अगरचे वक्त की कैद में गिरफ़्तार दोनों थे
कुछ पल ही सही एक नाव पे सवार दोनों थे
कर याद वादे सभी आगाज़-ए-इश्क़ के
रोज़-ए-तर्क-ए-इश्क़ शर्मसार दोनों थे
फ़िर ए दिल-ए-नादाँ फ़क़त तेरी ही आँख नम क्यूँ
किया था इश्क़ दोनों ने गुनाहगार दोनों थे/
ये ग़म अकेले का नहीं गुनाहगार दोनों थे