ये है वर्ल्ड क्लास नई दिल्ली रेलवे स्टेशन !
यहाँ ट्रेन के आगमन के समय ऊपर जाने वाला Escalator काम नहीं कर रहा। जबकि नीचे आने वाला काम कर रहा है। एक बुजुर्ग बीमार महिला को देख सकते हैं कैसे मुश्किल से चढ़ पा रही हैं। ये तो महज़ एक उदाहरण है।
मौक़े पर जो बातें समझ में आयीं उससे उपजे कुछ सवाल हैं।
ट्रेन के आने के समय ऊपर जाने वाला escalator बंद होने से भारी सामान के लिए कूली करना पड़ता है। और कूली गले में रेट पट्टी लगे होने से बाद भा मनमाना भाड़ा माँगते हैं। मौक़े पर मौजूद एक नियमित व्यक्ति ने बताया ये अक्सर होता है कि ट्रेन आने के समय ही ऊपर जाने वाला escalator बंद हो जाता है। तो मतलब escalator बंद होना एक बिज़नेस मॉडल है?
या फिर escalator का रख रखाव या capacity घटिया है कि लोड नहीं ले पाता है?
रेल मंत्री @AshwiniVaishnaw को अधिकारियों से जवाब तलब कर जवाब देना चाहिए। @RailMinIndia
Video shot at 2:19pm
Platform No 12-13
We send missions into space, build world-class airports and run sleek Vande Bharat trains. And then millions of Indians commute like this every day. It’s risky, dangerous and unacceptable. India cannot aspire to first-world infrastructure while accepting this as normal. 😱
याद है? कैसे बनारस को क्योटो बनाने की ख़बर पीट पीट कर चलायी गई थी?
BREAKING NEW लगा कर !
नहीं न? यही खेल है। पब्लिक मेमोरी शॉर्ट होती है। आज कुछ भी ख़बर चलवा लो कल कौन पूछेगा! है न!
सुनिए तो क्या हुआ है!
यूएई और इजिप्ट में भारत के राजदूत और ऑस्ट्रेलिया में भारतीय उच्चायुक्त रह चुके नवदीप सिंह सूरी को अरवी नागरिकता साबित करने में परेशानी आ रही है!
@navdeepsuri ने ख़ुद तीन ट्वीट के ज़रिए अपनी परेशानी साझा की है। @ECISVEEP से सवाल पूछा है।
ऐसे लोग आते कहा से है
अब ये सुनिये और अपना माथा पीट लीजिये
हे राम 🤔
चलो कोई बात नही जिसने
भी भगवान बनने की कोशिश की उसका क्या हाल हुआ हिंदू ग्रंथों में लिखा बताने की ज़रूरत नहीं है भगवान भला करे।
"मित्रों, क्या 120 करोड़ के देश में ओलंपिक मेडल नहीं मिल सकता? अरे सिर्फ़ सेना के जवानों को ये काम दिया जाये...तो 8-10 मेडल तो हमारे सेना के जवान लेकर के आ सकते हैं!" -मा. CM मोदी.
इस इंसान के पास PM बनने से पहले हर प्रॉब्लम को सॉल्व करने की टेक्नीक थी। पता नहीं PM बनने के बाद किसने इस पर लाल जादू कर दिया, बेचारा सारी टेक्नीक भूल गया 🙄
इंदिरा गाधी ने जब इमरजेंसी लगाई तब विदेशी पत्रकार ने पूछा .. आपने लोकतंत्र का गला घोंटा .. जवाब था देश की अखंडता और एकता के लिए जरूरी था..विपक्षी दल विदेशी ताकतों की वजह से षड्यंत्र रच रहे थे.. अराजकता का माहौल था..पचास साल बीत गए .. सत्ता पक्ष वही भाषा बोल रहा और विपक्ष वैसा ही.. सत्ता का चरित्र वही चेहरे बदल जाते ..
ये 2023 था।
“पेपर लीक माफिया का पाताल में जाकर भी हिसाब किया जाएगा”- प्रधानमंत्री मोदी
ये 2026 है।
पाताल-लोक बहुत गहरा लगता है। पेपर लीक माफियाओं का हिसाब अभी तक हुआ नहीं है!
सदन किस किस तरह का ‘बढ़िया भरोसा’ देकर तालियाँ पिटवा लेते हैं ये मंत्री लोग!
लोकसभा में दिया गया 18 मार्च 2021 का भाषण है ये नितिन गडकरी का जिसमें वे एक साल के भीतर सारे टोल बूथ हटा कर GPS से टोल लिए जाने की बात कर रहे थे!
पांच साल बीत गए टोल बूथ अभी भी हैं और कईयों पर कई बार वाहनों की लंबी क़तार भी लगती है।
दरअसल पूरा ध्यान इथेनॉल बिज़नेस पर लगा देने से मंत्री अपना असल बिज़नेस तो भूल ही गए!
अब शायद कोई नई डेडलाइन देकर फिर ताली पिटवा
लेंगे। पब्लिक की मेमोरी शॉर्ट होती है।
जो भी सरकार, सिस्टम पर सवाल उठाए , उसको राष्ट्र विरोधी, राम विरोधी , सनातन विरोधी कह दो , जो न उठाए उसको गोदी कह दो ..काम खतम ..बस इतना ही फैसला करना है .. न सोचो, न पूछो .. जजमेन्ट दे दो ..🙏🙏
🚨 Police say two men in Saroornagar, Hyderabad, allegedly pretended to fall on the road to distract a passerby before stealing his 1 lakh mobile phone and fleeing on a motorcycle without a number plate...
रेलवे ने आजकल एक चीज़ बहुत गज़ब कर रखी है किसी भी ट्रेन का आखिरी या आखिरी दूसरे स्टेशन की यात्रा का समय सामान्य लगने वाले टाइमिंग से बढ़ा के रखते हैं और ट्रेन ज्यादातर समय लेट होते हुए भी वहां से आखिरी स्टेशन तक समय से या समय के पहले पहुंच जा रही है फिर इसको उपलब्धि के तौर पर लिया जाता है।
करीब दो दशक पहले भारतीय मूल के एक अमेरिकी लेखक का लेख पढ़ा था- द ग्लोबल मैन। जिसमें उसने लिखा था कि दुनिया एक जैसी होती जा रही है। स्थानीयताएँ खत्म होती जा रही हैं। उसने लिखा था कि दुनिया भर में यात्रा करता हूँ। दुनिया भर में एक जैसे होटल हैं, एक जैसा खाना-पीना मिलता है। आपको यह महसूस ही नहीं होता कि आप किसी भिन्न संस्कृति में हैं। लेखक का नाम भूल गया लेकिन उसकी यह बात याद रह गई।जब भी अपने बचपन के शहरों में जाता हूँ तो मुझे वहाँ दिल्ली ही दिल्ली दिखाई देता है। वहाँ की अपनी स्थानीयताएँ विलुप्त होती जा रही हैं। बड़े-बड़े ब्रांड के स्टोर, बड़े-बड़े रेस्तराँ। किसी में स्थानीय खान-पान नहीं। आप नैनीताल चले जाइए तो बटर चिकेन आपको बड़े आराम से मिल जाएगा लेकिन वहाँ का अपना खाना नहीं मिलेगा। मुज़फ़्फ़रपुर अपने चाट के लिए प्रसिद्ध था। अब हर सौ कदम पर मोमो बिक रहे हैं। चाट के बारे में पूछने पर लोग बुरा मान जाते हैं। कहते हैं कि हल्दीराम आ गया है, डोमिनोज, पिज़्ज़ा हट आ गया है और आप हैं कि चाट युग में ही फँसे हुए हैं। सीतामढ़ी की मूढ़ी-घुघनी के सामने अच्छा अच्छा खाना फेल था लेकिन वहाँ मोमो की ऐसी ऐसी क़िस्में मिलने लगी हैं कि मोमोज की आत्मा भी रोती होगी। लोग खुश हैं कि अपने शहर में रहकर ही महानगर जैसे कपड़े पहन रहे हैं, महानगर जैसा खाना-पीना हो रहा है और क्या चाहिए। अपनी स्थानीयता को बचाने की कोई जागरूकता भी नहीं दिखाई देती।
दुःख होता है कि विकास का मतलब हम लोगों ने यही समझा है कि अपना आपा छोड़कर किसी और के जैसा हो जाना।
जो जहाँ है वह वहाँ जैसा नहीं रहना चाहता है!
भारत में हम लोग सब कुछ यूं ही स्वीकार कर लेते हैं। जब खाने की चीज़ों में मिलावट पर चुप्पी है तो ईंधन की मिलावट पर कौन बोले?
एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पर कीमत और माइलेज से लेकर इंजन की सेहत पर असर को लेकर सरकार ने कोई संतोषजनक जवाब दिया है?
अगर कोई रिसर्च आर्टिकल हो तो ज़रूर साझा करें। अख़बारों में कुछ एक्सप्लेनर ज़रूर आये हैं। इंडियन एक्सप्रेस का एक लिंक शेयर कर भी रहा हूं पर अधिक स्पष्टता चाहिए।
मैं ज़्यादातर पब्लिक ट्रांसपोर्ट से चलता हूं। लेकिन यह नहीं कह सकता कि निजी वाहन बिल्कुल नहीं चलाता। लेकिन बहुत सारे मध्यवर्ग के लोगों के लिए स्कूटर, मोटरसाइकिल और कार भी केवल विलासिता नहीं ज़रूरत बन जाती है। विशेषकर महिलाओं के लिए।
नये वाहनों के लिए यह ईंधन नीति सही भी हो तो पुराने वाहन मालिक क्या करेंगे?
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जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र में यूपीए सरकार के समय सोनिया गांधी से केरल के दो मछुआरों की हत्या को लेकर कड़े सवाल पूछे थे।
मार्च 2014