देखिए, नई उद्दंडता, उच्छृंखलता और सनक से संसद के सत्र को पूरी तरह अव्यवस्थित करने के बाद, सत्र के तुरंत बाद कांग्रेस के औपचारिक मंच से राहुल गांधी ने जिस असभ्य और निंदनीय भाषा का प्रयोग किया है, वह दर्शाता है कि शायद अब कुंठा में राहुल गांधी सभी पराकाष्ठाओं को पार करते चले जा रहे हैं।
प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी के प्रति प्रयोग किए गए शब्द बताते हैं कि पहले संसद का सत्र और उसके बाद कांग्रेस का मंच, अब कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी देश के स्वस्थ लोकतंत्र के लिए भी चुनौती बनते जा रहे हैं।
कल का दृश्य भी इस मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये दो लोग गले मिल रहे थे एक, वो संदीप दीक्षित, जिन्होंने कहा था कि भारत के सेना अध्यक्ष ‘सड़क छाप गुंडा’ हैं, और दूसरे राहुल गांधी, जिन्होंने जेएनयू जाकर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह’ कहने वाले लोगों का समर्थन किया था।
देश की जनता को समझना चाहिए कि भारत के सेना अध्यक्ष को ‘सड़क छाप गुंडा’ कहने वाला और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह’ कहने वालों का समर्थन करने वाला, मिलकर मां भारती के उस सपूत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के लिए इतनी अभद्र गालियां बक रहे हैं कि अब देश को भली-भांति समझना चाहिए कि कौन देशहित की बात कर रहा है और कौन एक गहरे षड्यंत्र का हिस्सा बन रहा है।
इस देश को यह तय करना है कि जो कुछ राहुल गांधी ने किया है, यह किसी कुंठित, विक्षिप्त और मोदी जी के प्रति ईर्ष्या से भरे हुए पक्की दाढ़ी वाले चिर व्याकुल नौजवान की बचकानी हरकत है या सीमा पार के तारों से जुड़े हुए किसी व्यवस्थित षड्यंत्र के माध्यम बने हुए किसी व्यक्ति की शैतानी हरकत है।
इंदिरा गांधी फिदेल कास्त्रो को गले लगा रही है
भला बताइए यह गले लगाने वाली कोई विदेश नीति होती है :- राहुल गांधी
और हां आज जैसा अश्लील चुटकुला राहुल गांधी ने और संदीप दीक्षित ने मंच से जॉर्जिया मेंलोनी के लिए बोला अगर उसी तरह का अश्लील चुटकुला क्यूबा में इंदिरा गांधी के लिए बोला जाता तो कांग्रेस को कैसा लगता ???
शर्म कर ले राहुल शर्म कर ले
राहुल गांधी की भाषा और राजनीतिक आचरण का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है। देश के प्रधानमंत्री और इटली की राष्ट्राध्यक्ष जैसी संवैधानिक एवं सम्मानित शख्सियतों के लिए जिस तरह की आपत्तिजनक और अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया गया है, वह किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक और राजनीतिक संस्कृति के लिए शर्मनाक है।
राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन अशोभनीय भाषा, व्यक्तिगत टिप्पणी और संवैधानिक पदों का अपमान राजनीति नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कारों के पतन का प्रमाण है।
यह भारत की महान लोकतांत्रिक परंपरा की भाषा नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति पर सीधा प्रहार है, जिसने हमेशा असहमति के बावजूद मर्यादा और सम्मान को सर्वोच्च स्थान दिया है।
देश की जनता सब देख रही है, शब्द भी, संस्कार भी और सोच भी। यही कारण है कि जनता ने बार-बार राहुल गांधी की राजनीति को नकारा है और आगे भी उनके अहंकार, अमर्यादित भाषा और नकारात्मक राजनीति को करारा जवाब देती रहेगी।