लोहे का स्वाद चखते हुए
मैने अक्सर सुना है
कि प्रेम एक नागरिक अधिकार है
और सच... एक व्यक्तिगत मजबूरी।
मगर तुम!
जो सुबह-शाम ज्ञान की जुगाली करते हो
आचार्य के शब्दों को
तिजोरी में रखे जेवर की तरह सहेजते हो,
और जब वक्त आता है
अपना कंधा और अपनी आवाज़ देने का—
तुम घुग्घू बन जाते हो!
तुम उस फटे हुए मोजे की तरह हो
जिसे जूता छिपा तो लेता है, मगर वह चलने लायक नहीं बचता।
याद रखना,
इतिहास किसी के मरने का इंतज़ार नहीं करता
वह सिर्फ गवाहियाँ दर्ज करता है।
अगर आज तुम्हारी चुप्पी की वजह से
वह मशाल बुझ गई,
तो उस राख का बोझ तुम्हारी गर्दन की नसों को तोड़ देगा।
प्रेम 'सीक्रेट लव अफेयर' नहीं होता,
वह तो एक नंगी सड़क है जहाँ धमकियों के पत्थर गिरते हैं।
अगर तुम गिरते हुए पत्थर को
सिर्फ अपनी पीठ सिकोड़कर सह रहे हो,
तो तुम गिलहरी नहीं हो—
तुम उस व्यवस्था के पालतू चूहे हो
जो सिर्फ अपने बिल की सलामती चाहते हैं।
पछतावा कोई कविता नहीं है
जिसे पढ़कर तुम सो जाओगे,
पछतावा वह तेज़ाब है
जो तुम्हारे जीते-जी तुम्हारे जमीर को चाट जाएगा।
उठो!
राम के पुल में पत्थरों की ही नहीं,
उस मिट्टी की भी जगह थी जिसे तुम आज अपनी आँखों में डाले बैठे हो।
जब तक वह आदमी ज़िंदा है,
अपनी कायरता को उतारकर खूँटी पर टाँग दो
वरना कल तुम्हारे पास सिर्फ एक शब्द बचेगा:
"काश!"
और काश... भूखे पेट पर पड़ी लात से भी ज़्यादा दर्द देता है।
#AcharyaPrashant
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Acharya Prashant receives fresh death threat over his remarks honouring Dr Ambedkar
· Renowned philosopher and author Acharya Prashant has received a fresh death threat following his recent remarks in honour of Dr Bhimrao Ambedkar, triggering concern among his supporters and prompting his foundation to initiate legal action
🔗: https://t.co/nF3kygI57E
सबसे पहले आप अगर थोड़ी से भी बेसिक स्टडी कर लेते तो ऐसा कमेंट नहीं लिख पाते। पर जनाब उसमें मेहनत लगती है। कोई बात नहीं हम आपकी मेहनत को आसान कर देते हैं। नीचे दिये फैक्ट्स पड़ लीजिए दुबारा ऐसी गुस्ताखी नहीं। कर पाएंगे।
1️⃣ आचार्य प्रशान्त – तर्क और शास्त्र आधारित दृष्टिकोण
वे भगवद्गीता और उपनिषद को तार्किक विश्लेषण के साथ समझाते हैं।
अंधविश्वास, कर्मकांड, ज्योतिष आदि की सार्वजनिक आलोचना करते हैं।
बार-बार “प्रमाण, विवेक और आत्म-परीक्षण” पर जोर देते हैं।
सामाजिक मुद्दों (पर्यावरण, शिक्षा, शोषण) को आध्यात्म से जोड़ते हैं।
👉 इसलिए समर्थक उन्हें “वैज्ञानिक दृष्टि वाला आध्यात्म” कहते हैं — क्योंकि वे सवाल उठाने और जांचने को प्रोत्साहित करते हैं।
2️⃣ ओशो – अनुभव और ध्यान-केंद्रित दृष्टिकोण
ओशो ने अनेक ध्यान विधियाँ विकसित कीं (जैसे डायनेमिक मेडिटेशन)।
वे तर्क को सीमित मानकर “प्रत्यक्ष अनुभव” को अंतिम कसौटी बताते थे।
पुनर्जन्म, ऊर्जा, चक्र आदि विषयों पर भी बोलते थे — जिन्हें आधुनिक विज्ञान प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित नहीं करता।
कई बार परंपरागत नैतिकताओं और सामाजिक ढाँचों को चुनौती दी।
👉 इसलिए आलोचक कहते हैं कि उनकी कुछ बातें “अप्रमाणित आध्यात्मिक दावे” हैं।
लेकिन समर्थक कहते हैं कि वे मनोवैज्ञानिक और अनुभवात्मक प्रयोग कर रहे थे, अंधविश्वास नहीं फैला रहे थे।
3️⃣ क्या ओशो अंधविश्वास सिखाते थे?
सीधे-सीधे “अंधविश्वास” कहना सटीक नहीं है।
उन्होंने भी परंपरागत धार्मिक अंधविश्वासों की आलोचना की।
पर वे वैज्ञानिक प्रयोगशाला जैसी भाषा नहीं अपनाते थे; उनकी शैली काव्यात्मक और रहस्यवादी थी।
इसलिए विवाद अधिक शैली और दावों की प्रकृति को लेकर है, न कि साधारण पूजा-पाठ वाले अंधविश्वास को लेकर।
4️⃣ वैज्ञानिकता का अर्थ क्या?
अगर “वैज्ञानिक” का अर्थ है:
तर्क,
प्रमाण की मांग,
प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता,
तो इस कसौटी पर आचार्य प्रशान्त की प्रस्तुति अधिक स्पष्ट और विश्लेषणात्मक लगती है।
अगर “वैज्ञानिक” का अर्थ है:
प्रयोग और प्रत्यक्ष अनुभव,
तो ओशो भी अपने तरीके से “प्रयोगशील” थे — भले ही उनकी भाषा आधुनिक विज्ञान जैसी न हो।
https://t.co/SkmYFpybRU
इससे पता चलता है कि तुम्हारा बौद्धिक स्तर क्या है
और तुम वेदांत और विज्ञान को कितना महत्व देते हो।
अगर किसी ने भी अद्वैत वेदांत पढ़ा हो और समझा हो,
तो उसे साफ़-साफ़ दिख जाता कि ओशो की बातें,
ख़ासकर कर्मफल को लेकर, या पुनर्जन्म को लेकर,
शरीर से बाहर निकलने को लेकर
उपनिषद् जड़ से ख़ारिज करते हैं,
और विज्ञान भी इसे नकारता है।
लेकिन जिसका सरोकार
न विज्ञान को समझने से होता है,
न अद्वैत वेदांत को सम्मान देना होता है,
वह अक्सर लोगों को भ्रम में डालते हैं,
ताकि आम आदमी इन्हीं रसदार बातों में
बहक के रह जाए।
तुम्हारे ज्ञानवर्धन के लिए यह AI का उत्तर है।
पढ़ लो अच्छे से कि ओशो ने किन बातों में कितना मिलावट किया है और क्यों आज आचार्य प्रशांत को सुनना चाहिए:
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संकल्प को गीता सत्रों में देखकर मुझे बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं था।
पर मैं खुद में उठ रहे रोमांच को देख सकता था। मैंने तुरंत अपना फोन लिया वीडियो क्लिप बनाया, फोटो लिया ताकि मैं लोकधर्मियों को दिखा सकूं कि गीता के लिए उम्र का ज़्यादा होना आवश्यक नहीं।
ये घटना सत्र में मौजूद parents प्रतिभागी जो अपने ही बच्चों को गीता प्रतिभागी बनाने से हिचकते हैं, ये उनके लिए भी आँखे खोलने वाली पल हो सकता है।
आचार्य जी! का वो कथन याद आ रहा है -
देश को एक वास्तविक शिक्षित पीढ़ी की जरूरत है हम सब बदल देंगे भारत को ही नहीं हम पूरा दुनिया बदल देंगे..
#AcharyaPrashant #Parenting
Posted by Sudhanshu Kumar on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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*You exist in their eyes*
हमको कभी भी अंतर जगत में देखना नहीं सिखाया
बस बाहर देखो
और वही हमने किया भी
अच्छा नहीं लग रहा *सो जाओ, खाना खा लो, मूवी देखलो*
मैने भी अपना सेल्फ वर्थ इसी हिसाब से समझ रखा है कि कौन मुझे क्या समझ रहा है और कितना महत्व दे रहा है,
भले ही मैं कितना भी बोलूं कि मुझे किसी की भी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता ( इसमें भी अहंकार की चाल है)
जबकि फर्क पड़ता है, बहुत पड़ता है।
इस अध्याय में आचार्य जी ने काफी कम शब्दों में कितनी आसानी से बता दिया कि निडरता क्या है
और मैं निडर कैसे बनूंगी।
सबके साथ भी खड़े होकर खुद को अलग कर पाना, सबको सुनने के बाद भी उससे प्रभावित नहीं होना, दूसरों से अपने बारे में राय लेना लेकिन उसी राय से संचालित न होने लगना
मतलब सबके साथ रहकर सबके बीच ने रहकर भी खुद की सत्ता को देखना। खुद में कुछ होना खुद के लिए कुछ करना इसके लिए नहीं ताकि कोई मेरे बारे में कुछ अच्छा बोले, इसीलिए क्योंकि तुम वो कर सकते हो।
क्योंकि अगर तुमने ऐसा नहीं किया तो बस तुम एक गुड़िया बन कर रह जाओगे
इस अध्याय को पढ़कर समझ आया कि *असल में fearlessness क्या होता है*
#AcharyaPrashant #Books
Posted by PRAGYA PAREEK on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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आज _Hyderabad Literary Festival_ में
बुकस्टॉल योद्धाओं ने
*कैलाश सत्यार्थी जी* को
*आचार्य जी की Climate, Within पुस्तक भेंट की।* 🌱📘
एक _Nobel Peace Prize Winner (2014) के_ हाथों में
उन बोध पुस्तकों का पहुँचना,
जो संसार में वास्तविक शांति का एकमात्र साधन हैं—
निस्संदेह अत्यंत शुभ है।
क्या आप भी आचार्य जी की शिक्षा
सब तक पहुँचाना चाहते हैं?
तो देर क्यों—
*आज ही बुकस्टॉल मिशन से जुड़ें।* 🔥
📌 *फॉर्म भरें:* https://t.co/YnRAqrznhE
#AcharyaPrashant #Books #ClimateChange #Operation2030 #GetInspired
Posted by AP Books Warriors on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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😔आज सत्र में आचार्य जी ने बहुत पीड़ा और निराशा के साथ कुछ बातें कहीं।
वे बातें कड़वी ज़रूर थीं, पर कहीं न कहीं सच ही थीं।
शायद हम अभी वैसे ही हैं।
आचार्य जी ने कहा —
“जो सिर दस जगह झुका चुका हो,
वह मेरे सामने मत झुकाओ।
पहले उन जगहों पर झुकाना बंद करो,
फिर मेरे सामने आना।”
“जो घाटियों के आगे झुके,
वह घटिया से भी ज़्यादा घटिया है।”
आचार्य जी ने बिल्कुल ठीक कहा है —
हम अभी इस लायक भी नहीं हैं कि उनके सामने झुक सकें।
महीने के सिर्फ़ छह दिन बचे हैं,
और अभी तक महीने के खर्च का आधा पैसा भी जमा नहीं हो पाया है।
बड़ी-बड़ी बातों से काम नहीं चलेगा।
आत्मबल, संख्याबल और संसाधन-बल — तीनों ज़रूरी हैं।
इसलिए गीता-प्रतिभागियों से निवेदन है —
कृपया आगे आइए, ज़िम्मेदारी लीजिए और सहयोग दीजिए।
क्योंकि श्रद्धा केवल भावना नहीं,
व्यवहार में उतरने का नाम है।
"रावण का तोपची बनने से बेहतर है,
राम की गिलहरी बन जाना।”
🙏🏻🙏🏻
#AcharyaPrashant #Lokhdharma #IndianPhilosophy
Posted by RAJBINDU PANDEY on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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अभी चल रही चर्चा में सभी अपनी अपनी माताओ के बारे में बता रहे, मैं इस मामले में कहना चाहूँगी मेरी माँ 72 साल की हैं, आचार्य जी की कोई भी किताब मंगाते ही मुझसे पहले वो सारी किताबें पढ़ लेती हैं । मेरे साथ ही सत्र भी सुनती हैं।
#AcharyaPrashant#Books#Parenting
Posted by Shipra on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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मुझे इस बुक से स्वयं को एक अलग रूप से जानने का मौका मिल रहा है बहुत से प्रश्न निर्माण हो रहे हैं और उनके उत्तर ईमानदारी से देने का प्रयत्न कर रही हूं और वह करते-करते स्वयं को बहुत से जो धोखे दिए हैं, कि मैं तो ऐसी हूं मैं तो यह करती हूं मैं तो वह करती हूं वो सब धिरे धिरे सामने आ रहे हैं। और जीवन जीने में मदद कर रहे हैं सही जीवन जीने में सही केंद्र से जीवन जीने में जैसा की छोटे प्रश्न हो या बड़े प्रश्न हो छोटे निर्णय हो या बड़े निर्णय हो लेकिन वह लेते वक्त एक ख्याल आ रहा है पहले मन में की मेरा केंद्र का कौन सा है? मेरा केंद्र सत्य का है या लोकधर्म का? जो सब कर रहे हैं समाज ने मुझे जैसे सिखाया है उसी तरह से मैं अपने जीवन के निर्णय ले रही हूं या कुछ समझ कर ले पा रही हूं। कि हां मैं यह समझती हूं और मुझे यह समझ के करना है, ना की मान के। यह निर्णय मैं गीता सत्र के माध्यम से और बुक के माध्यम से अधिक जान पा रही हूं।
मेरा पुस्तक पढ़ना जारी है और बहुत कुछ जानना भी और समझना भी जारी है। उसको अपने जिंदगी में उतरना भी जारी है।
आज हमने बुक स्टॉल लगाया था और वहां भी बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है, कि लोगों से बात कैसे करनी चाहिए और स्वयं की कमियां भी सामने आ रही हैं। स्वयं पर बहुत काम करना बाकी है, लेकिन जारी है।
#AcharyaPrashant #Books
Posted by Shreya laxman sotakke on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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As someone who spent a couple of years sitting at the feet of Acharya' jee @Advait_Prashant (being a student) studying the Bhagavad Gita, something shifted irreversibly inside me: I can no longer watch religious traditions (any tradition, including my own Muslim heritage) harm children in the name of “spirituality” and stay silent.
Acharya taught us that true scripture is meant to liberate the mind, not imprison it; it is fire that burns ego, not a whip that breaks a child’s spirit. Every time I see these viral videos now (a little boy collapsing in tears after memorising the entire #Quran, adults cheering as if he’s been touched by God instead of pushed to the edge), something boils in me.
This is no longer “their problem” or “our beautiful tradition.”
This is my community still traumatising its children, century after century, and calling the tears “khushu” and the breakdown “love for Allah.”
I stayed quiet for too long out of guilt and fear of being labelled Islamophobic. No more.
If the Gita made me fall in love with truth, then truth now demands I speak when I see a 10-year-old’s childhood sacrificed on the altar of mechanical memorisation.
IF you don't have freedom
ATLEAST,
You must have *LOVE* for *FREEDOM*❤️🌙💞🍃✨🌞
#AcharyaPrashant
Posted by Anjali Patel on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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Your true identity does not depend on any achievement or situation outside of yourself. The world is a playground, good for merriment, but with no real trophies to be won.
Now, go play, fearlessly.
ख़ुद को जानना और ख़ुद से ही लड़ना और अपने आप को बेहतर बनाना यही तो मुक्ति है । जो किया ख़ुद के लिए ही किया उसमे दूसरो से या बाहर से वह वही क्यो बटोरनी ।
#AcharyaPrashant #Quotes
Posted by Sumit Chawla on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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🌍 अर्थहीन जीवन और हमारे तर्क भी
🚁 नेपाल के एवरेस्ट क्षेत्र में सैकड़ों पर्यटक फंसे हुए हैं।
लगातार बारिश, घने बादल और खराब मौसम की वजह से Lukla Airport (जिसे दुनिया का सबसे ख़तरनाक एयरपोर्ट कहा जाता है) से उड़ानें पिछले कई दिनों से बंद हैं।
⛰️ भारी बादलों और कम दृश्यता के कारण करीब 1,500 पर्यटक Everest region में फंसे हुए हैं।
स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक़ यह स्थिति 3 दिन से जारी है और मौसम विभाग ने आगे भी बारिश और बर्फबारी की चेतावनी दी है।
🔥 अब वजह पर नज़र डालिए —
ग्लोबल वार्मिंग सिर्फ किसी देश की नहीं, पूरे मानव समाज की बनाई हुई आपदा है।
🌳 जंगल कटाई (Deforestation)
Year 2024 में ट्रॉपिकल वनों से करीब 6.7 million hectare पेड़-पौधे खत्म हुए।
अब तक दुनिया 420 million hectare जंगल खो चुकी है।
इनका 90% विनाश कृषि और इंसानी बस्तियों के विस्तार से हुआ है।
Year 2025 की शुरुआत में ही सैटेलाइट डेटा दिखा रहा है कि वृक्षावरण का नुकसान अब “सामान्य” नहीं — बल्कि “आपात स्तर” पर है।
🌫️ कार्बन उत्सर्जन और जलवायु प्रभाव
Year 2024 में जंगलों और आग के कारण लगभग 4.1 gigaton CO₂-equivalent गैसें छोड़ी गईं।
भूमि उपयोग परिवर्तन और वन विनाश से कुल उत्सर्जन का 10–15% आता है।
Year 2025 की शुरुआत में वैज्ञानिकों ने बताया कि अब हमारे पास केवल 130 billion ton (130 Gt) CO₂ का बजट बचा है ताकि तापमान 1.5°C से नीचे रखा जा सके।
ऊर्जा क्षेत्र अकेले 75% से अधिक वैश्विक उत्सर्जनों का जिम्मेदार है।
सबसे बड़ी जड़ — हमारी जनसंख्या और उपभोग
जितने ज़्यादा लोग, उतनी ज़्यादा ज़रूरतें,
उतना ज़्यादा उत्पादन,
और उतनी ही ज़्यादा पृथ्वी पर चोट।
🌐 दुनिया की बढ़ती आबादी के साथ ऊर्जा, भोजन और आवास की मांग ने वनों को काट दिया।
🧠 हमने समस्या की जानकारी ले ली, मौसम के बिगड़ने से क्या प्रभाव होगा वो देख लिया — सब पता कर लिया।
लेकिन न मीडिया और न हम खुद से यह प्रश्न पूछने के लिए तैयार हैं कि समस्या की जड़ क्या है?
🌋 न किसी का ध्यान इस ओर जा रहा कि भूकंप और आपदाएँ क्यों बढ़ रही हैं?
बस जिए जा रहे हैं बेहोशी में — न सवाल कर रहे हैं, न सोच पा रहे हैं कि कितने करीब ले आए हैं पृथ्वी को विनाश के,
कि आने वाली पीढ़ी को हम जीते-जी मार देंगे।
आम आदमी कैसे जी रहा है इतनी बेहोशी में?
हम सब जी रहे हैं एक फिलॉसफी को मानकर कि
“यह समस्या तो किसी और स्थान पर घटित हुई है,
वहाँ की प्रजातियाँ विलुप्त हो भी जाएँ तो क्या फर्क पड़ेगा —
हम और हमारा परिवार तो सलामत रहेगा।”
वैसे भी ग्लोबल वार्मिंग पहली बार तो हो नहीं रही पृथ्वी पर...
लेकिन यह ग्लोबल वार्मिंग नहीं,
यह मानवजनित वैश्विक तापमान वृद्धि (Human-induced Global Heating) है,
जो हमने — और विशेषकर उन 0.1% अमीरों ने पैदा की है।
और जब बात खुद की, अपने बच्चों की विलुप्ति की होगी —
तो गुम हो जाएगी यह तथाकथित फिलॉसफी।
क्लाइमेट चेंज को नज़रअंदाज़ करने के परिणामों का न हम अनुमान लगा सकते हैं,
और न यह जान सकते हैं कि बाढ़ से बरबाद होंगे या सूखे से मरेंगे हम लोग।
मूर्ख और क्रूर दोनों हैं हम।
मूर्ख इसलिए कि ऐसी गलत फिलॉसफी पर जीकर,
और क्रूर इसलिए क्योंकि अज्ञानी भी तो हैं हम —
ना स्वयं का पता, ना समस्या का।
आम आदमी इस फिलॉसफी में डूबा है,
और अमीरों के पास तो है ही रॉकेट —
“चले जाएंगे हम उस पर बैठकर दूसरे ग्रह पर!”
बहुत समझदार लोग हैं हम... अपनी ही दृष्टि में।
🪔 आचार्य जी समझाते हैं:
जब मूर्खता और क्रूरता मिल जाती है, तो बहुत घातक परिणाम होता है।
जैसे दिख ही रहा है आँखों के सामने —
लेकिन अज्ञान के चलते सोच लेते हैं, “सब ठीक है, कुछ नहीं होगा।”
झेल लेंगे वैसे ही, जैसे सर्दी-गर्मी झेल लेते हैं।
Source - https://t.co/8wK8VCVQ6I
#AcharyaPrashant #ClimateChange #Operation2030
Posted by Akash Pawar on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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Today, Governments Seek Solutions, Acharya Prashant Has Been Giving Them Since 2012.
Today, even governments are offering rewards for “innovative solutions” to fight pollution.
But Acharya Prashant has been giving the only real solution since 2012, one that science still refuses to understand.
Climate change is not a problem of wrong technology but of wrong mentality, it is a spiritual problem. No technological improvement alone can curb carbon emissions. The solution must come from an awakening of mass consciousness. People must awaken and elect governments that listen to awakened voices. The challenge is great, but so are the rewards—you are saving not just yourself, your family, or your nation, but the entire planet.
— Acharya Prashant ji
Source:
https://t.co/BMIEH55vCD
#AcharyaPrashant #ClimateChange #Operation2030
Posted by Akhilesh on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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❤️*TRUTH WITHOUT APOLOGY*💙🌊
💭🫧Is rape just an isolated sexual event? Or is it a process, an accumulating violence that finally erupts in a grotesque climax?❓
👉We are trained to see the world as something to consume. Our ideas of progress and happiness often revolve around grabbing more, owning more, destroying more. This is not just economics. This is mindset.
🔎Consider simple contact. When you touch someone or something, what is the intention? To nourish, or to extract pleasure? Is there any love in that touch?
👉How far is loveless, self-serving contact from exploitation, mental, physical, or sexual? The line is thin. Too thin.
🚫We must stop treating rape as an isolated horror. If we are serious about ending it, we must understand how it grows: in homes, in films, in politics, in jokes, in silences.
👉Look around: our rivers choked, forests scraped bare, hill stations buried under plastic, species vanishing without names. What is this if not collective rape: of nature, of dignity, of the sacred?
✒️Where there is power without love, technology without awareness, contact without reverence, abuse follows. And when abuse becomes a way of life, rape is not an aberration. It is a culmination.
📌What is needed is not just punishment, but purification. Not just reaction, but revolution in the way we live, touch, relate, desire.
🎯We need an education that doesn't merely prepare us to earn or argue, but to love rightly. Only that will end this madness.❤️🔥
💭क्या बलात्कार सिर्फ़ एक अलग यौन घटना है? या यह एक प्रक्रिया है, एक संचित हिंसा जो अंततः एक भयावह चरमोत्कर्ष पर फूट पड़ती है?
✒️हमें दुनिया को उपभोग की वस्तु के रूप में देखने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। प्रगति और खुशी के हमारे विचार अक्सर ज़्यादा हथियाने, ज़्यादा स्वामित्व पाने, और ज़्यादा विनाश करने के इर्द-गिर्द घूमते हैं। यह सिर्फ़ अर्थशास्त्र नहीं है। यह मानसिकता है।
👉साधारण संपर्क पर विचार करें। जब आप किसी व्यक्ति या चीज़ को छूते हैं, तो आपका उद्देश्य क्या होता है? पोषण करना, या आनंद प्राप्त करना? क्या उस स्पर्श में कोई प्रेम है?
🚫प्रेमहीन, स्वार्थी संपर्क शोषण, मानसिक, शारीरिक या यौन शोषण से कितनी दूर है? रेखा बहुत पतली है। बहुत पतली।
👉हमें बलात्कार को एक अलग भयावहता के रूप में देखना बंद करना होगा। अगर हम इसे खत्म करने के लिए गंभीर हैं, तो हमें यह समझना होगा कि यह कैसे बढ़ता है: घरों में, फिल्मों में, राजनीति में, चुटकुलों में, खामोशियों में।
🔎चारों ओर देखें: हमारी नदियाँ घुट रही हैं, जंगल उजाड़ रहे हैं, पहाड़ी इलाके प्लास्टिक के नीचे दबे हुए हैं, प्रजातियाँ बिना नाम के लुप्त हो रही हैं। यह सामूहिक बलात्कार नहीं तो और क्या है: प्रकृति का, गरिमा का, पवित्रता का?
👉जहाँ प्रेम के बिना शक्ति, जागरूकता के बिना तकनीक, श्रद्धा के बिना संपर्क है, वहाँ दुर्व्यवहार होता है। और जब दुर्व्यवहार जीवन का एक तरीका बन जाता है, तो बलात्कार कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक चरमोत्कर्ष है।
🔥ज़रूरत सिर्फ़ सज़ा की नहीं, बल्कि शुद्धिकरण की है। सिर्फ़ प्रतिक्रिया की नहीं, बल्कि हमारे जीने, छूने, संबंध बनाने और इच्छा करने के तरीके में क्रांति की है।
🎯हमें ऐसी शिक्षा की ज़रूरत है जो हमें सिर्फ़ कमाने या बहस करने के लिए नहीं, बल्कि सही मायने में प्यार करने के लिए तैयार करे। सिर्फ़ यही इस पागलपन का अंत करेगा।
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*we need an education that doesn't merely prepare is to earn or argue but to love rightly. only that will end this madness.*
I got an education to earn or argue in my life. *admitted*
but after the *live session with acharya ji somehow I came to know to love rightly*
if live session with acharya ji reach to everyone *only that will end this madness* simple.
#Truth without apology
acharya ji❤🙏
#AcharyaPrashant #Books
Posted by saroj kumar mohapatra on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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bookstall📖 पर भी truth without apology book के जलवे 😍कायम है,बढते प्रतिसाद के कारण हमने amazon से 20 book मंगाये.. आज ही हमारी order received हुई 👍🏼
बहोत अच्छा लग रहा है, लोगों तक सच की, आचार्यजी 🪔🍁की बात पहुचानेमें अलग ही ख़ुशी मेहसूस होती है 🙂
सुरा के मैदान मे, कायर का क्या काम। सूरा सो सूरा मिलै, तब पूरा संग्राम।। - संत कबीर
#AcharyaPrashant #Books #Poems
Posted by चेतना T on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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*पानी या मुनाफा?*
अक्टूबर 2025 की शुरुआत में, अफ्रीका के कई देशों में एक आवाज़ गूँजी — “Our Water, Our Right.”
विभिन्न संगठनों और नागरिक समूहों ने मिलकर यह संदेश दिया कि पानी कोई व्यापार नहीं, बल्कि मानव अधिकार है।
लेकिन इस समय, पूरे महाद्वीप में जल-संकट को बहाना बनाकर निजी कंपनियों को पानी पर नियंत्रण सौंपा जा रहा है।
जहाँ कभी नदियाँ और कुएँ जीवन का स्रोत थे, वहाँ अब “प्रोजेक्ट” और “कॉन्ट्रैक्ट” शब्द सुनाई देते हैं।
निजी कंपनियाँ समुद्री पानी को मीठा बनाने की परियोजनाएँ चला रही हैं — महँगी, ऊर्जा-खपत वाली और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली।
ऐसा पानी आम जनता की पहुँच से बाहर होता जा रहा है, और गरीब समुदाय पहले से ज़्यादा प्यासे रह जाते हैं।
सवाल यह आता है कि पानी जैसी मूल आवश्यकता को भी व्यापार का विषय बनाने की हिम्मत हममें आई कैसे?
यह कोई नैतिक गलती नहीं, बल्कि सोची-समझी नीतिगत चाल है।
कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ वर्षों से “पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप” के नाम पर
पानी जैसी सेवाओं को निजी हाथों में सौंपने का दबाव डालती रही हैं।
सरकारें इसे “दक्षता” कहती हैं, पर असल में यह वही पुरानी कहानी है —
लाभ कुछ के पास जाता है, और खर्च सबके हिस्से आता है।
आचार्य जी बार-बार समझाते हैं , “जहाँ लाभ की गणना शुरू होती है, वहाँ करुणा की गिनती खत्म हो जाती है।”
जब हमने धरती के जल को भी “रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट” बना दिया,
तब यह सिर्फ नीति-निर्णय नहीं रहा — यह चेतना का पतन बन गया।
कंपनियाँ कहती हैं — “हम पानी को बचाएँगे।”
पर वे पानी को बचाना नहीं, बेचना चाहती हैं।
सरकारें कहती हैं, “हम जनता को सस्ती सेवा देंगे।”
पर अब जनता को हर बूँद का दाम चुकाना पड़ रहा है।
हम सब किसी न किसी रूप में इस सौदे का हिस्सा हैं —
कभी उपभोक्ता के रूप में, कभी मौन दर्शक के रूप में।
यह घटना हमें भीतर झाँकने पर मजबूर करती है:
क्या हमने सच में प्रगति की है,
या बस जीवन के हर स्रोत पर दाम चिपकाने की कला सीख ली है?
जब धरती का जल भी अनुबंधों में बाँट दिया जाएगा,
तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें क्या नाम देंगी — विकसित, या विक्रेता?
https://t.co/sLaaz7zkEJ
#AcharyaPrashant #CurrentAffairs #ClimateChange #Operation2030
Posted by Shivam on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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💠 पीड़ित बनने का खेल (The Victim Card)
अहंकार (ego) हमेशा अपने आपको “बेचारा” दिखाना चाहता है।
वह ऐसा इसलिए करता है ताकि उसे बदले बिना जीने का बहाना मिल जाए।
जब कुछ अच्छा होता है तो अहंकार कहता है —
👉 “ये मैंने किया।”
और जब कुछ बुरा होता है तो कहता है —
👉 “ये मेरे साथ हो गया।”
यानी —
अच्छा काम = मेरा श्रेय
बुरा समय = दूसरों की गलती
---
इस तरह अहंकार हमेशा खुद को सही और दूसरों को गलत दिखाता है।
वह कभी खुद की ओर नहीं देखता,
कभी अपनी गलती नहीं मानता।
बस हर बार कहता है — “मैं तो पीड़ित हूँ।”
---
ऐसा करने से उसे दो चीज़ें मिलती हैं —
1. लोगों की सहानुभूति (sympathy) — लोग उसे दया दिखाते हैं।
2. अपने ऊपर नियंत्रण का एहसास (control) — उसे लगता है कि वह सही है।
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लेकिन सच्चाई यह है कि
अहंकार को समाधान (solution) नहीं चाहिए,
उसे चाहिए दया (pity)।
वह बदला हुआ इंसान नहीं बनना चाहता,
वह बस बेचारा बना रहना चाहता है।
वह मुक्त (free) नहीं होना चाहता,
बस सही (right) साबित होना चाहता है।
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🌿 सरल समझ
जब भी हम अपने दुःखों के लिए दूसरों को दोष देते हैं —
“उसने ऐसा किया”, “मेरे साथ गलत हुआ”,
तो समझो कि हमारा अहंकार बोल रहा है।
क्योंकि अगर हम सच्चे हो जाएँ और ज़िम्मेदारी ले लें,
तो अहंकार टूट जाएगा।
और अहंकार को टूटना नहीं, बचा रहना है —
इसलिए वो हमें “बेचारा” बनाए रखता है।
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