छठ एक ऐसा त्यौहार है, जिसमें कोई पौराणिक देवी-देवता नहीं हैं, कोई मूर्ति नहीं है, किसी संस्कृत मंत्र या श्लोक का स्थान नहीं है, पुजारी की इस पर्व में कोई आवश्यकता नहीं है और न ही दक्षिणा का कोई रिवाज है.
छठ का कोई प्राचीन मंदिर भी नहीं है. किसी ग्रंथ में इस पर्व का कोई उल्लेख भी नहीं है. जनता अपने तरीके से छठ मनाती है और मनाने के तरीके में इलाके के हिसाब से काफी विविधता भी है. छठ गीतों की भाषा संस्कृत तो छोड़िए, हिंदी भी नहीं है.
शारदा सिन्हा से लेकर अनुराधा पौडवाल ने बड़ी संख्या में बेहद लोकप्रिय छठ गीत गाए हैं जिन्हे छट के दौरान अभी भी बजाए जाता है, और मगही, भोजपुरी, वज्जिका और मैथिली समेत विभिन्न बिहारी लोक भाषाओं में हैं. ये गीत करोड़ों लोगों तक पहुंचे हैं.
छठ के बारे में एक धारणा ये भी है कि संभवत: ये बौद्ध संस्कृति का त्यौहार है. भाषाविद और वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के प्रोफेसर डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह का तर्क है कि छठ त्यौहार का मूल भौगोलिक क्षेत्र वही है, जहां तथागत गौतम बुद्ध गए थे.
उनके मुताबिक छठ के मुख्य प्रसाद ठेकुआ में दो आकृतियां सबसे ज्यादा बनाई जाती हैं. पहली आकृति है पीपल का पत्ता और दूसरा है धम्म चक्र. ये दोनों बौद्ध प्रतीक हैं.
छठ आमजन यानी लोक का त्यौहार रहा है. इस अर्थ में इसका देश और दुनिया में मनाया जाना लोक संस्कृति की जीत है. संस्कृति की दिशा अक्सर ऊपर से नीचे की ओर होती है.
देश और समाज का अभिजन यानी इलीट जिस फैशन, कला, संस्कृति, भाषा, खान-पान, उत्सव को मनाते या अपनाते हैं, नीचे की जनता उसकी नकल करती है.
इसे समाजशास्त्री एमएन श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण कहा है हालांकि उन्होंने ये बात जाति क्रम में ऊंची और नीची मानी गई जातियों के बारे में कही है.
छठ ने इस मामले में उल्टी गंगा बहा दी है. अमीर या सामाजिक इलीट आमतौर पर जिन्हें अपने से नीचे मानते हैं, उनकी संस्कृति और परंपरा की नकल नहीं करते. लेकिन छठ उत्सव लोक से इलीट के पास जा रहा है.
इसलिए इसे एक दिलचस्प अपवाद के रूप में देखा जाना चाहिए. ये जरूर है कि लोक से इलीट तक पहुंचने के क्रम में छठ का त्यौहार बदल रहा है और उसका लोक तत्व नष्ट हो रहा है.
चार या पांच दशक पहले तक छठ मुख्य रूप से बिहार और नेपाल के तराई इलाकों में मनाया जाता था. मैं खुद अविभाजित बिहार के दक्षिणी हिस्से, यानी अब के झारखंड का हूं और मैंने इस त्यौहार के लोकप्रिय और व्यापक होते हुए खुद देखा है.
बाद में कोलकाता, दिल्ली और मुंबई में रहने के दौरान इस त्यौहार के विस्तार का मैं गवाह रहा हूं. 1980 तक झारखंड में इस त्यौहार को उत्तर बिहार से आए लोग, जिनमें ज्यादातर मजदूर थे, ही मनाते थे.
लेकिन झारखंड के औद्योगिक अंचलों में आबादी की संरचना बदलने के साथ बिहार की संस्कृति, भाषा और लोक जीवन का असर व्यापक हुआ और झारखंड के लोग भी छिटपुट इसे मनाने लगे. लेकिन ये बिहारी त्यौहार बना रहा.
दरअसल, बिहार से निकले लोग अपने साथ छठ लेकर देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में गए. महानगरों में बिहार एसोसिएशन ने इस त्यौहार के लिए व्यवस्था करने का काम संभाला. अमेरिका में भी बिहार या पूर्वी यूपी से गए लोग ही छठ मनाते हैं. बिहार के लोगों की संख्या शहरों में बढ़ने से वे कई जगह चुनाव के प्रभावित करने की स्थिति में भी आ गए.
राजनीतिक दलों ने इस संभावना को भांप लिया. अब कई सरकारें और राजनीतिक दल छठ का इंतजाम करने में जुटते हैं. राजनीतिक दल से लेकर प्रधानमंत्री तक छठ की बधाई देना नहीं भूलते।
#छठ_पूजा🪔केर सब सामग्री बाज़ार में भेटेत अछी। मटिक चूल्हा स अर्घक सब सामान बाज़ार में भेट जायत। बहुत खुशी केर बात जे आब ई समान बाजार में भेट जैत अछी मुदा दुखक गप सेहो अछी। पहिने घर घर में मटिक चूल्हा बनइत छल आब इ कला विलुप्त भ रहल अछी। #छठ_महापर्व Mithila Maithili Mithilawad 💛
आज 'नहाय - खाय' है !
छठव्रती कद्दू की सब्जी, अरवा चावल, चना का दाल और साथ में सारा परिवार- मुझे नहीं लगता पुरे साल इससे भी ज्यादा पवित्र भोजन किसी और दिन मिलता होगा- जैसे सूर्य ने उसमे अपनी शुद्धता मिला दी हो !
सूर्य अग्नी के द्योतक है और अग्नी से शुद्ध और पवित्र कुछ भी नहीं.
पुराण में क्या लिखा और शास्त्र में क्या लिखा है - ये सब हमको नहीं पता ! हमको बस यही पता है- छठ मेरा संस्कार है- मेरी सभ्यता है - मेरे खून में है- और यह महापर्व मेरे ह्रदय में बसता है !
आइसे नहाय खायेके साथ लोकाअस्था के बरका पवनी छठ के सुरुआत भेगेल ,इह साल हमर ११ साल भेल डन्डी छठी सहैत ।।।
जय छठी माइ
जय दिनकर दिनानाथ्🙏🙏🌺🌺
नहाय खाय प्रसाद अरबा अरबाइन।।
#MITHIA
फेर आइसे टुइटर पर ऐली सब आशिर्वाद दिउ 🙏🙏😳😳
जय मिथिला जय मैथिली जय किशोरी जी।।