जालंधर की रहने वाली अनन्या ने आज स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भारतीय सेना की ड्रेस पहनने की जिद की. घर वाले ड्रेस खरीद लाये और पहना दी. फिर दीदी जी ने डुप्लीकेट AK-47 की मांग की. घर वालों ने वह भी दिला दी. अब दीदी जी कह रही है कि मुझे आतंकवादियों को टपकाना है, उनको लेकर आओ. अब घर वाले सुबह से आतंकियों की खोज में निकले हुए हैं। 🤣🤣
@savedemocracyI आप सही बोल रहे हो , किसी भी छात्र को इस चाल में नहीं फसना है, सबको एकजुट होकर आरक्षण को आर्थिक आधार पर लाने की कोशिश हो, किसी को जाति में नहीं बाटना है, सबको मिलकर आवाज उठानी है।
एक छात्र की ताकत होती है:
शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करना।
सवाल पूछना और जवाबदेही की मांग करना।
तथ्य और तर्क के साथ अपनी बात रखना।
एकजुट होकर अपनी आवाज़ बुलंद करना।
संविधान और कानून का सम्मान करते हुए अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना।
लेकिन एक छात्र की पहचान कभी नहीं होनी चाहिए:
सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाना।
पुलिस या किसी अन्य व्यक्ति से हिंसा या मारपीट करना।
पत्थरबाज़ी करना।
गाली-गलौज या अभद्र भाषा का प्रयोग करना।
किसी का मज़ाक उड़ाना या नफरत फैलाना।
किसी भी राजनीतिक, असामाजिक या देश-विरोधी तत्व को अपने आंदोलन का फायदा उठाने देना।
याद रखिए, जब आंदोलन हिंसक हो जाता है, तो असली मुद्दा पीछे छूट जाता है। फिर लोगों का ध्यान समस्या से हटकर केवल हिंसा पर केंद्रित हो जाता है।
एक जागरूक छात्र वही है जो अपनी बात तर्क, संयम और सम्मान के साथ रखता है। अपनी भावनाओं का इस्तेमाल किसी और के स्वार्थ के लिए मत होने दीजिए।
आवाज़ बुलंद कीजिए, हाथ नहीं।
न्याय की मांग कीजिए, हिंसा नहीं।
ऐसा आंदोलन कीजिए जिस पर आने वाली पीढ़ियाँ गर्व करें, शर्म नहीं।
#जंतर_मंतर_ब्रेकिंग_न्यूज #protest #studentsprotest
BIG NEWS 🚨 Republic Media claims -
A leaked U.S. Embassy alert dated July 17 asked U.S. citizens to avoid gatherings in Delhi, four days before the July 20 violence.
Was there any foreign role in the unrest?
दिल्ली फिर धुएँ की चादर में लिपटी है। साँस लेना भी अब एक संघर्ष बन गया है।
अब वक्त आ गया है कि हम सब मिलकर हवा को बचाएँ, वरना आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी। 🌫️🌍
#DelhiPollution#AirQuality
12556 गोरखधाम एक्सप्रेस पिछले एक हफ्ते से लगातार घंटों की देरी से चल रही है।
आज फिर ट्रेन 5 घंटे से ज़्यादा लेट है।
वीकेंड पर घर जाने का प्लान था, लेकिन पूरा दिन ट्रेन में ही बीत गया।
हर दिन देरी, हर स्टेशन पर इंतज़ार — लेकिन न कोई सुनवाई है, न समाधान।
सबसे बड़ा सवाल ये है कि कोई सरकार से इस बारे में सवाल तक नहीं पूछता।
हम 2025 में भी उसी लेट-लतीफ ट्रेनों से परेशान हैं।
साल बदले, सरकारें बदलीं, लेकिन रेलवे की हालत नहीं बदली।
कोई सुधार नहीं आया।