@Khushbookhan_ ट्रेन में नाचेंगे, भजन गाएंगे, एरोप्लेन में भजन गाएंगे, सड़क पर भजन कीर्तन करेंगे लेकिन कोई नमाज़ पढ़ ले तो उसको लात मारेंगे
@DelhiPolice तुम पर थू
इंसान की सबसे बड़ी लेगेसी क्या हो सकती है?
महल, मूर्तियां, साम्राज्य, धन, दौलत..
नाम और मूर्तियां?
●●
अनुभव से एक बात कहता हूँ।
एक स्कूल चलाता हूँ, पिता की मेमरी में। दूर है, कम जाता हूँ। पर जाता हूँ तो तब, जब प्रेयर होता हो, बच्चे टिफिन खाते हों, मैदान में खेलते या कतारों में चलते हों।
सीना दूना हो जाता है। मैं बच्चा हो जाता हूँ, पिता जीवित हो, दिखने लगते हैं।
●●
मेरा उद्देश्य यही है, उनकी मेमरी अपने गिर्द जिंदा रखना। सन्तोष का एक निजी अहसास..
पर उस अहसास के छोटे से पल में मैं समझ पाता हूँ ..
कि एक शिक्षा का केंद्र, जहां आपके गांव-शहर- कस्बे के बच्चे तालीम हासिल करें, उसे बनाना, बढाना, बुलन्द बनाकर छोड़ जाना, इससे बड़ी लेगेसी नही।
●●
भारत मे उच्च शिक्षा, अंग्रेजी और वैज्ञानिक क्युरिकुलम की जरूरत को सबसे पहले सर सैयद अहमद खान ने पहचाना।
कम्पनी राज ने कलकत्ते, मद्रास औऱ बॉम्बे में यूनिवर्सिटी जरूर बनाई थी। मगर अपनी कौम को शिक्षा से संवारने, की इब्तदा मुस्लिम समाज सुधारकों ने की। यह इतिहास में दर्ज है।
अफसोस कि वे यह बढ़त, बरकरार न रख पाए।
●●
बदलते दौर में BHU और जामिया भी बने। आजादी के बाद सरकारी प्रयासों से शिक्षा के बेहतरीन केंद्र बने, लेकिन आबादी के लिहाज से कम थे।
धीरे धीरे निजी क्षेत्र में शिक्षा एक व्यवसाय बनती चली गयी। आने वाले वक्त में मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट के कॉलेज बिजनेस हो गए।
इस दौर में मुस्लिम आबादी जो पिछड़ी, और विपन्न थी, ऐसे कालेज और यूनिवर्सिटी में कम ही प्रतिनिधित्व ले पाई।
●●
आजम खान और असदउद्दीन ओवैसी जैसे मुस्लिम लीडर्स ने शिक्षा को अपना एक बड़ा कार्यक्रम चुना।
राजनीति के इतर, गैर व्यवसायिक मानसिकता से अपने समाज मे शिक्षा के लिए सॉलिड प्रयास करने वाले लीडर, किसी भी कौम में आज बेहद कम है।
उन रेयर लोगो मे इनका शुमार है।
●●
ओवैसी की राजनिति मुझे पसंद नही, मगर हैदराबाद में शिक्षा के जो इदारे खड़े किए हैं, वो उनका काम सलाम के काबिल हैं।
आप अवश्य कहें कि उसके पास, पुराने पैसे से खड़ा किया गया, ये एक नया बिजनेस है। तो मैं कहूंगा कि खदान और स्पेक्ट्रम की जगह उसने स्कूल कालेज को व्यवसाय बनाया। यही कोई कम बात नही।
पूरे हैदराबाद में उनकी फोटो के साथ, युवाओं को सहिष्णुता और मजहब का सही मतलब बताने वाले पोस्टर्स हैं। भूरे भैया को जन्मदिन की बधाई से ये पोस्टर बेहतर हैं।
●●
यूपी में आजम खां, धर्मनिरपेक्षता और वेल्यू बेस्ड राजनीति की शानदार मिसाल है।
रामपुर से लड़ने वाले मौलाना अबुल कलाम आजाद के सच्चे वारिस, जिन्हें दुर्भाग्य से बड़ा राजनैतिक कैनवस नही मिल सका। सपा, उनके कद से न्याय नही कर सकती।
लेकिन अली जौहर यूनिवर्सिटी के रूप में जो लेगेसी आजम ने खड़ी की है, वो अकेली ही उन्हें याद किये जाने को पर्याप्त है।
●●
उत्तर प्रदेश की घटिया राजनीति ने, दूसरे दलों को नुकसान पहुचाने के क्रम मे, शिक्षा के इदारों को भी दांव पर लगाया हुआ है।
उनपर गोलाबारी और हमले से परहेज नही। एक पूरी पीढ़ी को कम्प्यूटर के कीबोर्ड से उठाकर मंदिर की सीढ़ियों पर बिठाने वालों ने, न तो खुद शिक्षा हासिल की, न उसका मर्म समझा।
अब यूनिवर्सिटीज की कब्र खोदने पर लगे हैं। उन्हें बनाने वालों पर बेजा हमले हैं। मुकदमें हैं, किताब चुराने के, बकरियां चुराने के..
जवान बेटे का जाली जन्म प्रमाण पत्र बनाने के???
●●
माई हार्ट ब्लीडस फ़ॉर आजम खान।
जेल तो मनीष सिसोदिया को भी जाना पड़ा, सत्येंद्र जैन को भी। और भी बहुत से सिर पर तलवारें लटक रही।
लेकिन इन सबके पास उम्र है। आज जेल, कल राजपाट.. सत्ता के खेल में जेल कोई अनहोनी नही होती।
लेकिन 80 साला आजम से, जो अपनी जिंदगी जी चुके, वो कीमत ली जा रही है, उसका ईनाम देने का वक्त, तो ईश्वर के पास भी नही।
आज उनके साथ, उनके परिवार के साथ जो भी हो रहा, वो ज़ुल्म है, अधमाई है, दुष्टता है।
मुझे उनके ऊपर दर्ज मामलों के लीगल विवेचन में कतई रुचि नहीं। वो जेल में क्यो है, भला कौन नही जानता??
●●
हमले आजम पर हैं राजनीति के लिए। धर्म के लिए। या कहिये, धर्म की राजनीति के लिए।
गाहे बगाहे उनकी यूनिवर्सिटी को क्षति पहुचाने वाले निर्णयों की भी खबरें आती हैं।
रेजीम आजम को जितना चाहे बकरी मुर्गी किताबे चुराने के लिए जेल में रखे। यूनिवर्सिटी को किसी प्रकार की क्षति, हिंदुस्तान के हर शिक्षित और शिक्षार्थी के लिए शर्म की बात होगी।
मंदिर मस्जिद के लिए खून ख़ौलाने वाले क्या स्कूल , कालेज, यूनिवर्सिटीज की सुरक्षा के लिए सड़कों पर आएंगे??
●●
मुझे नही पता। पर इन इदारों, इन किरदारों पर हथौड़े चलाने वाले याद रखें।
अगले मोड़ पर इतिहास, हाथ मे कालिख लिये आपका इंतजार कर रहा है।
आज़म खान कोर्ट में हार गए हैं कोर्ट का आदेश है युनवर्सिटी का गेट तोड़ा जाए ये गेट महज़ एक इदारे का नहीं बल्की क़ौम को इल्म और तरक्की की और ले जाना वाला दरवाजा है वो यही चाहते है की तुम्हारी तरक्की का हर दरवाज़ा बंद कर दिया जाए आज़म खां ने सही कहा था वो तुम्हे अनपढ़ देखना चाहते है