उसके चेहरे पर उभरती हँसी, उदासी
सब कुछ अक्षरों की भाँति
पढ़ा जा सकता था,
उसके हँसने से सूर्योदय प्रतीत होता था
उदासी सूर्यास्त में भटके पंक्षियों की तरह
मेरे मन का कागज़
उसके ही अक्षरों पर निर्भर था
वो जो कुछ भी लिखता
मुझपर अंकित हो जाया करता।
- स्मृति प्रशा।।
मैं चाहती हूं
तुम अपने ख़ुद के
व्यक्तित्व से जाने जाओ।
लोग भले ही कहानियां भूल जाते है
लेकिन किसी का व्यक्तित्व कभी नहीं भूल पाते;
कहानियां काल्पनिक हो सकती है
पर इंसान नहीं।
- स्मृति प्रशा।
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तुम्हें पता है
मेरी कहानियों में
तुम कभी क्यों नहीं होते हो
क्योंकि कहानियों से परे हो तुम।
जिस भी दिन मैंने
तुम पर कहानी लिख दी,
वो दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कहानियों
में से एक मानी जाएगी।
पर मैं नहीं चाहती, लोग तुम्हें
कहानियों की तरह याद रखे।
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पुकारना भी एक तरह की सजा हैं
जिसे पुकारो वो सुनता नहीं
और जिसे पुकारते भी नहीं
वो हमेशा पास रहते है।
इतने पास होकर
तुम्हें कई दफ़ा
पुकारे जाने के बाद
तुमने एक हल्की सी आवाज़ सुनी,
और जिसे मैंने नहीं पुकारा
उसने मौन भी सुन ली।
- स्मृति प्रशा