"Re-Exam के सरदारों ने चंदे की मचाई लूट।
बंदरबांट के इस खेल में, बन गए तीन गुट॥"
जो कल तक SI 2021 रद्द करवाने के लिए 'एकता' की कसमें खा रहे थे, आज चंदे के पैसे खाकर अब ये 'रिंग मास्टर' एक-दूसरे को ही डसने लगे हैं! जागो छात्रों, तुम्हारी भावनाओं का सौदा हो चुका है।
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राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) में अब अभ्यर्थियों को अपनी भर्ती संबंधी समस्याएँ बताने के लिए मिलेगा सीधा संवाद का अवसर।
आयोग अध्यक्ष लेफ्टिनेंट कर्नल केसरी सिंह राठौड़ की पहल पर अभ्यर्थियों के लिए इंटीग्रेटेड संवाद पोर्टल शुरू करने की योजना है।
हर महीने 2 बार अभ्यर्थियों की समस्याएँ सुनी जाएँगी।
ऑनलाइन आवेदन के जरिए हर 15 दिन में लगभग 30 अभ्यर्थियों का चयन किया जाएगा।
चयनित अभ्यर्थियों को आयोग परिसर में बुलाकर उनकी समस्याएँ सुनी जाएँगी।
समस्याओं के आधार पर आयोग स्तर पर समाधान और उचित कार्रवाई की जाएगी।
शिकायतों की नियमित समीक्षा और समयबद्ध निस्तारण पर विशेष जोर रहेगा।
शिकायत निस्तारण में भी उल्लेखनीय प्रगति
1 जनवरी से 9 अक्टूबर तक आयोग के ग्रीवेंस पोर्टल पर कुल 26,635 शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनमें से 26,426 का निस्तारण किया जा चुका है। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 99.88% शिकायतों का निस्तारण किया गया है।
यह पहल अभ्यर्थियों और आयोग के बीच
#rpsc #RPSC #the_kesari
बहकावे में मत आओ।
SI 2021 का अब कुछ नहीं हो सकती। आगामी RAS व अन्य भर्तियों के लिए पढ़ लो भाईयों समय ज़ाया मत करो।
इस भर्ती के नियम RPSC अनुसार नहीं। ये नियम 'राजस्थान पुलिस अधीनस्थ सेवा नियम, 1989' के तहत आते हैं (रूल 23)।
इन्हें बदलने का अधिकार केवल राज्य सरकार (Cabinet/DoP) के पास है किंतु सुप्रीम कोर्ट के अनुसार केवल परीक्षा के नोटिफिकेशन के पूर्व ही इस अधिकार का उपयोग किया जा सकता हैं।
ऐसा कोई भी फैसला हाईकोर्ट में 2 मिनट भी नहीं टिकेगा! इसलिए सरकार अपने विवेक का प्रयोग करके कोई भी ऐसा फैसला नहीं लेगी।
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#RPSC_का_पुनर्गठन_करो
#si_भर्ती_2021_रद्द_करो
#siexam2021
#SI_भर्ती_21_reexam_फिर_से_हो
@gaanvkibaat भाई अभी तक तो मुझे लग रहा था की सिर्फ 30 से 40 सीट खाली जायेगी। किंतु डिप्टी जेलर के इंटरव्यू का परिणाम देखकर अब लग रहा है अधिक खाली जायेगी। किंतु इस बार विद्रोह इतना अधिक हुआ है कि संभवतः इंटरव्यू में मार्किंग स्कीम हल्की रहेगी।
@smartguy029 ये रिसल्ट जिनका भी हैं उन भाई के साथ बहुत बुरा हुआ। इंटरव्यू पैनल को उनकी written exam और फिजिकल की मेहनत देख कर मार्क्स देने चाहिए थे। यह सरासर नाइंसाफ़ी हैं।
@smartguy029 भाई जी मेरे written में ही 202 के उपर है। यदि किसी को 40 50 दे भी दु तो भी मेरे फर्क नही पड़ेगा। और हाँ ये बात बिल्कुल ठीक है कि मेरा फिजिकल अटक सकता हैं किंतु अगर फिजिकल निकल गया तो इंटरव्यू में मैं RPSC के भचिड़ बुलाने की ताकत रखता हूँ।
🚨 "ले भई, RPSC ने हटा दी 36% की लिमिट!" 🚨
अगर आप भी सोशल मीडिया पर उड़ाई जा रही इन अफवाहों को सच मान रहे हैं, तो कृपया मुंगेरीलाल के हसीन सपनों से बाहर आएं!
खून से खत लिखने वाले फर्जी आशिकों को RPSC का सीधा जवाब:
"खून से चिट्ठी लिखने वाले मेरे महबूब, मैं चाहकर भी तुम्हारी नहीं हो सकती... क्योंकि कानून मुझे इसकी इजाजत नहीं देता!" 😂
कड़वा सच और 'पेपर-2' का रोस्ट:
जो लोग छाती कूट रहे हैं कि RPSC नियम बदल देगी... भाई, अगर तुमने परीक्षा से पहले सिलेबस में 'RPSC की शक्तियां व कार्य' ढंग से पढ़े होते, तो तुम्हारा पेपर-2 वैसे ही क्लियर हो जाता! 🤦♂️
दिमाग की बत्ती जलाने वाले कानूनी तथ्य:
RPSC की शक्ति 0% है: RPSC केवल एक 'भर्ती एजेंसी' (Recruiting Agency) है। SI परीक्षा में 40% (General) और 36% (SC/ST) न्यूनतम अंकों का नियम RPSC ने नहीं बनाया है।
नियम किसके हैं? ये नियम 'राजस्थान पुलिस अधीनस्थ सेवा नियम, 1989' के तहत आते हैं। इन्हें बदलने का अधिकार केवल राज्य सरकार (Cabinet/DoP) के पास है।
सुप्रीम कोर्ट का हथौड़ा: अगर सरकार यह क्राइटेरिया कम करना भी चाहे, तो उसे परीक्षा की विज्ञप्ति (Notification) आने से पहले सेवा नियमों में संशोधन करना पड़ता है। परीक्षा होने के बाद (यानी बीच खेल में) नियम बदलना 'तेज प्रकाश पाठक' मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के आदेश का सीधा उल्लंघन है। ऐसा कोई भी फैसला हाईकोर्ट में 2 मिनट भी नहीं टिकेगा!
निष्कर्ष (क्रांतिकारियों के लिए संदेश):
तो मेरे 'रेवड़' के साथियों, इस जन्म में तो यह भर्ती न कैंसिल हो रही है और न ही ग्रेस मार्क्स मिल रहे हैं। अगली भर्ती में तैयारी के साथ आना प्लीज़!
और हाँ, ये फालतू की चिट्ठियों पर खून बर्बाद करना बंद करो। इसे जाकर किसी ब्लड बैंक में दान कर दो, कम से कम किसी जरूरतमंद की जान तो बचेगी! 🩸🏥
धन्यवाद। 🙏
( pehla comment dekh lo mehnat nahi karni padegi)
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विषय: पेपर-2 (GK & GS) में ग्रेस मार्क्स देने या री-एग्जाम की अनुचित और नियम विरुद्ध मांग को पूर्णतः खारिज करने के संबंध में।
हाल ही में संपन्न हुई परीक्षा के पेपर-2 के संदर्भ में कुछ असफल उम्मीदवार अपने स्वार्थ के लिए और अपने साथियों की परवाह किए बिना बेबुनियाद आंदोलन चला रहे हैं, उसी परीक्षा के अभ्यर्थी के रूप में यह हमारा सीधा सवाल है कि आखिर पेपर-2 को रद्द करने या ग्रेस मार्क्स देने का विचार भी क्यों किया जा रहा है? हम आपसे निवेदन करते हैं कि निम्नलिखित ठोस तथ्यों पर गौर करें:
1. मेहनत का अपमान और यह कैसा न्याय? हम सभी 2021 के ही अभ्यर्थी हैं और परीक्षा कक्ष में हम सभी को एक समान प्रश्न पत्र ही मिला था। हमने दिन-रात कड़ी मेहनत करके इस कठिन पेपर को पास किया है और अपनी योग्यता साबित की है। अब जिनका चयन नहीं हुआ, वे परिणाम को स्वीकार नहीं कर रहे और जो लोग चयनित हैं उनके साथ घात करके बस स्वयं का स्वार्थ देख रहे हैं। यह जरूरी थोड़ी है कि प्रश्नपत्र उनके हिसाब से हो! यदि ऐसा है तो RPSC को आगामी परीक्षाओं में हर अभ्यर्थी के अनुकूल व्यक्तिगत प्रश्न पत्र सेट करना चाहिए ताकि सब सिलेक्ट हो जाएं। और फिर भी जो रह जाएं, वो "प्रश्न पत्र कठिन था, उनके स्तर का नहीं था" ऐसा बोलकर री-एग्जाम के लिए आंदोलन छेड़ दें। यह कहाँ का न्याय है कि जो फेल हो जाएं वो सड़क पर उतरें, और आयोग उनकी अनुचित मांगें मानकर हम जैसे मेहनती और सफल छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करे?
2. पदों से अधिक अभ्यर्थी पहले ही उत्तीर्ण: जब बिना किसी ग्रेस मार्क्स के, विज्ञापित पदों की कुल संख्या से कहीं अधिक बच्चे अपनी मेहनत से न्यूनतम उत्तीर्णांक (minimum marks) प्राप्त कर परीक्षा क्लियर कर रहे हैं, तो फिर दोबारा परीक्षा (re-exam) या ग्रेस मार्क्स का सवाल ही कहाँ उठता है?
3. परीक्षा नियमों का खुला उल्लंघन और मेरिट से खिलवाड़: ग्रेस मार्क्स देना RPSC के मूल परीक्षा नियमों के सर्वथा विरुद्ध है। ग्रेस मार्क्स देकर वास्तविक परिणाम (जो तय नियमों के हिसाब से बना है) को प्रभावित करना पूरी तरह अनुचित है। यदि पेपर-2 में ग्रेस मार्क्स दिए जाते हैं, तो जो अभ्यर्थी अपनी योग्यता से पास नहीं हो पाए, वे मुफ्त के अंकों के सहारे मेरिट में हम जैसे योग्य छात्रों से आगे निकल जाएंगे। खेल के बीच में नियमों में बदलाव करके असफल लोगों को पिछले दरवाजे से एंट्री देना स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की हत्या है।
4. यदि रद्द करना है, तो दोनों पेपर रद्द हों: यदि आयोग किसी भी राजनीतिक या कोचिंग माफियाओं के दबाव में आकर परीक्षा रद्द करने पर विचार कर ही रहा है, तो फिर केवल पेपर-2 ही क्यों? नियमों के अनुसार और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए फिर दोनों पेपर (पेपर-1 और पेपर-2) रद्द होने चाहिए। केवल एक पेपर को रद्द करना पूरी तरह से एकतरफा और पक्षपातपूर्ण फैसला होगा, जिसे कतई स्वीकार नहीं किया जाएगा।
5. कोचिंग माफिया और विघटनकारी राजनीति का मोहरा: इस तथाकथित 'छात्र आंदोलन' को मुख्य रूप से उन कोचिंग संस्थानों द्वारा हवा दी जा रही है, जिनका स्टडी मटेरियल कई समय से काम नहीं आ रहा और उनका व्यापार खतरे में है। साथ ही, वर्तमान आंदोलन जीवियों द्वारा देश को अस्थिरता की ओर धकेलने वाली विचारधारा वाले तत्व इस मुद्दे को ढाल बनाकर सरकार को अस्थिर करने और भर्ती प्रक्रिया को अटकाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि आज इन मांग को मान लिया जाता है, तो हर परीक्षा के बाद यह एक स्थायी परंपरा बन जाएगी।
अतः करबद्ध निवेदन है कि RPSC की निष्पक्षता और नियमों की पवित्रता बनाए रखें। यदि ग्रेस मार्क्स या केवल एक पेपर रद्द करने जैसा कोई भी अनुचित निर्णय लिया गया, तो चयनित और योग्य अभ्यर्थी अपने हक की रक्षा के लिए माननीय न्यायालय का दरवाजा खटखटाने को विवश होंगे, जिससे पूरी भर्ती प्रक्रिया सालों के लिए अटक जाएगी।
कृपया गुणवत्ता और नियमों के साथ कोई समझौता न करें।
धन्यवाद।
चयनित अभ्यर्थी (राजस्थान)
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विषय: पेपर-2 (GK & GS) में ग्रेस मार्क्स देने या री-एग्जाम की अनुचित और नियम विरुद्ध मांग को पूर्णतः खारिज करने के संबंध में।
हाल ही में संपन्न हुई परीक्षा के पेपर-2 के संदर्भ में कुछ असफल उम्मीदवार अपने स्वार्थ के लिए और अपने साथियों की परवाह किए बिना बेबुनियाद आंदोलन चला रहे हैं, उसी परीक्षा के अभ्यर्थी के रूप में यह हमारा सीधा सवाल है कि आखिर पेपर-2 को रद्द करने या ग्रेस मार्क्स देने का विचार भी क्यों किया जा रहा है? हम आपसे निवेदन करते हैं कि निम्नलिखित ठोस तथ्यों पर गौर करें:
1. मेहनत का अपमान और यह कैसा न्याय? हम सभी 2021 के ही अभ्यर्थी हैं और परीक्षा कक्ष में हम सभी को एक समान प्रश्न पत्र ही मिला था। हमने दिन-रात कड़ी मेहनत करके इस कठिन पेपर को पास किया है और अपनी योग्यता साबित की है। अब जिनका चयन नहीं हुआ, वे परिणाम को स्वीकार नहीं कर रहे और जो लोग चयनित हैं उनके साथ घात करके बस स्वयं का स्वार्थ देख रहे हैं। यह जरूरी थोड़ी है कि प्रश्नपत्र उनके हिसाब से हो! यदि ऐसा है तो RPSC को आगामी परीक्षाओं में हर अभ्यर्थी के अनुकूल व्यक्तिगत प्रश्न पत्र सेट करना चाहिए ताकि सब सिलेक्ट हो जाएं। और फिर भी जो रह जाएं, वो "प्रश्न पत्र कठिन था, उनके स्तर का नहीं था" ऐसा बोलकर री-एग्जाम के लिए आंदोलन छेड़ दें। यह कहाँ का न्याय है कि जो फेल हो जाएं वो सड़क पर उतरें, और आयोग उनकी अनुचित मांगें मानकर हम जैसे मेहनती और सफल छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करे?
2. पदों से अधिक अभ्यर्थी पहले ही उत्तीर्ण: जब बिना किसी ग्रेस मार्क्स के, विज्ञापित पदों की कुल संख्या से कहीं अधिक बच्चे अपनी मेहनत से न्यूनतम उत्तीर्णांक (minimum marks) प्राप्त कर परीक्षा क्लियर कर रहे हैं, तो फिर दोबारा परीक्षा (re-exam) या ग्रेस मार्क्स का सवाल ही कहाँ उठता है?
3. परीक्षा नियमों का खुला उल्लंघन और मेरिट से खिलवाड़: ग्रेस मार्क्स देना RPSC के मूल परीक्षा नियमों के सर्वथा विरुद्ध है। ग्रेस मार्क्स देकर वास्तविक परिणाम (जो तय नियमों के हिसाब से बना है) को प्रभावित करना पूरी तरह अनुचित है। यदि पेपर-2 में ग्रेस मार्क्स दिए जाते हैं, तो जो अभ्यर्थी अपनी योग्यता से पास नहीं हो पाए, वे मुफ्त के अंकों के सहारे मेरिट में हम जैसे योग्य छात्रों से आगे निकल जाएंगे। खेल के बीच में नियमों में बदलाव करके असफल लोगों को पिछले दरवाजे से एंट्री देना स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की हत्या है।
4. यदि रद्द करना है, तो दोनों पेपर रद्द हों: यदि आयोग किसी भी राजनीतिक या कोचिंग माफियाओं के दबाव में आकर परीक्षा रद्द करने पर विचार कर ही रहा है, तो फिर केवल पेपर-2 ही क्यों? नियमों के अनुसार और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए फिर दोनों पेपर (पेपर-1 और पेपर-2) रद्द होने चाहिए। केवल एक पेपर को रद्द करना पूरी तरह से एकतरफा और पक्षपातपूर्ण फैसला होगा, जिसे कतई स्वीकार नहीं किया जाएगा।
5. कोचिंग माफिया और विघटनकारी राजनीति का मोहरा: इस तथाकथित 'छात्र आंदोलन' को मुख्य रूप से उन कोचिंग संस्थानों द्वारा हवा दी जा रही है, जिनका स्टडी मटेरियल कई समय से काम नहीं आ रहा और उनका व्यापार खतरे में है। साथ ही, वर्तमान आंदोलन जीवियों द्वारा देश को अस्थिरता की ओर धकेलने वाली विचारधारा वाले तत्व इस मुद्दे को ढाल बनाकर सरकार को अस्थिर करने और भर्ती प्रक्रिया को अटकाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि आज इन मांग को मान लिया जाता है, तो हर परीक्षा के बाद यह एक स्थायी परंपरा बन जाएगी।
अतः करबद्ध निवेदन है कि RPSC की निष्पक्षता और नियमों की पवित्रता बनाए रखें। यदि ग्रेस मार्क्स या केवल एक पेपर रद्द करने जैसा कोई भी अनुचित निर्णय लिया गया, तो चयनित और योग्य अभ्यर्थी अपने हक की रक्षा के लिए माननीय न्यायालय का दरवाजा खटखटाने को विवश होंगे, जिससे पूरी भर्ती प्रक्रिया सालों के लिए अटक जाएगी।
कृपया गुणवत्ता और नियमों के साथ कोई समझौता न करें।
धन्यवाद।
चयनित अभ्यर्थी (राजस्थान)
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भाई ये परीक्षा तो किसी हालत में रद्द नहीं होने दूँगा। रद्दी गैंग के खोखले दावे मेरे तर्को के सामने कोर्ट में एक सेकंड भी नही टिक पाएंगे। इसलिए इनसे निवेदन है की रिफॉरमस की बात करो परंतु SI के बारें में चु भी मत करो क्योंकि ये इस जनम में तो रद्द नही होने देने वाला। कितनी भी छाती कूट लो सरकार के सामने हम तो कोर्ट से इसको बहाल करवा देंगे।
ले करा लिया परीक्षा रद्द!
यदि RPSC या सरकार राजनीतिक या कोचिंग माफिया के दबाव में आकर ग्रेस मार्क्स देती है या परीक्षा रद्द करती है तो चयनित अभ्यर्थियों के पास पहले ही दिन राजस्थान हाईकोर्ट से सरकार के ऐसे किसी भी कदम को असंवैधानिक घोषित कर रद्द करवा दिया जाएगा तथा अदालत पूर्णतः चयनित अभ्यर्थियों का ही साथ देगी।
इसके पीछे का ठोस कानूनी कारण है। जैसा कि आप जानते है भारत के उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को "अभिलेख न्यायलय" कहा जाता है, जिसकेे अनुसार इनके पुराने फैसले नजीर का कार्य करते है।
पुराने डॉक्ट्रिन व फैसले:
1. Rules of the Game Doctrine
कोर्ट आपका साथ क्यों देगा: कानून, भर्ती करने वाली संस्था (RPSC या राज्य सरकार) को परीक्षा आयोजित होने के बाद चयन मानदंड बदलने, न्यूनतम उत्तीर्णांक (40%) कम करने या मनमाने ढंग से "ग्रेस मार्क्स" देने से सख्ती से रोकता है।
ऐतिहासिक फैसला:
* तेज प्रकाश पाठक और अन्य बनाम राजस्थान उच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट की 5-जजों की संविधान पीठ द्वारा): यह इस मामले में सर्वोच्च कानूनी नज़ीर है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद "खेल के नियम" बीच में नहीं बदले जा सकते। संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 (समानता और रोजगार में समान अवसर का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
2. "आउट ऑफसिलेबस"/ "आउट ऑफ ट्रेंड"
ऐतिहासिक फैसला:
* CLAT 2018 (सुप्रीम कोर्ट): पेपर पूरी तरह अप्रत्याशित ("आउट ऑफ ट्रेंड ") और सिलेबस से बाहर ("आउट ऑफ सिलेबस") था। सुप्रीम कोर्ट ने परीक्षा रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं में सर्वश्रेष्ठ छात्रों को छांटने के लिए "सरप्राइज एलिमेंट" होना एक सामान्य प्रक्रिया है।
3. विबंध का सिद्धांत (Doctrine of Estoppel - फेल होने के बाद चुनौती नहीं)
प्रदर्शनकारियों ने अपनी मर्जी से पेपर-1 और पेपर-2 दिया। उन्होंने तब विरोध शुरू किया जब उन्होंने अपने नंबर जोड़े और देखा कि वे पेपर-2 में फेल हो रहे हैं। कानून उन उम्मीदवारों को रोकता है जो मर्जी से परीक्षा में बैठते हैं, और फेल होने पर परीक्षा प्रणाली पर सवाल उठाते हैं।
ऐतिहासिक फैसले:
मदन लाल बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य (1995) और मनीष कुमार शाही बनाम बिहार राज्य (2010): सुप्रीम कोर्ट ने एक कड़ा नियम तय किया है कि यदि कोई उम्मीदवार बिना किसी विरोध के चयन प्रक्रिया में भाग लेता है, तो असफल घोषित होने पर वह उस परीक्षा को चुनौती नहीं दे सकता (जैसे 40% का विरोध)। कानूनी रूप से उन पर रोक (Estopped) लग जाती है।
4. परीक्षा रद्द करने के लिए "व्यापक धांधली" चाहिए, "कठिन प्रश्न" नहीं
कोर्ट आपका साथ क्यों देगा: सुप्रीम कोर्ट (सचिन कुमार बनाम DSSSB, 2021) ने फैसला दिया है कि किसी पूरी परीक्षा को तभी रद्द किया जा सकता है जब बड़े पैमाने पर पेपर लीक का ऐसा ठोस प्रमाण हो। "पेपर बहुत कठिन था", यह कानूनी रूप से परीक्षा रद्द करने का कोई आधार नहीं है।
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क्या सीटें खाली रहना परीक्षा रद्द करने का आधार हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार बिल्कुल नहीं।
यह कड़वा कानूनी सच है:
1. मेरिट सर्वोपरि है (सुप्रीम कोर्ट का फैसला):
सुप्रीम कोर्ट (सुभाष चंदर मारवाह केस) ने स्पष्ट किया है कि केवल 'सीटें भरने' के लिए सरकार न्यूनतम योग्यता (40%) से समझौता नहीं कर सकती।
2. सीटें खाली रहना कोई कानूनी तर्क नहीं है।
3. असफल छात्रों के पास सही कानूनी रास्ता है कि वे कोर्ट या सरकार से बैकलोग की सीट पर नई भर्ती निकालने और उसमे केवल 2021 के छात्र की भागीदारी की मांग कर सकते है अथवा अगली भर्ती में Age Relaxation देने की मांग कर सकते हैं। लेकिन वर्तमान परीक्षा के नियम बदलवाना या मेरिट लिस्ट को रद्द करवाना उनके अधिकार में नहीं है।
2021 वाले सब-इंस्पेक्टर सीनियर रहेंगे।
1. RPSC के आदेश और हाई कोर्ट के फैसले में यह बात स्पष्ट की गई है कि 20 सितंबर 2026 को हुई दोबारा परीक्षा कोई नई भर्ती प्रक्रिया नहीं है। कानूनी तौर पर, इसे सब-इंस्पेक्टर भर्ती 2021 की "निरंतरता" माना गया है।
2. RPS Rule के नियम 36 के अनुसार,
नियम स्पष्ट करता है कि वरिष्ठता का निर्धारण "नियमित चयन" और विज्ञापन वर्ष के आधार पर ही तय होता है। चूंकि 2026 में हुई परीक्षा कानूनी रूप से 2021 की मूल भर्ती प्रक्रिया का ही हिस्सा (Continuation) है तथा 2026 की पुनः परीक्षा के सफल उम्मीदवारों को 2021 की रिक्ति के विरुद्ध नियमित नियुक्ति दी जाएगी इसलिए इस बैच का चयन वर्ष 2021 ही माना जाएगा।
🚨 कोई भ्रामक बात नहीं, सीधा कटु सत्य: क्या SI (2021) का पेपर रद्द होगा या 40% की लिमिट में छूट मिलेगी? 🚨
सोशल मीडिया और धरना स्थलों पर फैलाई जा रही अफवाहों से परे, आइए तथ्यों और कानून की बात करते हैं:
पॉइंट 1: क्या 40% न्यूनतम उत्तीर्णांक में कोई छूट मिलेगी?
👉 जवाब: बिल्कुल नहीं। ❌
ठोस कारण (कानूनी तथ्य):
परीक्षा प्रक्रिया के बीच में नियमों को बदलना पूरी तरह से अवैध है। यह सिर्फ सुप्रीम कोर्ट का नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की 'संविधान पीठ' (Constitution Bench) का ऐतिहासिक फैसला है:
> "तेज प्रकाश पाठक और अन्य बनाम राजस्थान उच्च न्यायालय" मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 'खेल के नियम' (Rules of the Game) के सिद्धांत को दृढ़ता से लागू किया है। कोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि किसी भी सार्वजनिक भर्ती प्रक्रिया में एक बार चयन प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद, वैधानिक मानदंडों, पात्रता शर्तों या मापदंडों को बीच में या पूर्वव्यापी रूप से नहीं बदला जा सकता।
पॉइंट 2: क्या पेपर-2 (GK) रद्द होगा?
(विरोधियों का आधार: पेपर बेतुका/कठिन था, आउट ऑफ सिलेबस था, या सीटें खाली रह जाएंगी)
👉 जवाब: नहीं। ❌
ठोस कारण (ऐतिहासिक एवं तार्किक तथ्य):
ऐतिहासिक नज़ीर: भारत के न्यायिक इतिहास में 'पेपर कठिन होने' के आधार पर कभी कोई परीक्षा रद्द नहीं हुई।
(i). UPSC Prelims 2023 (CSAT विवाद): CSAT पेपर में गणित के प्रश्न IIT-JEE और CAT (IIM) स्तर के पूछे गए थे। भारी विरोध के बावजूद दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट कहा— "परीक्षा के कठिनाई स्तर और सिलेबस की समीक्षा करना न्यायालय का काम नहीं है।" न परीक्षा रद्द हुई, न कोई ग्रेस मार्क्स मिले।
(ii). CLAT 2015 & 2018: छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई कि पेपर पूरी तरह 'आउट ऑफ सिलेबस' और अप्रत्याशित (Unpredictable) रूप से कठिन था। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप से साफ इनकार करते हुए री-एग्जाम की मांग खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं में 'सरप्राइज एलिमेंट' (Surprise Element) होना एक सामान्य प्रक्रिया है ताकि सर्वश्रेष्ठ छात्रों को छांटा जा सके। केवल पेपर कठिन होने के आधार पर परीक्षा रद्द नहीं की जा सकती।
'लेवल प्लेइंग फील्ड' का कड़वा सच:
यह तर्क दिया जा रहा है कि पेपर 2021 के स्तर का नहीं था। सच्चाई यह है कि परीक्षा में बैठने वाले सभी अभ्यर्थी 2021 बैच के ही थे। अगर इस पेपर में किसी अन्य वर्ष (जैसे 2024 या 2025) के छात्रों की भागीदारी होती, तो यह तर्क वैध होता।
निष्कर्ष (जागो छात्रों):
यह एकदम कटु सत्य है। इसे स्वीकार करना या न करना आपके मनोभावों पर निर्भर करता है। लेकिन क्षणिक आवेश में आकर, अपनी राजनीति चमकाने वाले फर्जी नेताओं व स्वार्थी लोगों के बहकावे में आकर कोई भी ऐसा गैर-कानूनी कदम मत उठा लेना, जो आपका पूरा भविष्य ही खराब कर दे।
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