तथाकथित उच्च जातियों की मेरिट भीख ही है :
1. मुस्लिम शासन में भीख के रूप में मिला जमींदारी
2. 1793 में लॉर्ड कार्निवास से मिली भीख में मिली जमींदारी परमानेंट सेटलमेंट
3. मंदिरों में मिलने वाला चढ़ावा भीख ही है।
4. जन्म लेते ही उच्च जाति जन्म से होना भीख में मिली है।
5. सिस्टम में भाई भतीजावाद, और ��ंटरव्यू में जातिगत जुगाड़ से मिली नौकरी भीख ही है।
@magadh_updates This data is likely accurate, as I also secured placements with two companies during the on-campus drive at my college.
I completed my https://t.co/q29lhRiuS2 in Mechanical Engineering from Bakhtiyarpur College of Engineering this year.
क्या लक्ष्मीबाई और मंगलपाड़े क्रांतिकारी थे?
क्या भारतीय एजुकेशनल सिलेबस जातिवादी है?
भारत की इतिहास की किताबों में कुछ नाम बार-बार चमकाए जाते हैं—लक्ष्मीबाई, मंगल पांडे, तात्या टोपे, नाना साहेब। लेकिन सवाल यह है कि जिन SC, ST, OBC और बहुजन ��ायकों ने जल, जंगल, जमीन, सम्मान और आज़ादी के लिए संघर्ष किया, वे मुख्य अध्यायों में क्यों नहीं दिखते?
यहीं से सवाल उठता है—क्या भारतीय एजुकेशन सिस्टम ने “क्रांतिकारी” की परिभाषा भी जाति देखकर तय की?
क्रांतिकारी कौन है?
क्या वह जो अंग्रेजों की गोली से मारा गया?
क्या वह जिसे फाँसी हुई?
या वह जो जनता, शोषितों और अन्याय के खिलाफ खड़ा हुआ?
रानी लक्ष्मीबाई ��ो वीरांगना बताया जाता है। लेकिन उनके संघर्ष का मुख्य कारण झाँसी राज्य का उत्तराधिकार विवाद था। अंग्रेजों की “Doctrine of Lapse” नीति के तहत गोद लिए गए उत्तराधिकारी को मान्यता नहीं मिली और झाँसी को अंग्रेजी शासन में मिलाने की कोशिश हुई। ऐसे में सवाल उठता है—क्या यह भारत की जनता को स्वतंत्र कराने की लड़ाई थी, या अपने राज्य और सत्ता को बचाने की लड़ाई?
मंगल पांडे को 1857 की क्रांति का पहला नायक बताया गया। लेकिन वे अंग्रेजी सेना में सिपाही थे। विद्रोह तब हुआ जब कारतूसों पर गाय और सूअर की चर्बी की बात फैली और उन्हें मुँह से काटना पड़ता था। सवाल यह है—अगर कारतूस का धार्मिक विवाद न होता, तो क्या मंगल पांडे अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करते?
अब दूसरी तरफ देखिए—बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, झलकारी बाई, ऊदा देवी पासी और ��से हजारों लाखो बहुजन योद्धा, जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता, सामंती शोषण और सामाजिक अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया। सिने पर गोलिया भी खाई और फाँसी पर भी चढ़े लेकिन पाठ्यपुस्तकों में उनका स्थान सीमित क्यों रहा?
समस्या यह नहीं कि लक्ष्मीबाई और मंगल पांडे को क्यों पढ़ाया गया। समस्या यह है कि बहुजन नायकों को बराबर जगह क्यों नहीं दी गई।
जब राजघरानों और तथाकथित उच्च जातियों से जुड़े पात्रों को “राष्��्रीय नायक” बनाया जाता है, लेकिन दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के विद्रोहों को “स्थानीय आंदोलन” बनाकर छोटा कर दिया जाता है, तो यह इतिहास लेखन की भूल नहीं, साफ़ साफ़ ब्राह्मणवादी जातिवादी पक्षपात दिखता है।
जातिवाद सिर्फ गाली या भेदभाव का नाम नहीं है। जातिवाद यह भी है कि इतिहास में किसे नायक बनाया जाए और किसे भुला दिया जाए। किस संघर्ष को “क्रांति” कहा जाए और किसे “विद्रोह” बताकर किनारे कर दिय��� जाए या इतिहास के पन्नो से नाम ही गायब कर दिया जाय।
इसलिए सवाल फिर वही है—क्या भारतीय एजुकेशनल सिलेबस जातिवादी है?
अगर लक्ष्मीबाई और मंगल पांडे क्रांतिकारी हैं, तो बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, झलकारी बाई, ऊदा देवी और हजारों लाखो SC, ST, OBC योद्धा इतिहास के केंद्र में क्यों नहीं हैं?
अब इतिहास को श्रद्धा से नहीं, सवालों से पढ़ने का समय है।
क्योंकि इतिहास केवल अतीत नहीं बताता, वह यह भी तय करता है कि आने वाली पीढ़ी किसे अपना नायक मानेगी, अंडभक्त बनेगी या वैज्ञानिक चेतना के साथ खड़ी होगी।
Copy and paste to Google.
sqrt(cos(x))*cos(300x)+sqrt(abs(x))-0.7)*(4-x*x)^0.01, sqrt(6-x^2), -sqrt(6-x^2) from -4.5 to 4.5
Don't thank me, thank Google.
My friend moved to Patna for a ₹65k/month AI engineer role at a Muzaffarpur based startup.
Six months later, he realized something that would shock his Bangalore friends.
- Civil Engineering graduate
- Third job in the sector
- Moved to Patna for "stability"
- Salary: ₹65,000 per month
In Bangalore, people laughed. "That's barely a fresher's stipend," they said.
But a few months later, reality looked different.
- Rent for a spacious 2BHK in Boring Road: ₹14k
- Home-cooked food & local market groceries: ₹6k
- Commute (Electric rickshaws & short distances): ₹2k
- Litti Chokha, local snacks, & evening tea: ₹3k
Then come the things people forget about "Tier-2" life.
- No ₹500 bridge tolls.
- No ₹400 craft beers (mostly because of prohibition).
- Zero "status-symbol" pressure.
- Family-owned shops instead of high-end malls.
By the end of the month…
Savings were easily ₹35k–40k.
That’s when he realized the math that big-city recruiters try to hide.
₹1.5L in Bangalore often buys you a cramped lifestyle and a 2-hour commute.
₹65k in Patna buys you a comfortable home, a full-time cook, and a bank balance that actually grows.
Small salary.
Big life.
Welcome to the Patna Paradox.