसे समय में भी गाँव के किसान खेत से निकले ऑर्गनिक माल बहन-बेटियों के यहाँ भेजते हैं। जो शहर में बस गए, उनके पास न भेजने के लिए कुछ है और न समय है।
ट्रॉली बैग्स के ज़माने में बाँस की बनी हुई टोकरी-छैंटा अब तो मिलने भी दुर्लभ हैं, कभी इन्हीं में रखकर 'सनेस/सनेसा' भेजे जाते थे। ये रिश्तों की निरंतरता का सन्देश था, पिता-भाई की तरफ़ से ये सन्देश था कि शादी के बाद बहन-बेटी मायके से कट नहीं गई है बल्कि ये बंधन और मजबूत हुआ है।
वो रात
वो बात
वो मुलाकात
वो हसी
वो खुशी
वो यादें
कहाँ उतारा
वो बिता हुआ कल
वो गुज़रा हुआ पल
वो तेरे साथ
वो मेरे हाथों मे
तेरा हाथ
वो सब एक कहानी थी जो अधूरी रह गई,
तू मिलकर भी ना मिल सका
और मै भूल कर भी ना भूल सका
वो तेरी एक निशानी रह गई....!
राजपथ वाले कासिम जी एक पॉडकास्ट में कहते है कि मैं 2027 में मायावती जी को मुख्य मंत्री पद का शपथ लेते देख रहा हूं, आज अयोध्या वाले बाबा जी भी बोल रहे हैं कि बसपा की वापसी हो रही है 😂😂
जितने भी हीरो हीरोइन है जो गुटखा तंबाकू आदि का प्रचार करते हैं उन पर कार्रवाई होना चाहिए और प्रचार बंद होना चाहिए ।
----- #BSP RS Sansad @ramjigautambsp
Central Excise (Amendment Bill)
@Mayawati