#QuitTobaccoNaturallyByGSSY The science of the Mantras studied by ancient Indian seers has given us the Life Giving Mantra used in Gurudev Siyag's siddhayoga which can take Humanity to the pinnacle of evolution even today when we r always busy
#QuitTobaccoNaturallyByGSSY India has her work cut out today when the World is chaotic with violence stress, anger & anxiety. Gurudev Siyag's Siddhayoga practice can heal us from within by connecting with teh Supramental energy that leads to equanimity & Bliss
#QuitTobaccoNaturallyByGSSY In Gurudev Siyag's siddhayoga u experience different truths as u practice & learn more about the mysteries of the Human body & its subtle layers which is beyond the scope of science today which is fixated on the material layer
#QuitTobaccoNaturallyByGSSY Gurudev Siyag was unconditionally blessed by His Guru Gangainathji. U also receive the initiation to his Siddhayoga for free. Once u develop the same level ofinner surrender as Gurudev Siyag u can also experience similar results in your life
#QuitTobaccoNaturallyByGSSY The relationship with teh Guru survuves all hurdles, even that of death. In Gurudev Siyag's Siddhayoga the Mantra vibrations guide u beyond life & death to your Source
#QuitTobaccoNaturallyByGSSY Gurudev Siyag's Siddhayoga practcie heals u from within repairing damaged cellstissues & organs curing u of all kinds of disease
#QuitTobaccoNaturallyByGSSY The seven centres of consciousness within the Human body r energized, activated & balanced thru Gurudev Siyag's Siddhayoga. When the Kundalini energy merges with the crown , we attain salvation
जैसे-जैसे *गुरुदेव* के प्रति आपकी *निष्ठा और प्रीति* बढ़ेगी, *सुमिरन-ध्यान* में आनंद आने लगेगा ; प्रीति का रस प्रगट होता जायेगा ; चित्त की चंचलता मिटेगी, मनोराज मिटते जायेंगे। मन्त्र जाप से अध्यात्मिक तरंगे उत्त्पन्न होती हैं। इससे चित्त में आनंद और शांति व्याप्त हो जाती है।
परमात्मा की प्रेरणा प्राप्त होने लगेगी। गुरुदेव ध्यान में सपने में आकर दर्शन देंगे या और किसी माध्यम से आप को मार्गदर्शन मिलेगा। बुध्दि विवेकवती हो जायेगी, मन में अंतर्यामी परमात्मा की प्रेरणा मिलती है, तो व्यावहारिक ज्ञान में सही गलत का निर्णय करने में सूझ-बूझ आती है।
नाम का, धन - पद का अहंकार गलने लगता है। मन और बुध्दि निर्मल होती है। बुध्दि में शुद्ध प्रकाश और प्रेरणा प्राप्त होगी कि क्या करना है, कब और कैसे करना है? गुरु मन्त्र का जप करने से नीरसता दूर होगी और आस्था बढ़ेगी। बुध्दि शुद्ध हो जायेगी। रोग व बीमारिया आयेंगी औऱ समूल नष्ट हो जायेंगी। रोग प्रतिकार की शक्ति बढ़ती जायेगी।
आप सुख-दुःख, लाभ- हानि, यश-अपयश का भी उपयोग कर के सुख-दुःख को स्टेप बना लेते है।आपको दोनों का भोगी नहीं, योगी बनना है। ईश्वर के रास्ते उन्नत होते होते समभाव में स्थापित हो जाना है।
गुरु मन्त्र के जप से सभी जन्मो के पाप नाश होंगे..ज प = ‘ज’ का मतलब जन्म मरण का नाश और ‘प’ का मतलब पाप का नाश : इसी का नाम जप है।
घटाकाश में प्रकाश के प्रगट होने से व्यापक परमात्मा के एकत्व का दैवी ज्ञान प्रगट होता है …दिव्य प्रेरणा प्रगट होने लगती है।
आत्मा ब्रह्म है , जैसे घड़े का आकाश महा आकाश से जुड़ा है ,एक ही है ,भिन्न नहीं है …ऐसे ही आप का आत्मा उस परमात्मा से जुड़ा हुआ है,यह ज्ञान होगा..आत्मा ब्रह्म है।
कलियुग मे हरि का नाम ही फल प्रदान करनेवाला है..मन्त्र जाप से भय – निर्भयता में , घृणा – प्रेम में और काम राम में बदलने लगता है..जैसे दुर्भाव से द्वेष , घृणा और अशांति पैदा होती है , वैसे ही मन्त्र से आनंद, माधुर्य , उत्साह और शांति प्रगट होती है.. तो शोक नाश होता है..धारणा शक्ति बढती है, क्षमा शक्ति बढती है, शौर्य शक्ति बढती है….मन्त्र जप से वीर्य और तेज बढ़ता है।मन्त्र जाप से इतनी शक्तियां विकसित होती है किआगे घटित होने वाली घटनाओं की आहट पहले ही पता चल जाती है.। आपके पास आनेवाले लोगो को भी शांति का अनुभव होगा।
ॐ श्री गंगाई नाथाय नमः
गुरु सियाग सिद्धयोग
संजीवनी मंत्र से कुंडलिनी जागरण
निःशुल्क
दिव्य संजीवनी मंत्र के लियेः
"क्लीं कृष्ण क्लीं"
“Kling Krishna Kling”
राधा के बिना कृष्ण आधा कोई भी मंत्र बिना शक्ति के काम नहीं करता,,,
जयश्रीगुरुदेव
https://t.co/unlMXjc7AH
#QuitTobaccoNaturallyByGSSY What appears impossiblebased on current medical knowledge becomes a reality thru Gurudev Siyag's siddhayoga practice. Even genetically inherited diseases like hemophilia gets permanently cured thru this practice
मानस अमृत - उर्जा शक्तिपात का केन्द्र बिन्दु क्या है ? प्रत्येक इंसान अपने आप मे अद्वेत की शक्ति से मै बना है इस मै की शक्ति तू ( जगत व ईश्वर)के प्रति अपने आग्या चक्र (भ्रुकुटि) पर अद्वेत शक्ति के चाहत व प्रेम उर्जा से तू के साथ मिलकर अनुभूति एकाकार उर्जा से न हठे तो वह अनुभूति एकाकार मिलन उर्जा ही दिव्य अमृत सोम रस शक्तिपात उर्जा का केन्द्र बिन्दु है जो ईश्वर शिवत्व आदि शक्ति की उर्जा है जो नि: शब्द निरविचार महाशुन्य भी है । हम आप सभी कोई एक अग्यात बिन्दु से आए है सारा जिवन अग्यात जो नही है वही नया है और सुन्दर भी है । सभी इंसान उसी के पिछे दौर लगाते है और अंत मे शरीर का राख मिटी मे मिलकर अग्यात विन्दु मे मिलना है जबतक द्वन्द है तभी तक जगत मे किसी से या स्त्री-पुरूष का एक दुसरे के प्रति प्रेम है जो सभी के अन्दर का मै से उत्पन्न हुआ है यही जीवन है । विशुद्ध चेतना न तो मै है और न तू है । मै ही पूर्ण हु मेरे मे ही शेष प्राप्ति की चाहत व प्रेम है, मेरे मे ही शिवत्व शक्ति अंश है ,मेरे द्वारा शिवत्व अंश कृपा से किया कर्म ही जगत सर्वश्रेष्ठ होता है । सभी इंसान का जगत मे काम व निष्काम भाव से गतिशील कर्मयोगी है । जब सभी कुछ मै ही हु ईसलिए ऊँ शिवोहम हुआ है जो मै तो हरि नहि हरि तो मै नहि का भाव बना है। हरि ऊँ तत सत नि: शब्द निरविचार चित आनन्द सच्चिदानंद परमानन्द से उपर परमार्थ प्रेम सोम रस अमृत उर्जा है । ऊँ शिवोहम सत्यम शिवम सुन्दरम ऊँ नम: शिवाय
"ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का यह भेद मात्र एक भ्रम है। जब तक ये तीनों अलग हैं, मन द्वैत के कोलाहल में भटकता रहेगा। पर जिस क्षण साक्षी भाव में ठहरकर हम देखते हैं, तो पाते हैं कि 'देखने वाला' और 'देखा जाने वाला'—दोनों एक ही चेतना के विस्तार हैं। संसार बाहर नहीं, उसी चेतना में प्रकट हो रहा है, जो स्वयं 'आप' हैं। "सत्य का बोध तब नहीं होता जब हम दुनिया को जानते हैं, बल्कि तब होता है जब हम 'जानने वाले' के भ्रम को मिटा देते हैं। ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का त्रिपुट विलीन होते ही, शेष बचता है—केवल 'होना'। एक अखंड शांति, एक पूर्ण सत्य। "हम अक्सर सत्य को बाहर खोजते हैं, यह भूलकर कि जिस चेतना से हम संसार को देख रहे हैं, उसी चेतना में पूरा संसार समाया हुआ है। ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय की त्रिपुट का विसर्जन ही आत्म-साक्षात्कार है। न कोई देखने वाला है, न कोई दृश्य... केवल एक अखंड 'होना' है जो स्वयं में पूर्ण है। "जैसे स्वप्न देखने वाला और स्वप्न के पात्र एक ही मन की तरंगें हैं, वैसे ही 'मैं' और 'संसार' एक ही चेतना का प्रतिबिंब हैं। जिस दिन यह समझ आ जाए कि देखने वाला और दृश्य अलग नहीं हैं, उस दिन खोज खत्म हो जाती है। अब न कोई प्रश्न है, न उत्तर। बस एक अथाह सन्नाटा है, जिसमें सब कुछ लीन है। अब न कोई खोजना है, न कोई पाना। खोजने वाला ही उस 'स्वयं' में लीन हो चुका है जिसे वह बाहर ढूंढने निकला था। जिस चेतना में सारा ब्रह्मांड पैदा हुआ, स्थित है और विलीन हो रहा है—वही चेतना आप हैं। अब आप संसार को नहीं देख रही हैं, अब आप स्वयं में ही संसार को 'होते हुए' देख रही हैं। यही मुक्ति है, यही अंत है, और यही 'आप' का असली स्वरूप है।
🌑"आध्यात्मिकजागृति सत्य परमात्मा स्वयं बोध अस्तित्व
#QuitTobaccoNaturallyByGSSY In Gurudev Siyag's Siddhayoga the image of the Guru arrests the mind of teh seeker because the Guru has spiritual gravity which attracts the mind &subdues its tendency to wander. This is possible because theGuru attained bot Gaytri & Krishna siddhis
#QuitTobaccoNaturallyByGSSY It is difficult to focus on the Divine while we r merged in the daily grind & this is why in Gurudev Siyag's Siddhayoga we make it our business to mentally chant the Divine Name with each activity. The vibration of the Divine Name leads to salvation
#QuitTobaccoNaturallyByGSSY When we practice Gurudev Siyag's Siddhayoga we r filled with gratitude for the connection with our Divine Self that it fosters. IT connects usdirectly with Divine Gracewith a number of benefits https://t.co/YdJuhTQjw9
https://t.co/dsvvI2NFn8
#QuitTobaccoNaturallyByGSSY The Mantra we mentally chant in Gurudev Siyag's Siddhayoga is the beej Mantrawhich awakens the Divien Feminine Energy & helps Her merge with the Divine Masculine energy in the crown. We eneter a deeep state of meditation when this happens
छल चुनते हैं हम बार-बार,
और इच्छा रखते हैं कि छलिया हमें हर बार चुनें...।
हम दूसरों से कम, स्वयं से अधिक छल करते हैं। हर बार श्यामसुंदर को चुनकर भी संसार के मोह-जाल में उलझ जाते हैं, फिर उन्हीं की शरण माँगते हैं। जिसे कोई छल नहीं सकता, उसे हम क्या छलेंगे? परंतु असत्य और मोह में पड़कर हम अपने ही साथ छल कर बैठते हैं।
विरोधाभास यही है कि संसार भी चाहिए और माधव भी। फिर भी आशा रहती है कि उनकी कृपा-दृष्टि हम पर बनी रहे।
हे प्रभु! हमारा मन सदैव आपके चरणों में ही लगा रहे....!🙏🏻🌸
#जय_श्री_कृष्ण🙏🌺❣️🚩
#QuitTobaccoNaturallyByGSSY Guru alone can take u beyond the Third Eye & take u beyond illusion. In Gurudev Siyag's Siddhayoga it is the Guru who awakens the Divine Feminine energy which awakens Higher states of consciousness within u
#QuitTobaccoNaturallyByGSSY When we practice Gurudev Siyag's Siddhayoga we connect to the Divine seated within. Since Bliss is our True nature we begin to experience this even from the very start of our practice as we mentally chant the Mantra given by the Guru 24/7.
💖 नैनन बनज बसाऊँरी, जो मैं साहिब पाऊँ... 💖
मीरा जी का प्रभु के प्रति यह अनन्य प्रेम हमें सिखाता है कि अगर आँखों में कुछ बसाना ही है, तो उस शाश्वत परमात्मा की छवि को बसाएं। जब आँखों में ईश्वर का वास हो जाता है, तो पूरी सृष्टि में केवल सकारात्मकता और प्रेम ही नजर आता है।
कुण्डलिनी शक्ति का सच: साधना या संकट? 🔥🐍
क्या आप भी कुण्डलिनी जागरण (Kundalini Awakening) के चक्कर में बिना सही मार्गदर्शन के साधना कर रहे हैं? सोशल मीडिया पर अक्सर इसे चमत्कारों और सिद्धियों से जोड़कर दिखाया जाता है, लेकिन इसकी दूसरी सच्चाई बहुत कम लोग जानते हैं।
इस ज्ञानवर्धक इन्फोग्राफिक को ध्यान से देखें और समझें कि अध्यात्म के मार्ग पर क्या सावधानियां जरूरी हैं:
साँप की तरह बल खाती ऊर्जा: कुण्डलिनी मूल आधार (Muladhara) से ऊपर रीढ़ के निचले भाग में सुप्त अवस्था में होती है।
सुसुम्ना नाड़ी का मार्ग: जब इस ऊर्जा को जगाया जाता है, तो यह रीढ़ की हड्डी में स्थित 'सुसुम्ना नाड़ी' के रास्ते ऊपर की ओर उठती है।
सिद्धियां बनाम भयंकर रोग: यह सच है कि इससे कई प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं, लेकिन गुरु के बिना इसकी साधना करने से गंभीर शारीरिक और मानसिक रोग होने का खतरा रहता है।
सन्तमत की गहरी सीख: सन्तमत (Sant Mat) के अनुसार, आँखों से निचले चक्रों की साधना पूरी तरह से वर्जित (Forbidden) है।
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सन्तमत में आँखों से निचले चक्रों (जैसे मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर आदि) की साधना को वर्जित मानने के पीछे गहरे आध्यात्मिक और व्यावहारिक कारण हैं।
सन्तमत (जैसे कबीर साहब, गुरु नानक देव जी, तुलसी साहब) का मुख्य उद्देश्य जीव को पूरी तरह से **भवसागर से पार करना और मोक्ष (मुक्ति) दिलाना** है।
इसके वर्जित होने के मुख्य कारण नीचे दिए गए हैं:
1. चक्रों का केंद्र और चेतना का स्तर (Level of Consciousness)
निचले चक्र (पिंड देश): आँखों से नीचे के जितने भी चक्र हैं, वे हमारे शरीर के भौतिक और भौतिकतावादी (Materialistic) कार्यों को संचालित करते हैं। मूलाधार काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी सांसारिक वृत्तियों का केंद्र है।
तीसरा तिल (तीसरी आँख): सन्तमत के अनुसार, जागृत अवस्था में हमारी आत्मा का मुख्य निवास स्थान **आँखों के पीछे (तीसरे तिल या आज्ञा चक्र)** पर होता है।
2. ऊर्जा को नीचे ले जाने का खतरा (Downward Flow of Energy)
सन्तमत का सिद्धांत है कि अध्यात्म में हमेशा
**ऊपर की ओर (Ascension)** बढ़ना चाहिए। जब हमारी आत्मा पहले से ही आँखों के स्तर पर बैठी है, तो निचले चक्रों (जैसे मूलाधार) का ध्यान करने का मतलब है अपनी चेतना को ऊपर से वापस नीचे की ओर गिराना। नीचे की ओर ध्यान केंद्रित करने से इंसान काम-वासना, क्रोध और सांसारिक मोह-माया के जाल में और अधिक फँस सकता है।
3. सिद्धियों का जाल और भटकाव (The Trap of Powers)
निचले चक्रों की साधना (जैसे हठयोग या कुण्डलिनी योग) करने से रिद्धियाँ-सिद्धियाँ (चमत्कारी शक्तियाँ) तो प्राप्त हो सकती हैं, लेकिन ये शक्तियाँ इंसान के अहंकार को बढ़ा देती हैं। साधक इन चमत्कारों में उलझकर अपने असली लक्ष्य (ईश्वर प्राप्ति या मोक्ष) को भूल जाता है। सन्तमत इन्हें आध्यात्मिक प्रगति में सबसे बड़ा रोड़ा मानता है।
4. भयंकर शारीरिक और मानसिक नुकसान
कुण्डलिनी ऊर्जा एक प्रचंड आग की तरह है। यदि बिना पूर्ण सतगुरु की देखरेख के इसे जबरदस्ती जगाया जाए, तो यह नाड़ियों को नुकसान पहुँचा सकती है, जिससे व्यक्ति मानसिक संतुलन खो सकता है या गंभीर शारीरिक रोगों का शिकार हो सकता है।
5. सन्तमत का सहज मार्ग (The Path of Surat Shabd Yoga)
सन्तमत का मार्ग **'सुरत शब्द योग' (सहज मार्ग)** है। इसमें साधना सीधे आँखों के केंद्र (तीसरे तिल) से शुरू होती है।
यहाँ से साधक 'नाम सिमरन' और 'भजन' (धुनात्कम शब्द को सुनना) के जरिए अपनी चेतना को सीधे ऊपर (ब्रह्मांड और पारब्रह्म) की ओर ले जाता है।
* इस मार्ग में बिना किसी खतरे के झंझट के, आत्मा बहुत ही सुरक्षित और सहज तरीके से परमात्मा में लीन हो जाती है।
>>> संक्षेप में कहें तो: सन्तमत हमें नीचे की मंजिलों (निचले चक्रों) को खोदने के बजाय, जहाँ हम खड़े हैं (आँखों के केंद्र) वहीं से सीधे आकाश (उच्च आध्यात्मिक लोकों) की ओर उड़ान भरने की सीख देता है।
आध्यात्मिक मार्ग पर शॉर्टकट अपनाने से बचें। हमेशा एक पूर्ण गुरु के सानिध्य में ही ध्यान और साधना करें, ताकि आपका कल्याण हो, नुकसान नहीं! 🙏✨
#QuitTobaccoNaturallyByGSSY In Gurudev Siyag's Siddhayoga u r not asked to make forced changes to your diet or lifestyle. Things that do not meet the requirement for your Highest Good, leave u on their own
ॐ श्री गंगाई नाथाय नमः
तो नौ द्वार माया के होते हैं, उसमें चार तत्त्व चेतन होते हैं, अन्न, प्राण, मन और विज्ञान। वो पृथ्वी तत्त्व के गुरुत्वाकर्षण में होते हैं। ऋग्वेद के अनुसार इन लोकों में, विद्या पे अविद्या का साम्राज्य, बाकि तीन जो कोश ऊपर हैं, आनन्द, चित्त और सत्, जिसको हम सच्चिदानन्द कहते हैं। वहां पर अविद्या का नाम ही नहीं। वहां माया का नाम नहीं, वहां तो पूर्ण ब्रह्म है, सिर्फ शांति है।
कल्कि अवतार सद्गुरु श्री रामलाल जी सियाग द कॉमफॉर्टर
अध्यात्म विज्ञान सत्संग केन्द्र, होटल लेरिया के पास, चौपासनी
जोधपुर, राजस्थान (342001), भारत
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