टोंक नगर परिषद की नवनिर्वाचित उप सभापति फरजाना सईद जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।
आशा करता हूँ कि आप पूरी निष्ठा और समर्पित भाव से क्षेत्र के विकास को नई दिशा प्रदान करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देंगी।
आपके सफल कार्यकाल और उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।
अध्यक्ष खुद कह रहे हैं कि पेपर कठिन है, और पूरे राजस्थान को पता है कि पहले से सिलेक्ट सब इंस्पेक्टरों को मात्र 3 महीने का समय दिया गया, तो यह कौन सा न्याय का सिद्धांत है जिसमें इस लेवल के पेपर को 3 महीने में निकालें।
@dineshdangi84 कुछ नहीं होने वाला है ...डांगी जी...आप खामखा परेशान रहते हों
अब से पहले काँग्रेस ने कहीं कमेटी बनाई हैं एक भी नतीजे पर नहीं पहुंची हैं...
ना ये पहुँचेगी
जिन्होंने 2008 और 2018 में निर्दलीयों के बूते अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाई हो, वो आज निर्दलीयों के वोट शेयर पर समीक्षा करने की सलाह दे रहे हैं।
यह महानुभाव इतने बेलगाम और अनुशासनहीन हो चुके हैं कि जब इनके गृह ज़िले जोधपुर में कांग्रेस पार्टी का मेयर बनाने के लिए संघर्ष चल रहा था, तब वहाँ जाना या कोई भूमिका निभाना तो दूर, ये प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से निर्दलीयों को मिले वोट शेयर का हवाला देकर अपनी ही पार्टी पर सवाल उठा रहे थे।
पूरे नगर निगम चुनावों में ये केवल एक दिन अपने गृह ज़िले में प्रचार के लिए उतरे और उस एक दिन भी ऐसा विरोध झेलना पड़ा कि पुलिस की मदद से बाहर निकलना पड़ा।
गहलोत जी गलती आपकी नहीं है.. आपकी फ़ितरत ही ऐसी है कि आप कभी एक बात पर नहीं टिकते.. आपने जीवनपर्यन्त आज तक दोगलेपन की राजनीति ही तो की है..
निकाय चुनाव से पहले आपने बोला कि 'भजनलाल जी को रोड शो करने की नौबत क्यों आई...मैंने तो कभी कैम्पेन भी नहीं किया, ये स्थानीय नेताओं का चुनाव होता है'
और चुनाव परिणामों के बाद बोल रहे हो कि हम भी रोड शो करते!
आपको किसने रोका था? आप जोधपुर में ही कर लेते रोड शो... लेकिन रोड शो करने के लिए सामान भी तो होना चाहिए, वो नहीं है ये आपको अच्छी तरह पता है, इसीलिए हर बार घंटाघर पे सभा करके ही अपने आपको प्रदेश का सबसे बड़ा नेता मान लेते हो...
स्वयं का वार्ड तक नहीं जिता पाए और अनर्गल बयानबाजी कर कांग्रेस पार्टी और प्रदेश के नेताओं पर सवाल खड़ा कर रहे हो..
शर्म आनी चाहिए आपको जहां एक तरफ़ कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कांग्रेस के प्रदर्शन को बेहतर बताते हुए पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए तथ्यों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं वहीं दूसरी तरफ़ आप प्रदर्शन को ख़राब बताने के लिए और अपनी ही पार्टी के नेताओं पर आरोप लगाने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हो...
हाशिये पर पड़े रहने की आपकी छटपटाहट और तड़फड़ाहट बुरी तरह नज़र आ रही है...😊😊
पंजाब का नशा संकट आज किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में, पंजाब के छह जिलें - अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारन, फाजिल्का, फिरोजपुर और लुधियाना - को “ultra-sensitive” जिलों में शामिल किया है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पंजाब में नशे की समस्या कितनी गहरी हो चुकी है।
इस ज़िम्मेदारी से ना तो AAP सरकार बच सकती है, न BJP। 2022 में पंजाब को 3 महीने में नशा मुक्त करने के वादे पर AAP की सरकार बनी थी। आज सरकार इस मोर्चे पर बुरी तरह से विफल रही है और ज़मीनी हालात और जमीन पर नशे की समस्या अभी भी गंभीर बनी हुई है। वहीं दूसरी ओर, देश में trafficking के ज़रिए ड्रग्स की सप्लाई और Mundra Port पर जब्त हुई हजारों करोड़ रुपए की ड्रग्स की खेप को लेकर केंद्र की भाजपा सरकार की चुप्पी को भी स्वीकार नहीं की जा सकती है। ऐसे में भाजपा की “नशा मुक्त पंजाब यात्रा” भी महज चुनावी दिखावा है।
सवाल दोनों से है। दोनों सरकारों की जिम्मेदारी है कि इस पूरे नेटवर्क को जड़ से पकड़ने के लिए बड़े स्तर पर ठोस कार्रवाई करें। लेकिन सवाल यही है कि अब तक इस नेटवर्क की पूरी कड़ी तक कार्रवाई क्यों नहीं पहुँच पाई है?
यह पंजाब की पूरी एक पीढ़ी के भविष्य का सवाल है। नौजवान नशे की गिरफ्त में है और परिवार बिखर गए हैं जिसका खामियाजा पंजाब और पंजाबियों को भुगतना पड़ रहा है।
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पहले मीडिया नैरेटिव बनाया गया कि भाजपा ने राजस्थान के नगर निकाय चुनावों में बंपर जीत दर्ज की है। जयपुर से दिल्ली तक इसी खबर की गूंज रही और प्रधानमंत्री तथा गृह मंत्री तक ने भाजपा को बधाई दी। लेकिन जैसे-जैसे शाम तक पूरी तस्वीर साफ हुई, आंकड़ों ने कहानी का दूसरा पक्ष सामने रख दिया।
भाजपा को 35.19%, कांग्रेस को 34.25% और निर्दलीयों को 27.38% वोट मिले। यानी भाजपा और कांग्रेस के बीच वोट शेयर का अंतर महज 0.94 प्रतिशत रहा।
इसके बाद नया नैरेटिव सामने आया निर्दलीयों को चुनाव का असली हीरो बताया गया और कांग्रेस को कमजोर साबित करने की कोशिश शुरू हुई। जबकि कांग्रेस ने 2014 की तुलना में अपने वोट शेयर में लगभग 4 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की है, जबकि निर्दलीयों की बढ़ोतरी करीब 1.25 प्रतिशत रही। निर्दलीयों के 27.38 प्रतिशत वोट को “ऐतिहासिक” बताने से पहले यह भी याद रखना चाहिए कि 2014 की मोदी लहर में भी निर्दलीयों को 26.13 प्रतिशत वोट मिले थे।
निर्दलीयों की बढ़त से ज्यादा भाजपा के प्रदर्शन में आई गिरावट का है।भाजपा का वर्तमान वोट शेयर 35.19 प्रतिशत है जो 2020-21 के 35.62 प्रतिशत से भी कम है। यानी विपक्ष में रहते हुए 35.62 प्रतिशत वोट पाने वाली भाजपा, सत्ता में रहते हुए 0.43 प्रतिशत नीचे चली गई।और यदि 2014 से तुलना करें तो भाजपा के वोट शेयर में करीब 6.15 प्रतिशत की गिरावट दिखाई देती है।
नैरेटिव चाहे जो बनाया जाए, अंततः चुनाव का सबसे ईमानदार आईना आंकड़े ही होते हैं।
पहले शिवसेना, फिर NCP और अब तृणमूल कांग्रेस।
हर बार एक ही पैटर्न - BJP और चुनाव आयोग मिलकर एक पार्टी को तोड़ते हैं। फिर उसका चुनाव चिन्ह छीन लिया जाता है।
जब पूरी की पूरी पार्टी चोरी हो सकती है, तो करोड़ों भारतीयों के वोट चोरी होना भी हैरानी की बात नहीं।
वोट चोरी। सरकार चोरी। अब पार्टी चोरी - ये हमारे लोकतांत्रिक पतन के प्रतीक बन गए हैं।
ECI की संवैधानिक ज़िम्मेदारी जनादेश की रक्षा करना है - मगर उल्टा वो उन ताकतों की मदद कर रहा है, जो जनता के फैसले को ही पलट देते हैं।
यह लड़ाई सिर्फ़ ममता बनर्जी जी की नहीं है। यह हर राजनीतिक दल, हर मतदाता की लड़ाई है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव चाहता है।
अशोक गहलोत के इस बयान से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि तीन बार मुख्यमंत्री रहते हुए सरकार गंवाने के बावजूद वे आज तक अपनी राजनीतिक असफलताओं के वास्तविक कारणों का आत्ममंथन नहीं कर पाए हैं। करीब चार दशक की चुनावी राजनीति के अनुभव के बावजूद यदि कोई नेता बिना आंकड़ों का अध्ययन किए सार्वजनिक बयान देता है, तो यह गंभीर राजनीतिक नादानी और गैर-जिम्मेदाराना विश्लेषण का उदाहरण है।
अब कोई उनसे यह पूछे कि 2020 के नगर निकाय चुनावों में, जब वे स्वयं मुख्यमंत्री थे, निर्दलीयों को करीब 20 प्रतिशत वोट कैसे मिले? कांग्रेस को लगभग 40 प्रतिशत वोट पर क्यों संतोष करना पड़ा, जबकि विपक्ष में बैठी भाजपा करीब 38 प्रतिशत वोट हासिल करने में सफल रही?
आज जब स्थिति यह है कि उनकी अपनी पार्टी ने उनके प्रत्यक्ष प्रचार के बिना नगर निकाय चुनावों में ऐसा प्रदर्शन किया है कि भाजपा से उसका वोट अंतर केवल कुछ हजार का रह गया है। ऐसे समय में पार्टी के प्रदर्शन पर अनावश्यक मंथन की बात करके उसे कमजोर करने के बजाय उन्हें यह विचार करना चाहिए कि संगठन ने उनके बिना इतना बेहतर प्रदर्शन कैसे किया।
मंथन करना ही है तो उस दौर पर भी होना चाहिए, जब 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ऐतिहासिक रूप से केवल 21 सीटों पर सिमट गई थी। उसके बाद 2014 के नगर निकाय चुनावों में कांग्रेस को करीब 30 प्रतिशत वोट मिले, जबकि निर्दलीयों को लगभग 26 प्रतिशत और भाजपा को करीब 41 प्रतिशत वोट हासिल हुए।
सवाल सीधा है - 2003, 2013 और 2023 में मुख्यमंत्री रहते हुए कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ी। तीनों चुनावों के बाद परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन नेतृत्व के स्तर पर आत्ममंथन का सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
अगर आंकड़ों से राजनीति का विश्लेषण किया जाए तो तस्वीर कहीं ज्यादा स्पष्ट दिखाई देती है। इसलिए आज जरूरत अपनी ही पार्टी के हालिया प्रदर्शन पर सवाल उठाने की नहीं, बल्कि उन चुनावी पराजयों के आंकड़ों को सामने रखकर यह समझने की है कि आखिर वे कौन-से कारण थे, जिनकी वजह से तीन बार सत्ता हाथ से निकल गई।
चार दशक की राजनीति का अनुभव तभी सार्थक है, जब उससे सबक भी लिया जाए।
मध्यस्थ कभी इतिहास नहीं बनाते…
“अनिर्णायक नेतृत्व की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह एक स्व-विस्तारित समस्या है। जितना नेता झिझकता है, उतना ही अधिक लोग उसके निर्णय को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। और जितने अधिक लोग उसे प्रभावित करते हैं, उतना ही वह निर्णय लेने में और अधिक उलझता जाता है। एक कमज़ोरी अनेक समस्याओं को जन्म देती है। आज राजस्थान में यही हो रहा है, मंत्रिपरिषद के भीतर विभिन्न गुट हैं। हाईकमान के अलग-अलग 'प्रतिनिधि' हैं जो जयपुर में अपना प्रभाव जमाने की होड़ में हैं। नौकरशाही के अपने खेमे हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री की भूमिका एक सक्रिय शासक की नहीं, बल्कि एक 'मध्यस्थ' की बनकर रह गई है और मध्यस्थ कभी इतिहास नहीं बनाते।”