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भारत की शिक्षा व्यवस्था आज सिर्फ़ एक वसूली तंत्र बन गई है।
ज़रा सोचिए - देशभर के परिवार जितना पैसा सिर्फ़ NEET की तैयारी पर ख़र्च करते हैं, वो भारत सरकार के पूरे शि���्षा बजट के बराबर है।
आज कोटा से, और देश के हर कोने से, लाखों युवा एक सुर में कह रहे हैं - इस व्यवस्था ने हमारे साथ अन्याय किया है।
हर युवा अलग है, पर सबकी कहानी एक - या तो सपने देखने नहीं दिए गए, या देखे हुए सपने तोड़ दिए गए।
‘छात्रों की गूंज’ सिर्फ़ अभियान नहीं - एक क्रांति है। हमें एक ऐसी व्यवस्था बना��ी है जो आपको बड़े सपने देखने का हक़ दे और आपकी ज़िंदगी गिरवी रखे बिना, उन्हें पूरा करने में आपका साथ दे।
#ChhatronKiGoonj
आकांक्षा डॉक्टर बनकर देश और समाज की सेवा करना चाहती थी। आकांक्षा के पिता किसान हैं। बेटी के डॉक्टर बनने के सपने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड पर ₹3 लाख का कर्ज़ लिया। और नागपुर में खुद कुक की नौकरी कर ली, ताकि बेटी वहाँ coaching कर सके।
एक पिता ने जो कर सकता था, सब किया।
फिर NEET पेपर लीक हुआ। परीक्षा रद्द हुई। उस अनिश्चितता में आकांक्षा हमें छोड़ कर चली गई।
आकांक्षा की मौत आत्महत्या नहीं - मोदी जी की एक भ्रष्ट, टूटी हुई व्यवस्था की देन है।
और ��र्मेंद्र प्रधान जी? आज भी कुर्सी पर हैं।
फिर वही कमेटी। वही ट्रांसफर। वही जाँच। न सुधार, न न्याय।
मोदी जी, कुर्सी स्थायी नहीं होती - आती-जाती रहती है। लेकिन आपने 12 वर्षों में शिक्षा व्यवस्था को जिस हद तक बर्बाद किया है, उसकी कीमत भारत की एक पूरी युवा पीढ़ी चुका रही है।
SSC CAPF/SSF/Assam Rifles Exam में घोटाला देखिए -
Noida के online exam centre पर STF raid के खुलासे सिर्फ cheating भर नहीं, बल्कि पूरे recruitment system पर सवाल हैं।
Hidden laptops, proxy servers और बाहर बैठकर candidates की screen control करके paper solve करवाना…क्या ये organised exam mafia नहीं है?
असल national security पर खतरा यही है।
अगर इन exams में लोग नकल करके पहुँचेंगे,
तो आने वाला भारत हम किन हाथों में दे रहे हैं?
एक तरफ लाखों छात्र सालों मेहनत करते हैं,
��ूसरी तरफ कुछ लोग technology और setting के दम पर नौकरी खरीदते हैं…
अब समय आ गया है कि सिर्फ छोटे operators नहीं,
पूरे network और इसमें शामिल अधिकारियों पर भी सख्त कार्रवाई हो।
वरना मेहनत हारती रहेगी…
और माफिया जीतता रहेगा।
@narendramodi @dpradhanbjp @SSC_GoI
कांग्रेस की नाकामी और भ्रष्टाचार से परेशान होकर देश ने बदलाव चुना था। लोगों को लगा था अब समय पर projects पूरे होंगे, corruption कम होगा और जनता के टैक्स का इस्तेमाल सही होगा।
लेकिन आज फिर वही खड़े हैं -
क्यों कई बड़े projects की लागत दोगुनी-तीन गुनी हो जाती है?
क्यों deadlines बार-बार बढ़ती हैं?
क्यों वही बड़ी कंपनियां लगातार मोटे contracts लेती रहती हैं जो चुनावी चंदा देती हैं?
क्या आम जनता सिर्फ टैक्स देने और महंगाई झेलने के लिए है?
Road project हो, smart city हो, pollution control हो या infrastructure ,ground reality और सरकारी विज्ञापनों में इतना फर्क क्यों है?
जनता ने सरकार event management के लिए नहीं चुनी थी।
लोगों को जवाब चाहिए |
वादों का क्या हुआ?
रोजगार का क्या हुआ?
महंगाई कम क्यों नहीं हुई?
और सबसे जरूरी क्या?
सत्ता और चंदा देने वाली कंपनियों का रिश्ता अब नीति तय करेगा?
देश को transparency चाहिए, सिर्फ नारेबाजी नहीं।