पत्रकार- आप हिंदू समाज से आती हैं..
नेहा भारती- हिंदू समाज नहीं दलित समाज से हूं
पत्रकार- आप अपने आप को हिंदू नहीं मानती हैं?
नेहा भारती- नहीं मैं बिल्कुल नहीं मानती। हिंदू ही दलितों को दलित मानता है, वो दलितों को हिंदू नहीं मानता
नेहा भारती के इस बयान पर आपका क्या विचार है??
किसी मूर्ख के अवैध शुक्राणु!
जिन अंग्रेज़ी सरकार के सर्वे में इस टेडे बाल अजीत भारती को वर्धमान में डोम शिक्षक पढ़ाता हुआ मिला था ना, जिसका रिफरेन्स ये अपनी स्पीच में दे रहा था। अंग्रेजो के सर्वे में वहा ऐसा मिला था। अब तुम्हे उन्ही अंग्रेजों के सर्वे और उस समय के सबूत दे रहा हूँ। ये तुम्हारा गालीबाज़ सवर्णों का बौद्धिक निचोड़ अजीत भारती @ajeetbharti क्या बोल रहा था ? 1970 से पहले का कोई सबूत नहीं कोई इसका सोर्स नहीं, सब वामपंथी प्रोपेगंडा है।
अब इस भांड को ये फैक्ट्स के जूते सूंघा सूंघा कर होश में लाऊँगा, और इस भांड के चेले चपाटो को भी।
1970 से पहले 1916 में अंग्रेज़ी आईसीएस अधिकारी वीसी रसेल की किताब ‘ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ़ द सेंट्रल प्रोविंस ऑफ़ इंडिया’ पेज 143 पढ़ ले। और इससे पहले 1885 में बॉम्बे गज़ेटियर जिसका सबूत डॉ अंबेडकर ने भी दिया था, लेकिन पूरी बात गोल करके बोल रहे, अंबेडकर के पास भी सबूत नहीं था। अंबेडकर तो छोड़ो बहुत बड़ी बात मैं तुम्हारे सारे चक्षु खोल दूँगा।
अजीत भारती अंग्रेज़ी सरकार की किताबो को रेफरेंस में यूज़ करके बता रहा इतने स्कूल थे इतने शूद्र पढ़ते थे। अरे शूद्र तो यादव,कायस्थ, मौर्य, सैनी…सब बताए जाते है, इसमें वो जातियां कहा है सर्वे में जिनको अछूत कहा जाता था ? किस सर्वे में लिखा है भारत की एससी में सबसे बड़ी जाति जाटव, बाल्मीकि, महार, पासी ये सब साथ में बैठकर पढ़ रहे थे?
अजित, @ajeetbharti
तुमने यह कुतर्क किया कि यदि दलित और वंचित समुदाय ठाकुरों के कुएँ खोद सकते थे, तो अपना कुआँ खोदकर पानी क्यों नहीं पी लेते थे?
इसका सीधा जवाब है कि कुआँ खोदने के लिए केवल फावड़ा और मेहनत ही नहीं, बल्कि जमीन, पूँजी और सामाजिक अधिकार भी चाहिए होते हैं।
सवाल यह नहीं है कि वे कुआँ खोद सकते थे या नहीं, बल्कि यह है कि संसाधनों और अधिकारों तक पहुँच किसके पास थी।
कुआँ खोदना और कुएँ का मालिक होना दो अलग बातें हैं।
अजित, तुम्हारा तर्क वैसा ही है जैसे कोई पूछे कि महल बनाने वाले मजदूर ने अपना महल क्यों नहीं बना लिया, या खेत जोतने वाले किसान ने अपनी ज़मींदारी क्यों नहीं खड़ी कर ली।
जिन लोगों के पास अपनी जमीन नहीं थी, जो आजीविका के लिए दूसरों पर निर्भर थे, और जिन्हें सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता था, उनके लिए अपना कुआँ बनाना केवल तकनीकी नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक प्रश्न भी था।
और जब कहा जाता है कि सदियों तक उन्हें पानी नहीं पीने दिया गया, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे बिना पानी के जीवित थे।
इसका अर्थ यह है कि उन्हें अनेक कुओं, तालाबों और सार्वजनिक जलस्रोतों तक समान पहुँच नहीं थी, या उन्हें अपमान और भेदभाव के साथ पानी लेने के लिए मजबूर किया जाता था।
जीवित रहना और बराबरी के अधिकार के साथ संसाधनों तक पहुँच होना, दोनों अलग बातें हैं।
इसलिए “अपना कुआँ क्यों नहीं खोद लिया?” कहना वास्तविक सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को नज़रअंदाज़ करना है।
यह कुतर्क केवल व्यक्तिगत मेहनत को केंद्रित कर बोला गया है, जबकि संसाधनों के असमान वितरण और सामाजिक जकड़नों की अनदेखी किए हो तुम।
@rajkumarbhatisp@DrLaxman_Yadav
इस औरत की संवेदनाहीनता देखिए।
रायबरेली जिला अस्पताल में एक महिला कर्मी मानसिक रूप से बीमार युवक को गाली देकर लात मार रही है।
उसने महज 30 सेकंड में 10 बार लात मारी। वहां मौजूद गॉर्डस मूकदर्शक तमाशा देख रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में असहाय मरीजों के साथ ऐसी क्रूरता शर्मनाक है।
IIT जैसे देश के सर्वोच्च शिक्षण संस्थानों में यदि आरक्षित वर्ग के प्रोफेसरों के हजारों पद वर्षों तक खाली पड़े रहें, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और संविधान की भावना के साथ गंभीर अन्याय है।
आख़िर OBC, SC और ST वर्ग के शिक्षकों की नियुक्तियाँ क्यों नहीं हो रहीं? क्या सरकार आरक्षण नीति को कागज़ों तक सीमित रखना चाहती है? शिक्षा में प्रतिनिधित्व के बिना समान अवसर की बात सिर्फ़ एक दिखावा है।
खाली पदों को तत्काल भरें और जवाब दें कि आखिर संविधान प्रदत्त आरक्षण लागू करने में देरी क्यों हो रही है।
मनुस्मृति पोलखोल part3
चैप्टर 1,
श्लोक 13
ताभ्यां स शकलाभ्यां च दिवं भूमिं च निर्ममे।
मध्ये व्योम दिशश्चाष्टावपां स्थानं च शाश्वतम्॥ १३॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने उस अंडे के दो टुकड़ों से आकाश और पृथ्वी बनाई। बीच में अंतरिक्ष, आठ दिशाएं और जल का स्थायी स्थान बनाया।
आलोचना:
सृष्टि का रचियता “ब्रह्मा द्वारा अंडा फोड़कर पैदा हो गया।
मनुस्मृति की चाल यही है—पहले सृष्टि उत्पत्ति को गपोड़ बनाओ, फिर उसी गपोड़ के नाम पर समाज को भी वर्णों में बांट दो। यानी पहले ब्रह्मांड पर अधिकार, फिर मनुष्य पर अधिकार।
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श्लोक 14
उद्बबर्हात्मनश्चैव मनः सदसदात्मकम्।
मनसश्चाप्यहङ्कारमभिमन्तारमीश्वरम्॥ १४॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने अपने से सत-असत स्वरूप मन उत्पन्न किया और मन से अहंकार उत्पन्न किया।
आलोचना:
असल अहंकार क्या है?
किसी मनुष्य का खुद को जन्म से श्रेष्ठ मानना।
किसी जाति का खुद को ईश्वर के मुंह से पैदा हुआ बताना।
किसी वर्ग का यह दावा करना कि ज्ञान, पूजा, सत्ता और सम्मान केवल उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।
इसलिए मनुस्मृति में “अहंकार” का वर्णन भी अपने आप में विरोधाभासी है। यह ग्रंथ अहंकार की बात करता है, लेकिन सामाजिक अहंकार को धर्म बना देता है।
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श्लोक 15
महान्तमेव चात्मानं सर्वाणि त्रिगुणानि च।
विषयाणां ग्रहीतॄणि शनैः पञ्चेन्द्रियाणि च॥ १५॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने महत् तत्व, तीन गुण—सत्त्व, रज, तम—और विषयों को ग्रहण करने वाली पांच इन्द्रियां उत्पन्न कीं।
आलोचना:
यहां सत्त्व, रज और तम की बात करके समाज में मनुष्यों की श्रेणीकरण मानसिकता को मजबूत किया जाता है।
खतरा यह है कि जब किसी व्यक्ति या समुदाय को “सत्त्वगुणी”, “रजोगुणी” या “तमोगुणी” जैसे खांचों में डाल दिया जाता है, तो वास्तविक सामाजिक अन्याय छिप जाता है।
गरीबी, शिक्षा से वंचना, श्रम का शोषण, जातिगत अपमान—इन सबको व्यवस्था की गलती मानने के बजाय व्यक्ति के “गुण” या “कर्म” पर डाल दिया जाता है।
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श्लोक 16
तेषां त्ववयवान्सूक्ष्मान् षण्णामप्यमितौजसाम्।
संनिवेश्यात्ममात्रासु सर्वभूतानि निर्ममे॥ १६॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने इन छह तेजस्वी तत्वों के सूक्ष्म अंशों को मिलाकर सभी प्राणियों की रचना की।
आलोचना:
यहां कहा गया कि सभी प्राणियों की रचना उन्हीं सूक्ष्म तत्वों से हुई। अगर सभी प्राणी एक ही तत्वों से बने हैं, तो मनुष्य-मनुष्य में जन्म आधारित ऊंच-नीच कैसे पैदा हो गई?
यही मनुस्मृति का बड़ा विरोधाभास है। सृष्टि के स्तर पर सबको समान तत्वों से बना बताती है, लेकिन समाज के स्तर पर मनुष्य को जन्म से अलग-अलग दर्जों में बांटती है।
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श्लोक 17
यन्मूर्त्यवयवाः सूक्ष्मास्तानीमान्याश्रयन्ति षट्।
तस्माच्छरीरमित्याहुस्तस्य मूर्तिं मनीषिणः॥ १७॥
अर्थ:
इन छह सूक्ष्म अवयवों के आश्रय से शरीर बनता है, इसलिए ज्ञानी लोग उसे शरीर कहते हैं।
आलोचना:
इस श्लोक में शरीर की रचना को सूक्ष्म तत्वों से जोड़ा गया है। लेकिन प्रश्न यह है कि जब शरीर सबका तत्वों से बना है, तो किसी शरीर को जन्म से पवित्र और किसी शरीर को अपवित्र क्यों माना गया?
जाति-व्यवस्था ने शरीर तक को अपमानित किया। किसी का स्पर्श अपवित्र, किसी का जन्म नीच, किसी का श्रम गंदा—यह सब उसी मानसिकता का परिणाम है, जिसे मनुस्मृति जैसे ग्रंथों ने वैचारिक आधार दिया।
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श्लोक 18
तदाविशन्ति भूतानि महान्ति सह कर्मभिः।
मनश्चावयवैः सूक्ष्मैः सर्वभूतकृदव्ययम्॥ १८॥
अर्थ:
आकाश आदि महाभूत अपने-अपने कर्मों सहित उस ब्रह्म में प्रवेश करते हैं, और मन भी अपने सूक्ष्म अवयवों सहित सभी प्राणियों में प्रकट होता है।
आलोचना:
यहां “कर्म” की भाषा को सामाजिक अन्याय सही ठहराने का सबसे बड़ा हथियार बनाया गया है।
गरीब को—पिछले जन्म का कर्म।
जातिगत अपमान को —कर्मफल।
शिक्षा से दूर रखा गया—कह दो उसका धर्म सेवा है।
सत्ता और ज्ञान पर कब्जा—कह दो वह जन्म से योग्य है।
मनुस्मृति का खतरनाक पक्ष यही है कि यह मनुष्य के वर्तमान दुख को बदलने के बजाय उसे दैवी-कर्म व्यवस्था में फंसा देती है।
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श्लोक 19
तेषामिदं तु सप्तानां पुरुषाणां महौजसाम्।
सूक्ष्माभ्यो मूर्तिमात्राभ्यः सम्भवत्यव्ययाद्व्ययम्॥ १९॥
अर्थ:
इन सात महातेजस्वी तत्वों के सूक्ष्म अंशों से यह नश्वर संसार अविनाशी तत्व से उत्पन्न होता है।
आलोचना:
यहां संसार को अविनाशी तत्व से उत्पन्न नश्वर रूप बता सामाजिक प्रश्नों से भागने का माध्यम बनती है।
जब जनता समानता मांगेगी, तो कहा जाएगा—यह संसार नश्वर है।
जब शोषित अधिकार मांगेगा, तो कहा जाएगा—कर्मफल है।
जब जाति पर सवाल होगा, तो कहा जाएगा—धर्मशास्त्र सनातन है।
जब तर्क मांगा जाएगा, तो कहा जाएगा—यह सूक्ष्म और अचिन्त्य है।
यानी मनुस्मृति में दर्शन का उपयोग मुक्ति के लिए नहीं, व्यवस्था को स्थायी बनाने के लिए होता दिखता है।
NCERT बुक में मनुस्मृति श्लोक डाला जा रहा है ऐसे में यह जरूरी है की ब्राह्मणवादी धूर्त मानसिकता को अच्छे से समझा जाय।
आज चैप्टर 1 से शुरुवात करते है।
मनुस्मृति की शुरुआत ही वर्ण-व्यवस्था को “धर्म” बनाकर पेश करती है
श्लोक 1
मनुमेकाग्रमासीनमभिगम्य महर्षयः।
प्रतिपूज्य यथान्यायमिदं वचनमब्रुवन्॥ १॥
अर्थ: महर्षि, एकाग्र होकर बैठे मनु के पास गए, उनका पूजन किया और उनसे प्रश्न किया।
आलोचना:
यहां शुरुआत ही “मनु” को सर्वोच्च ज्ञाता बनाकर की गई है। यानी समाज का कानून, नैतिकता और व्यवस्था किसी लोकतांत्रिक विचार-विमर्श से नहीं, बल्कि एक व्यक्ति/ऋषि-परंपरा की कथित दिव्य सत्ता से तय होनी है। यही मनुस्मृति की सबसे बड़ी समस्या है—यह मनुष्य की स्वतंत्र बुद्धि नहीं, बल्कि अंध-श्रद्धा और अधिकारवादी ज्ञान-व्यवस्था को आधार बनाती है।
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श्लोक 2
भगवन्सर्ववर्णानामन्तरप्रभवाणां च।
धर्मान्नो वक्तुमर्हसि॥ २॥
अर्थ: हे भगवन! सभी वर्णों और संकीर्ण जातियों के धर्म हमें बताइए।
आलोचना:
यहीं से मनुस्मृति का असली एजेंडा सामने आ जाता है। प्रश्न मानवता, समानता या न्याय का नहीं है; प्रश्न है—किस वर्ण और किस जाति का धर्म क्या होगा। यानी जन्म के आधार पर मनुष्य का कर्तव्य पहले से तय कर देना। यही विचार आगे चलकर जाति-व्यवस्था, ऊंच-नीच, अस्पृश्यता और सामाजिक गुलामी का वैचारिक हथियार बनता है।
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श्लोक 3
त्वमेको ह्यस्य सर्वस्य विधानस्य स्वयम्भुवः।
अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य कार्यतत्त्वार्थवित्प्रभो॥ ३॥
अर्थ: हे प्रभो! इस स्वयं उत्पन्न, अचिन्त्य, अप्रमेय ब्रह्म के विधान का तत्त्वार्थ आप ही जानते हैं।
आलोचना:
यहां मनु को लगभग “अंतिम प्राधिकारी” घोषित किया गया है। जब किसी व्यवस्था को “अचिन्त्य” और “अप्रमेय” बता दिया जाता है, तो उसका मतलब होता है—उस पर सवाल मत करो। यही ब्राह्मणवादी ग्रंथों की चाल है: पहले व्यवस्था को ईश्वरीय बताओ, फिर उसे प्रश्नों से ऊपर रख दो। लेकिन जो व्यवस्था मनुष्य को जन्म से ऊंचा-नीचा बनाती है, वह “धर्म” नहीं, अन्याय का शास्त्रीकरण है।
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श्लोक 4
स तैः पृष्टस्तथा सम्यगमितौजा महात्मभिः।
प्रत्युवाचार्च्य तान्सर्वान्महर्षीञ्छ्रूयतामिति॥ ४॥
अर्थ: महर्षियों द्वारा पूछे जाने पर तेजस्वी मनु ने कहा—सुनो।
आलोचना:
यहां पूरा दृश्य ऐसा रचा गया है कि मनु बोलेंगे और बाकी सब सुनेंगे। कोई बहस नहीं, कोई प्रतिप्रश्न नहीं, कोई सामाजिक अनुभव नहीं। यानी सत्ता एकतरफा है। मनुस्मृति ज्ञान नहीं, तानाशाही थोपती है।
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श्लोक 5
आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः॥ ५॥
अर्थ: आरंभ में यह जगत अंधकारमय, अज्ञात, लक्षणहीन, तर्क से परे और सोया हुआ था।
आलोचना:
यहां सृष्टि की शुरुआत को तर्क और प्रमाण से नहीं, गपोड़ से समझाया गया है। “अप्रतर्क्यम्” यानी जिसे तर्क से न जाना जा सके। यही समस्या है—जहां तर्क खत्म होता है, वहां अंधविश्वास शुरू होता है। अगर समाज की व्यवस्था भी इसी “अप्रतर्क्य” आधार पर बनाई जाएगी, तो फिर न्याय, समानता और मानवाधिकार की कोई जगह नहीं बचेगी।
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श्लोक 6
ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम्।
महाभूतादि वृत्तौजाः प्रादुरासीत् तमोनुदः॥ ६॥
अर्थ: फिर स्वयंभू भगवान प्रकट हुए और अंधकार को दूर किया।
आलोचना:
यहां सत्ता का स्रोत फिर “स्वयंभू भगवान” बना दिया गया। आगे चलकर इसी ईश्वरीय आधार पर वर्ण-व्यवस्था को प्राकृतिक और धार्मिक बताया जाता है। सवाल यह है—अगर सबका निर्माता एक है, तो मनुष्य जन्म से ऊंचा-नीचा कैसे हो गया? अगर ईश्वर सबका है, तो किसी को ब्राह्मण, किसी को शूद्र, किसी को सेवक और किसी को शासक बनाने का अधिकार किसने दिया?
निष्कर्ष
मनुस्मृति की शुरुआत ही साफ कर देती है कि यह ग्रंथ मानव-समानता का ग्रंथ नहीं है, बल्कि वर्ण और जाति आधारित समाज को धार्मिक वैधता देने वाला ग्रंथ है। इसमें मनुष्य को मनुष्य नहीं, बल्कि जन्म-आधारित श्रेणियों में बांटने की भूमिका तैयार की जाती है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि अन्याय को सीधे अन्याय नहीं कहा गया, बल्कि उसे “धर्म” कह दिया गया। यही मनुस्मृति की वैचारिक चाल है—
जन्म से बंटवारा करो, उसे ईश्वर की इच्छा बताओ, फिर सवाल करने वालों को अधर्मी घोषित करो।
एक न्यायपूर्ण समाज में धर्म वह होना चाहिए जो मनुष्य को आज़ाद करे, बराबर बनाए और सम्मान दे। लेकिन मनुस्मृति की शुरुआत ही यह संकेत देती है कि उसका लक्ष्य बराबरी नहीं, बल्कि वर्ण-व्यवस्था को स्थायी बनाना है।
सवाल सीधा है:
जो ग्रंथ मनुष्य के जन्म से उसका धर्म तय करता है, क्या वह मानवता का ग्रंथ हो सकता है?
जो व्यवस्था तर्क से ऊपर बताई जाती है, क्या वह न्यायसंगत हो सकती है?
#Manusmriti
मंदिरों के अंदर रहने वाले जब पाप से मुक्त नहीं हुए, ना ही उनकी भावनाये पवित्र हुई। बल्कि उनका लालच, मोह, माया के प्रति आकर्षण निम्नतम स्तर तक बढ़ गया। ईश्वर ने उनके अंदर कोई सदबुद्धि विकसित नहीं की, यहाँ तक की ईश्वर के इतने नज़दीक रहते हुए भी उनको जरा सा भी दैवीय भय या शर्म का अनुभव नहीं हुआ। ये ईश्वर के अस्तित्व और मंदिर की उपयोगिता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।
इससे स्पष्ट होता है, मंदिर का मनुष्य के नैतिक मूल्यों को विकसित करने में कोई भी योगदान और प्रभाव नहीं होता। और मंदिर में कोई भगवान होता है ये भी सोचने लायक है।
रामपुर में दलित किशोरी के साथ रेप।
मुक्तसर, पंजाब में दलितों को रस्सी से बांधकर पीटा गया।
कुरुक्षेत्र, हरियाणा में दलित बच्ची के साथ रेप।
हांसी, हरियाणा में दलित को रस्सी से बांधकर पीटा गया।
देवरिया में दलित बच्ची को रस्सी से बांधकर पीटा गया।
ये सब इसी महीने में घटित जातीय आतंक की कुछ घटनाएं हैं, लेकिन इन सभी मामलों में दलित समुदाय के किसी भी नेता ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी। समाज के अधिकांश नेताओं को लगता है कि ये सब दलित हैं, हमें छोड़कर कहां जाएंगे? इसी भ्रम में मदमस्त होकर वे दिन-रात अन्य समुदायों के मामले उठाते रहते हैं। उन्हें उम्मीद होती है कि इससे उस समाज के लोग उनकी तारीफ करेंगे और वे धन्य हो जाएंगे। इसी को हीन भावना कहते हैं। अफसोस, दलित समुदाय के अनेक नेता इस हीन भावना से भयंकर रूप से ग्रसित हैं।
मुझसे जितना हो सकता है, मैं रात-दिन एक करके समाज के न्याय की आवाज उठाता रहता हूं। अपराधी किसी भी समाज से हों, हम उसकी परवाह नहीं करते। बिना किसी एजेंडे से ग्रसित हुए समाज की आवाज उठाते हैं। इसी कारण हर समाज के जातिवादी लोग हमें गालियां और धमकियां भी देते रहते हैं। अफसोस की बात यह है कि तमाम दलितों को भी बुरा लगता है कि उनके बहुजन फ्रेमवर्क वाले फलां-ढेकां जाति के अपराधियों के खिलाफ क्यों लिखते हैं। उन्हें लगता है कि इससे उनकी बहुजन एकता टूट जाती है। बस इसी हीन भावना और भ्रम में समाज घिरा हुआ है। न तो जाग रहा है और न ही समाज के नेता।
मीडिया में आरक्षण बहुत जरूरी है ! - : राजकुमार भाटी जी🔥🔥🔥
राजकुमार भाटी जी साधारण परिवार से निकले, सच्चे संघर्षशील और बहुजन हितों के निडर आवाज़ हैं।
वे ऊंची-ऊंची बातें नहीं करते, बल्कि ज़मीन की हकीकत को साधारण भाषा में रख देते हैं।
बहुजन समाज को ऐसे ही सच्चे, निडर और समर्पित नेताओं की ज़रूरत है जो जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ें पिछड़ों-दलितों-किसानों-युवाओं की आवाज़ बनें और सत्ता के गलियारों में भी आम आदमी की बात रख सकें।
राजकुमार भाटी जैसे नेता बहुजन आंदोलन की रीढ़ हैं। वे न सिर्फ बोलते हैं, बल्कि बहुजन समाज की पीड़ा को अपनी आवाज़ बनाते हैं।
बहुजन एकता ज़िंदाबाद!"
वामन मेश्राम जितना अपशब्द ब्राम्हणों को बोलते हैँ,
उसके मुकाबले तो राजकुमार भाटी ने 1 फीसदी भी नहीं कहा,
लेकिन उसके बाद भी सब ब्राम्हण भाटी साहब के पीछे पड़ गए,
क्योंकि वो सज्जन आदमी हैँ, बेचारे माफ़ी भी बिना गलती के मांग लिए,
लेकिन कोई भी ब्राम्हण इतना गाली गलौच करने वाले वामन मेश्राम को चुनौती नहीं देगा
क्योंकि वो सब जानते हैँ
वामन मेश्राम के पीछे उनका पूरा समाज ढाल बनकर खड़ा हो जाएगा,
@CivicConscious_ श्लोको में क्या लिखा है उसे छोड़ो बस यह बताओ अगर बाकी हिंदू मनुस्मृति के नियमों से चले तो उन्हें क्या हासिल होगा..?
समानता..?
पक्षपात..?
या
उच्च नीच... का भेदभाव..??
@NkNandanLive अनिल मिश्रा को पता है,, गुर्जरों ने पिछले 200 साल में दो ही सपने देखे हैं, पहला जमीनों के लिए ट्रैक्टर लेने का और दूसरा जमीन बेचकर THAR लेने का । 🤣
एक महिला प्रसव पीड़ा से परेशान थी डॉक्टर ने उसकी डिलीवरी कर दी, महिला ने डॉक्टर पर ग़लत तरीके से छूने का आरोप लगा दिया
अब डॉक्टर कह रहा है मैंने आपकी डिलीवरी के लिए ऐसा किया लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं है
बस ऐसा ही कुछ राजकुमार भाटी के साथ हो रहा है, भाटी जी समाज में व्याप्त गंदी कहावत को हटाने की बात कर रहे थे समाज ने उनपर ही आरोप लगा दिया