Know the difference before you turn the wheel. 🚗
Parallel and perpendicular parking may look similar, but the setup and timing are completely different. Once you know where to position the car and when to turn, both become much easier.
The next war may not begin with tanks or fighter jets. It may begin with silent swarms, bird-like drones, autonomous vehicles and AI systems. The battlefield of the future will be won by algorithms. Frightening, the times to come!
This is pure gold 🔥
In 2006, Rahul Gandhi and Priyanka Gandhi were sitting in the first row during party program
Sonia Gandhi –– "Rahul, few senior leaders are yet to come"
Rahul Gandhi ❤️ –– "No problem, i will leave the seat and go back"
Priyanka Gandhi ❤️ –– "If that's the case, i will also go back"
Both of them went straight back to the last row and sat there. Shiela Dixit and other senior women leaders sat in the first row
Social media was rare thing at that time, and that's why Gandhi family's genuineness will never feel staged
What a bunch of wonderful people 🫡
पेंगुइन इंडिया का सोनिया गांधी की आत्मकथा Belonging: A Journey of Love से पीछे हटना सामान्य घटना नहीं है। ये बताता है कि मौजूदा राज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कितनी तरह की पाबंदियाँ लगाई जा रही हैं और प्रकाशन उद्योग कितने दबाव में काम कर रहा है।
पेंगुइन के अमेरिकी प्रकाशक नॉफ ने घोषणा की थी कि पहली छपाई एक लाख प्रतियों की होगी और इसे 10 नवंबर को रिलीज़ किया जाएगा। भारत में इसे पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ही लाने वाली थी। लेकिन अब वह पीछे हट गई है।
सूत्रों के मुताबिक प्रकाशक ने पांडुलिपि के एक हिस्से में संपादकीय बदलाव और कुछ अंश हटाने को कहा मगर सोनिया गाँधी ने इनकार कर दिया। इसके बाद ख़बर है कि हार्परकॉलिन्स इसके राइट्स लेने के करीब है। न तो प्रकाशक ने बताया कि कौन-सा हिस्सा आपत्तिजनक था, न ही सोनिया गाँधी ने कुछ कहा है।
यह घटना अकेली नहीं है। हाल के महीनों में पेंगुइन इंडिया जो सैको की मुजफ्फरनगर दंगों वाली किताब और जनरल नरवणे के संस्मरणों को लेकर भी पीछे हट चुकी है। एक ही घराने की ये बार-बार की वापसी एक पैटर्न दिखाती है: कानूनी जांच, मानहानि का डर, नक्शे-सीमा जैसे ‘संवेदनशील’ बिंदु, या सत्ता-विपक्ष दोनों तरफ से संभावित प्रतिक्रिया।
प्रकाशन एक कारोबार है; मुकदमे और राजनीतिक दबाव उसके लिए महंगे साबित होते हैं। लेकिन जब एक ही प्रकाशक बार-बार ‘बदलाव के लिए कहे और लेखक तैयार न हो तो वह प्रकाशन से हट जाए, तो सवाल उठता है—संपादन कहाँ खत्म होता है और आत्म-सेंसरशिप कहाँ शुरू होती है।
सोनिया गांधी का मामला और पेचीदा है। नेहरू-गांधी परिवार की निजी आत्मकथा अपने आप में राजनीतिक दस्तावेज है। ऐसे पाठ में किसी भी कटौती का मतलब इतिहास के एक संस्करण को काटना हो सकता है। लेखिका का इनकार इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि आत्मकथा का मूल्य उसकी अपूर्णता और असुविधा में होता है, साफ-सुथरी आधिकारिक कथा में नहीं।
अंत में किताब छपेगी ही—अगर भारत में नहीं तो बाहर, अगर पेंगुइन से नहीं तो किसी और से। असली सवाल प्रकाशन का नहीं, विश्वास का है। क्या भारतीय पाठक को बिना काटे-छाँटे राजनीतिक आत्मकथा पढ़ने का हक है? और क्या बड़े प्रकाशक अब केवल वही छापेंगे जो विवाद से बचा रहे? Belonging का विवाद इन्हीं दो प्रश्नों को खुला छोड़ जाता है।
लेकिन आज की तारीख़ में सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि क्या ये सरकार विपक्ष की एक महत्वपूर्ण नेता की अभिव्यक्ति को कुचलने की हद तक जा सकती है या उसने ऐसा वातावरण बना दिया है जिसमें वह संभव ही नहीं है?
"𝑺𝒎𝒂𝒔𝒉 𝒕𝒉𝒆 𝒑𝒂𝒕𝒓𝒊𝒂𝒓𝒄𝒉𝒚.
𝑩𝒆 𝑳𝒐𝒖𝒅, 𝑩𝒆 𝑷𝒓𝒐𝒖𝒅, 𝑭𝒊𝒈𝒉𝒕 𝑭𝒐𝒓 𝒀𝒐𝒖𝒓 𝑺𝒑𝒂𝒄𝒆."
At Chhatron Ki Goonj in Pune, LoP Shri @RahulGandhi interacted with young women in a heartfelt conversation about dreams, education and empowerment.
The true voice of Gen Z.