Independent Researcher | AI Systems & Governance | Temporal Integrity
I publish independent research on AI systems, time, and truth enforcement.
OSF profile: https://t.co/JKWyjtJAXZ
Recent papers:
• Temporal Integrity in Language Models
• Bounded Time & Contextual Intelligence
Shipped our WASM Evaluation Engine for @Telegraphprotoc Track 2! 🦀⚡
Achieved 100% benchmark concordance & registered on Base Sepolia (#1036) for CHAT_COMPLETION.
Check out the code & benchmarks 👇
https://t.co/JNg88mc7ej
#TelegraphHackathon#WebAssembly
"Building a high-precision, deterministic WASM scoring engine for @Telegraphprotoc validators! 🚀
Proud to share our projec100% full-order benchmark accuracy and zero WASM traps on edge-case fuzz testing.
Repo: https://t.co/JNg88mc7ej #TelegraphHackathon#AI#WebAssembly#Crypto"
अफसरों ने अपने फोन पब्लिक रिलेशन ऑफिसर (PRO) या स्टेनो को दे रखे हैं। यही लोग तय करते हैं कि आपकी बात अफसर से होगी या नहीं। नियम है कि DM-SSP सरकारी नंबर अनिवार्य रूप से अपने पास रखेंगे। लोगों की कॉल खुद उठाएंगे।
लोगों की समस्याओं का तेजी से समाधान हो, इसके लिए सरकार इन नंबरों पर करोड़ों रुपए खर्च करती है। सिर्फ पुलिस विभाग के सरकारी नंबरों के रिचार्ज पर सालभर में 9 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। लेकिन, अधिकारी हैं कि लोगों की समस्याएं फोन पर सुनना ही नहीं चाहते।
इसकी शिकायत समय-समय पर सांसद-विधायक मुख्यमंत्री से करते रहे हैं। तो क्या वाकई में अफसर सरकारी नंबर नहीं उठाते? इसकी पड़ताल करने के लिए दैनिक भास्कर ने 75 जिलों के जिलाधिकारी और पुलिस कप्तानों को फोन किया। एक बार नहीं बल्कि तीन बार किया गया।
सिर्फ तीन DM ने खुद फोन उठाया। SSP की स्थिति तो और खराब, किसी ने फोन ही नहीं उठाया। पूरी रिपोर्ट: https://t.co/N03UGyrxGV
@gradecricketer Australia's lost is financially and specially morally better than a dead victory, it brings more and more money to the nation of Australia 🌏
@cemnahit If you are building copy of any current available system than okay, but than think about it, you are dealing in commodity in this new Agentic AI Era. That's labour not expertise.
जब price hike से बचने की membership भी उसी company से खरीदनी पड़े… 😂📱
आज का recharge price lock कर लिया,
कल का price hike किसका decision होगा — यही तो मज़ेदार सवाल है। 😄
JOKER — One smile. Many questions.
#jio#jioprime
हृदय से- धीरे-धीरे सरकार से सवाल पूछने वाले हर व्यक्ति पर कोई न कोई ठप्पा लगाया जा रहा है।कभी "Cockroach", तो कभी "दिमागी नक्सल"।
अगर कोई छात्र कहता है- मैंने चार साल पढ़ाई की है, मेरा पेपर लीक मत होने दो।परीक्षा समय पर कराओ।परीक्षा करा दी, तो रिजल्ट समय पर दो।रिजल्ट दे दिया, तो नियुक्ति के लिए सालों मत घुमाओ।सरकारी नौकरी की सीटें बेची किसने?पेपर लीक करने वाले कौन हैं?सॉल्वर गैंग को संरक्षण किसने दिया?परीक्षा एजेंसी चुनते समय जवाबदेही किसकी थी?मेरी उम्र भर्ती के इंतज़ार में निकल गई, मेरी गलती क्या थी?फॉर्म की फीस मैंने दी।तैयारी मैंने की।सेंटर तक जाने का किराया मैंने दिया।पेपर मैंने दिया।फिर सिस्टम की गलती की सज़ा भी मैं ही क्यों भुगतूँ? - क्या यह दिमागी नक्सल होना है|
अगर कोई बच्चा पूछता है- मेरे सरकारी स्कूल की छत जर्जर क्यों है?मैं इसी छत के नीचे बैठकर क्यों पढ़ूँ? पढ़ने आया हूँ, जान जोखिम में डालने नहीं।स्कूल में शिक्षक क्यों नहीं हैं?एक शिक्षक के भरोसे पूरा स्कूल क्यों चल रहा है? सरकारी स्कूल बंद क्यों हो रहे हैं? गरीब परिवार निजी स्कूलों की महँगी फीस भरने को मजबूर क्यों हो रहा है?- क्या ये सवाल दिमागी नक्सलवाद है?
कोई मरीज पूछे- सरकारी अस्पताल में डॉक्टर क्यों नहीं हैं? दवाइयाँ बाहर से क्यों खरीदनी पड़ रही हैं? इलाज इतना महँगा क्यों है कि बीमारी से पहले बिल का डर लगता है? सरकारी अस्पताल पर्याप्त क्यों नहीं हैं? एक सामान्य परिवार इलाज के लिए अपनी जमा-पूँजी क्यों तोड़ने को मजबूर है? क्या वह भी दिमागी नक्सल है?
कोई किसान पूछे- मेरी फसल की लागत बढ़ती जा रही है, लेकिन आमदनी क्यों नहीं बढ़ रही? जिस अनाज को मैं पैदा करता हूँ, उसका दाम तय करने में मेरी आवाज़ कहाँ है? क्या वह भी दिमागी नक्सल है?
कोई नागरिक पूछे- मेरे टैक्स के पैसे से बनी सड़क पहली बारिश में क्यों धँस गई? नया पुल कुछ ही महीनों में कैसे टूट गया? हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी नोएडा एयरपोर्ट थोड़ी-सी बारिश में क्यों डूब गया? क्या वह भी दिमागी नक्सल है?
कोई मध्यमवर्गीय आदमी पूछे- पानी पीने लायक क्यों नहीं है?ह वा साँस लेने लायक क्यों नहीं है? टैक्स मैं भरूँ...महँगी शिक्षा मैं खरीदूँ...महँगा इलाज मैं कराऊँ...टोल भी मैं दूँ...तो बदले में व्यवस्था से जवाबदेही माँगना गलत कैसे हो गया?क्या वह भी दिमागी नक्सल है?
मोदी जी ,नक्सलवाद और सवाल में बहुत बड़ा अंतर है।एक हाथ में बंदूक लेकर संविधान को चुनौती देता है।दूसरा हाथ में संविधान लेकर सरकार से जवाब माँगता है।दोनों को एक तराजू में मत तौलिए।हिंसा लोकतंत्र नहीं है।लेकिन असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है।पत्थर चलाना गलत है।लेकिन सवाल चलना बंद हो जाएँ...तो लोकतंत्र धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।
मैं बच्चों से भी यही कहूँगा-कानून अपने हाथ में मत लेना।लेकिन...अपने अधिकारों के लिए सवाल पूछना कभी बंद मत करना।
पेपर लीक हुआ है-पूछो।भर्ती रुकी है-पूछो।स्कूल जर्जर है-पूछो।अस्पताल बदहाल है-पूछो।सड़क टूटी है—पूछो।भ्रष्टाचार दिख रहा है-पूछो।चंदे और ठेकों का रिश्ता संदिग्ध लगता है-तथ्य माँगो।आपके टैक्स का पैसा बर्बाद हुआ है-हिसाब माँगो।क्योंकि सरकार किसी भी पार्टी की हो...सरकार मालिक नहीं है, सरकार जवाबदेह है।और नागरिक उसका दुश्मन नहीं, इस लोकतंत्र का मालिक है।
मुझे उस युवा से डर नहीं लगता जो सवाल पूछता है।मुझे उस युवा से डर लगता है जिसने सवाल पूछना ही छोड़ दिया है।जिस दिन देश का युवा कहने लगे-"मुझे क्या मतलब?"पेपर बिके-मुझे क्या मतलब।नौकरी बिके-मुझे क्या मतलब।स्कूल गिरे-मुझे क्या मतलब।अस्पताल लूटे-मुझे क्या मतलब।भ्रष्टाचार हो-मुझे क्या मतलब।
उसी दिन देश को चिंता करनी चाहिए।क्योंकि सोया हुआ दिमाग देश की समस्या है।इसलिए शब्दों से मत डराइए।युवाओं के सवालों का जवाब दीजिए।उनके आंदोलन को सुनिए।उनकी पीड़ा समझिए।गलत माँग है, तो देश के सामने बताइए कि गलत क्यों है।सही माँग है, तो उसे पूरा कीजिए।लेकिन सवाल पूछने की संस्कृति को शक की नज़र से मत देखिए।क्योंकि आज जो बच्चा पेपर लीक के खिलाफ आवाज़ उठा रहा है...वह सरकार गिराने नहीं निकला है।वह अपना भविष्य बचाने निकला है।जो शिक्षक स्कूल की टूटी छत दिखा रहा है...वह देश को बदनाम नहीं कर रहा।वह चाहता है कि अगली बारिश से पहले वह छत ठीक हो जाए।जो नागरिक अस्पताल की बदहाली दिखा रहा है...वह भारत के खिलाफ नहीं है।वह भारत को बेहतर देखना चाहता है।और मेरे लिए देशभक्ति का मतलब केवल देश की तारीफ करना नहीं है।जहाँ देश में कमी दिखे...उसे ठीक करवाने के लिए आवाज़ उठाना भी देशभक्ति है।
सवाल लोकतंत्र को ज़िंदा रखते हैं।
The banchmarks were too low that people used to expect Mercy from officers rather than accountability and good governance, We all hope one day every officer can reflect the same views.
🚨 UP Govt Imposed Complete Ban on Analogue Dairy Products Including Paneer, Ghee & Khoya
No Milk And Milk Products Allowed with Refined Oils & Fats, Soybeans, Substances
Many Other States Are Doing The Same
Finally Govt is Catching Up on Food Adulteration
कई गरीब छात्रों की समस्या केवल यह नहीं है कि कोचिंग महंगी है। असल समस्या यह है कि वे अपने जीवन के सबसे उत्पादक 3–5 साल किसी बेहद अनिश्चित परिणाम की तैयारी में लगाने का खर्च नहीं उठा सकते।
आर्थिक रूप से सुरक्षित परिवार का छात्र लगातार तैयारी कर सकता है, बार-बार प्रयास कर सकता है और इंतज़ार कर सकता है। लेकिन जिस छात्र पर परिवार की जिम्मेदारियाँ हैं, उसे शायद बहुत पहले कमाना शुरू करना पड़े। मुफ्त कोचिंग एक खर्च जरूर कम करती है, लेकिन उन वर्षों की opportunity cost (समय और उससे छूट जाने वाले अवसरों की कीमत) खत्म नहीं करती।
बल्कि अगर मुफ्त कोचिंग बार-बार प्रयास करना आसान बना देती है, तो अनजाने में यह कुछ छात्रों को अनंत तैयारी के चक्र में फँसने के लिए प्रोत्साहित भी कर सकती है।
शायद बड़ा नीतिगत सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “कोचिंग को मुफ्त कैसे बनाया जाए?” बल्कि यह होना चाहिए कि “हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि छात्रों को एक परीक्षा के लिए अनिश्चित समय तक अपनी जवानी तैयारी में न बितानी पड़े?”
स्पष्ट प्रयास-सीमा, बेहतर वैकल्पिक करियर के रास्ते, मजबूत कॉलेज और व्यावसायिक शिक्षा के अवसर, तथा गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा—ये कदम समस्या की जड़ को कहीं अधिक प्रभावी ढंग से संबोधित कर सकते हैं।
नाम : अजय सिंह, कांस्टेबल, उत्तरप्रदेश पुलिस
आरोप : गाजियाबाद में पासपोर्ट वेरिफिकेशन के नाम पर 4 हजार की रिश्वत मांगी।
क्या हुआ : अजय नाम के इस व्यक्ति ने वीडियो रिकॉर्ड कर लिया।
स्वतंत्रता दिवस पर रिश्वत के वीडियो बताते हैं कि भारत रिश्वतखोरों का देश बन गया है!
@theskindoctor13 Why do we need coaching after 15 years of school grind? Absolute madness, nothing will change, govt again betting on hope rather than permanent solutions for real opportunities.
With that logic private schools wouldn't have opened in India?
“Free coaching is a must.”
Fair enough… but a curious question: will coaching create more jobs, or just help more students compete for the same limited seats? 😄
If coaching is the solution, what happens to the schools that were supposed to prepare students in the first place? And if the problem is lack of quality education and opportunities, are we fixing the problem—or just making the queue better prepared? 🎭
JOKER — One smile. Many questions.
I think we can expect a more nuanced argument on this from our intellectuals. Education and coaching are not the same thing. Education builds knowledge and capability; coaching primarily prepares students for competition.
Making quality education freely accessible is certainly worth supporting. But if we are talking about free coaching, we should also ask: are we addressing the quality of education, or simply helping students compete for a limited number of seats and jobs?
पहली बात...
आज भी Abhinay Maths की कोई Offline Coaching नहीं है।
और Online Abhinay Maths App के सभी Courses की Fees ₹0 है।तो कम से कम मेरे नाम पर तो कुछ भी Logic मत दीजिए।
दूसरी बात...
अगर मोदी जी Competitive Exams के लिए Free Coaching ला रहे हैं, तो अच्छी बात है। मैं उसका स्वागत करता हूँ।
लेकिन अगर सरकारी स्कूलों की हालत ही ऐसी कर दी जाती कि बच्चों को Coaching की ज़रूरत ही न पड़ती... तो वो उससे भी बड़ा और सही फैसला होता।
और एक बात...
ऐसा भी नहीं है कि कोई Button दबेगा और अगले दिन Free Coaching शुरू हो जाएगी।
Teachers भी लाने होंगे...
Content भी बनाना होगा...
Technology भी चाहिए होगी...
System भी बनाना होगा...और यहीं आकर पूरा सिस्टम जवाब दे देता है|
और सबसे बड़ी बात...
बच्चे किस Teacher को पसंद करेंगे, किससे पढ़ना चाहेंगे... ये सरकार तय नहीं कर सकती। ये बच्चे तय करेंगे।
इसलिए अभी से हवा में खुश होने की ज़रूरत नहीं है।
बाकी, अगर सच में देश के हर बच्चे तक अच्छी और मुफ्त शिक्षा पहुँचाने का मिशन है...
तो मैं आज भी इस मिशन के साथ पूरी तरह हूँ।
एक भी पैसा लिए बिना, Lifetime पढ़ाने के लिए तैयार हूँ|
#schoolThikKaro