तुमसे कहे अनेकों शब्दों का भाव केवल मेरा प्रेम है, मुझे प्रेम की अभिव्यक्तियों का ज्ञान नहीं, मैंने समर्पण ही को प्रेम की एकमात्र अभिव्यक्ति माना है; निःसंदेह मुझे प्रेम के रीति, नीति तथा व्यवहारों का भी ज्ञान नहीं, शायद यही कारण रहा मुझसे तुम्हारी घृणा का! प्रेम, अनुनय है।
तुम्हारी स्मृतियाँ ही कदाचित बाधक हैं मेरे निर्णय में अन्यथा जीवन के त्याग सा सहज कार्य भी असंभव प्रतीत नहीं होता; शायद पीड़ाओं से संघर्षरत प्रेम अपना आश्रय जीवित रखना जानता है ताकि अंतिम क्षणों में दृष्टिपटल पर केवल प्रिय का मुख हो, विरह की वेदना नहीं!
विधाता ने यज्ञ हेतु धन की सृष्टि की है तथा यज्ञ हेतु उसकी रक्षा करने के निमित्त पुरुषों को उत्तपन्न किया है; इसलिए सारे धन का यज्ञ-कार्य(धर्माथ) में ही उपयोग करना चाहिए। भोग हेतु धन का उपयोग न तो हितकर है और न ही उत्तम ही। -वेदव्यास