आज सोशल मीडिया पर फ़ैज़ल ख़ान उर्फ़ खान सर को विलेन साबित करने की जो सुनियोजित मुहिम चलाई जा रही है,वह बेहद शर्मनाक और चिंताजनक है।
एक ऐसा शिक्षक जो देश के सुदूर इलाक़ों में बैठे सबसे गरीब बच्चे तक कौड़ियों के दाम में (या मुफ़्त) विश्वस्तरीय शिक्षा पहुँचा रहा है,
आज उसे सिर्फ़ इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि उसका नाम एक ख़ास समुदाय से है।
ट्विटर पर नफ़रत की फ़ैक्ट्री चलाने वाले IT Cell और उनके समर्थकों को बस एक मौके की तलाश रहती है।
अगर आपका नाम उर्दू है, तो आपकी काबिलियत, आपका देशप्रेम और समाज के लिए आपका योगदान सब कुछ दरकिनार कर दिया जाता है।
अब यह दावा किया जा रहा है कि ख़ान सर रक्षाबंधन के पवित्र त्योहार पर लड़कियों के दुपट्टे से अपना पसीना पोंछते हैं!
कोई इंसान इतना बीमार और घटिया सोच वाला कैसे हो सकता है कि वह इस तरह के काल्पनिक और घिनौने इल्ज़ाम एक शिक्षक पर लगाए?
जो इंसान हर साल हज़ारों बहनों से राखी बंधवाकर एक मिसाल पेश करता है, उसके चरित्र पर कीचड़ उछालना यह दिखाता है कि ट्रोल आर्मी का स्तर कितना गिर चुका है।
तैयार रहिए, क्योंकि आने वाले दिनों में आपको ख़ान सर के बारे में ऐसी-ऐसी मनगढ़ंत कहानियाँ सुनने को मिलेंगी जो आपने कभी सपने में भी नहीं सोची होंगी।
टूलकिट तैयार है, स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है और प्रोपेगैंडा फैलाने वाले एक्टिव हो चुके हैं।
लेकिन याद रखिए:
एक शिक्षक का कोई धर्म नहीं होता, उसका धर्म सिर्फ़ अज्ञानता के अंधेरे को मिटाना है।
ख़ान सर पर हमला सिर्फ़ एक व्यक्ति पर हमला नहीं है,
बल्कि देश के उन लाखों गरीब छात्रों के सपनों पर हमला है जो उनकी वजह से अफ़सर, डॉक्टर और इंजीनियर बनने का ख़्वाब देख रहे हैं।
हम इस नफ़रती एजेंडे को कामयाब नहीं होने देंगे।
देश के सभी जागरूक नागरिकों और छात्रों से अपील है कि इस प्रोपेगैंडा को पहचानें और सच के साथ खड़े हों।
✊ हम ख़ान सर के साथ हैं! 📚
Merit overloaded 🔥🔥🔥
प्रधानमंत्री की इकोनोमिक एडवाइजर Dr. Shamika Ravi ने कहा कि "क्या हुआ अगर 100 रूपये एक डॉलर के बराबर हो जाए, यह सिर्फ़ एक नंबर है"
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता कह रही है "जो पानी हमारा आता है, वो बीच में Evaporate हो जाता है इसीलिए पानी की shortage हो रही है"
अगर हम इनकी मैरिट के बारे में कुछ बोल देंगे तो GC Activist रोने धोने लगेंगे 🔥🔥🔥
तुम उसे जाति के कारण कोसते रह गये
उसने जातिवाद के दंश के घूंट को पीकर भी अपना नाम भारत के सर्वश्रेष्ठ अधिकारियों में शामिल कर लिया।
बधाई हो @dabi_tina जी।
मल्टी पार्टी सिस्टम में बड़े राजनीतिक दलों से लड़ने के लिए गठबंधन करना समय की मांग है.
बहुजन समाज पार्टी और आजाद समाज पार्टी की विचारधारा में कोई अंतर नही है.
दोनों पार्टी सामाजिक परिवर्तन और गैर बराबरी को खत्म कर समतामूलक समाज की स्थापना करना चाहती है.
अगर बहन मायावती जी ने 2017 से पहले या 2012 में ही जब अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के उत्तराधिकारी बने,
BSP का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया होता, तो युवा चंद्रशेखर आजाद की तरफ नही जाते. खैर जो होना था वो हो गया.
2027 का UP विधानसभा चुनाव ध्यान में रखते हुए आजाद समाज पार्टी और BSP के बीच गठबंधन होना चाहिए. मिलकर रहेंगे तो पार्टी ज्यादा सीट जीतेंगी, अलग रहेंगे तो हारेंगे.
तुम न हो तो ये सफर अधूरा सा लगे।
दोस्ती तुम्हारी इबादत है मेरी,
जो कभी खत्म न हो, यही दुआ है मेरी।
सच्ची दोस्ती वो नहीं जो हर वक्त हँसाए,
बल्कि वो है जो आँसू में भी साथ आए।
तेरी वफा का कर्ज़ कभी नहीं चुका पाऊँगा,बस इतना कहूँगा
तू है तो मैं राजा हूँ, तू न हो तो कंगाल हो जाऊँगा
Good Morning everyone
सुबह की हर किरण ये पैगाम देती है,
मेहनत करने वालों की किस्मत भी बदलती है
मुस्कुराते रहो, आगे बढ़ते रहो,
क्योंकि अच्छे दिन मेहनत से ही मिलते हैं
https://t.co/9GMvq5I2PT
खेल शुरू हो गया है, आप इतने दिनों तक कहाँ थे ?
बाहर से देखने वालों को य जरुर गलत लग सकता है,
लेकिन हर कहानी के पीछे एक छुपी हुई वजह होती है।
कभी-कभी परिस्थितियाँ ऐसी बन जाती हैं कि हीरो को विलेन के साथ रहना पड़ता है। वो चाहकर भी तुरंत उसके खिलाफ नहीं जा सकता, क्योंकि कई बार हालात, जिम्मेदारियाँ और अपनों की सुरक्षा उससे समझौता करने पर मजबूर कर देती हैं।
हीरो का किसी की मदद करना हमेशा उसका साथ देना नहीं होता। कई बार वह किसी बड़े नुकसान को रोकने, बेगुनाह लोगों को बचाने या सही समय का इंतजार करने के लिए ऐसा करता है। असल ताकत उसी में होती है, जो मुश्किल हालात में भी अपने इरादों को सही रखे।
सच्चा हीरो वही होता है जो अंधेरे माहौल में रहकर भी खुद को अंधेरा नहीं बनने देता। वह हर परिस्थिति में धैर्य रखता है, सही मौके का इंतजार करता है और अंत में सच का साथ देकर अपनी पहचान साबित करता है।
“Yes Sir” की संस्कृति में दब गई उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था! वर्टिकल सिस्टम और कागज़ी योजनाओं ने उपभोक्ताओं को झोंका संकट में*
प्रदेश मे बढते उपभोक्ताओं की संख्या से बिधुत लोड चरम पर है, वहीं दूसरी तरफ विभाग द्वारा कर्मचारियों को घटाना,संविदा कर्मियों को हटाना और संसाधनों का अभाव यह साबित करता है कि बिजली व्यवस्था की योजनाएं सिर्फ फाइलों और बैठकों तक सीमित हैं, धरातल पर नहीं।
ऊपर से रोज समीक्षा बैठकें और निर्देशों की बौछार"
विभाग के अंदर “Yes Sir” संस्कृति इतनी हावी हो चुकी है कि अधीनस्थ अधिकारी वास्तविक स्थिति बताने से डरते हैं। उच्च अधिकारियों तक वही रिपोर्ट पहुंच रही है जो सुनने में अच्छी लगे।
गर्मी शुरू होने से पहले लोड, जर्जर लाइनें, ट्रांसफार्मर क्षमता, स्टाफ और संसाधनों की समीक्षा एक नियमित प्रक्रिया होनी चाहिए थी, लेकिन विभाग में समीक्षा अब समस्या समाधान नहीं बल्कि “फरमान” बन चुकी है। धरातल की कमियां दूर करने के बजाय केवल आदेश जारी किए जाते हैं।
सबसे बड़ा सवाल विभाग की तथाकथित “वर्टिकल प्रणाली” पर खड़ा हो रहा है। जहां पहले सीमित संसाधनों में भी स्थानीय स्तर पर वयवस्था कर काम निकल जाता था, वहीं अब जिम्मेदारियां बंटी जरूर हैं लेकिन जवाबदेही गायब हो गई है।
संविदा कर्मचारियों को हटाने और स्टाफ घटाने के फैसलों ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। बहुत से उपकेंद्र ऐसे हैं जहां लाइनमैन तक उपलब्ध नहीं हैं। फाल्ट होने पर घंटों बिजली बंद रहती है
विभाग के मुखिया चाहे रोज समीक्षा करें, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करें या सख्त निर्देश जारी करें, लेकिन सच्चाई यही है कि बिना मैनपावर, बिना संसाधन और बिना जमीनी तैयारी के बिजली व्यवस्था केवल कागज़ों में ही सुधर सकती है, हकीकत में नहीं।
यदि समय रहते वर्टिकल प्रणाली की समीक्षा नहीं हुई, संविदा कर्मचारियों को हटाने की नीति पर पुनर्विचार नहीं किया गया और उपकेंद्रों को पर्याप्त स्टाफ व संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गए, तो आने वाले दिनों में बिजली संकट से कोई रोक नहीं सकता।
"सभी विडिओ राजधानी लखनऊ के है"
@ChairmanUppcl@UPPCLLKO@MdPvvnl@mduppcl @mdmvvnl
@Devendr43336892
नॉर्वे की पत्रकार @HelleLyngSvends ने वह साहस दिखाया, जो भारत का बड़ा मीडिया पिछले 13 वर्षों में नहीं कर पाया। सत्ता से सवाल पूछना पत्रकारिता का धर्म है, लेकिन भारत में अधिकांश मीडिया ने सवालों की जगह चुप्पी और भक्ति को चुन लिया।
@Amit88757567@ShyamMeeraSingh सरकार तुम्हारी जो मर्जी लिख दो एक दलित बिटिया की निर्ममता हत्या कर दी गयी प्रकरण को इतनी बेशर्मी से दवा दिया और तुम्हे शर्म तक नहीं आ रही इसको झूठ बताते हुए।
कल मैंने Zee-5 पर हाथरस केस पर आई सीरीज देखी। इस सीरीज को देखकर दिल बैठ गया। ये डॉक्यूमेंट्री एक रेप केस से ज़्यादा इस बात पर है कि भारत की पुलिस दलितों के साथ कैसे बर्ताव करती है। डॉक्यूमेंट्री के लेवल पर ये सीरीज नेक्स्ट लेवल पर है। आप सबको देखनी चाहिए।