गुलाम चाह के भी कहाँ जाएगा,
अपने अंदर से पिंजड़ा कैसे निकाल पाएगा।
शहर, नगर, सराय जहाँ भी जाएगा,
लौट के खुद वो मालिक के पास ही आएगा।।
#poetry#sayari#hindilitreture
“अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा” - कल प्रयागराज में एक छात्र ने मुझसे यही कहा। सालों की तैयारी, घर की ज़मीन बेची, माँ-बाप का कर्ज़ और फिर भी हाथ में कुछ नहीं।
यह हार उसकी नहीं है। यह उस व्यवस्था की हार है जिसने उसकी मेहनत का दाम देने से इनकार कर दिया।
तेरह दिन हो गए - गृह मंत्री अमित शाह के मुंह से एक शब्द नहीं निकला। मोदी जी माफी मांगने की जगह क्षमा बाँट रहे हैं।
@AmitShah जी, यह मत समझिए कि हम जवाबदेही मांगना बंद कर देंगे। राजधानी की सड़कों पर बच्चों पर लाठियां और पैलेट चले - और आपने एक शब्द नहीं कहा। आज नहीं तो कल, इस जुर्म का जवाब आपको देना ही पड़ेगा।
छात्र देश की रोशनी हैं, और मैं उनकी पूरी शक्ति के साथ खड़ा हूं।
#ChhatronKiGoonj
कभी लगता है पंचायत बुलावाऊ,
कभी लगता है कोर्ट-कचेहरी जाऊं ।
बेवफ़ा है वो या गुनाह सिर्फ मेरा है,
रोज ढूँढता हूँ खुद के अंदर
शायद कभी जवाब भी पाऊँ।।
#sayri#poetry
इस निर्णय का स्वागत है।
यदि सरकारी शिक्षक अपना पूरा समय और ऊर्जा सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थियों को दें, तो शिक्षा व्यवस्था निश्चित रूप से बेहतर होगी।
मगर इसके साथ सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है कि शिक्षकों से शिक्षण के अतिरिक्त अनावश्यक कार्य न करवाए जाएँ, सर्वे, चुनाव, गणना, कागजी कार्यवाही और दर्जनों गैर-शैक्षणिक काम भी बंद होने चाहिए। और उनका वेतन व सुविधाएँ ऐसी हों कि बढ़ती महंगाई के दौर में उन्हें अतिरिक्त आय के साधन तलाशने की आवश्यकता न पड़े शिक्षक सम्मानपूर्वक जीवन जी सके।
वो अफ़वाहों में रहती है ,
वो हवाओं में रहती है,
किसी शाम होती है खुद में,
कभी कैद अपनी ही निगाहों में रहती है।
वो निकले अपने गुफा से ,
तो नजर आए प्लेटो का प्रकाश,
तोड़ा सा क्या खुदा ने नवाजा,
वो कैद अपने हुस्न के कैद में रहती है,
न जाने क्या नशा है उन्हें खुदको बड़ा दिखने में,
इक पल भी नहीं लगाते किसी रिश्ते को खा जाने में।
वो कद्र करती है, जब मिलती हैं तो जताती हैं,
भूल जाती हैं सबकुछ वो जब भी दूर जाती हैं।।
आजकल मैं तमाम ऐसे स्वतंत्र पत्रकारो को देख रहा हूं जो आज किसी राजनीतिक पार्टी के न सहयोगी बनकर सामाजिक स्थिति को दिखा रहे हैं, मुझे या पत्रकारिता किसी क्रांति से काम नहीं मालूम पड़ रही है बल्कि ऐसा लगता है। @TheNewspinch@thepeeinghuman
NFOBC scholars have been requesting their fellowship for the past 3 months, but no concrete response has come from higher authorities.
Scholars rely on regular fellowship for their livelihood, just like government employees rely on their salaries
#SupportNFOBCScholars@MSJEGOI