Amsterdam today.
Extreme left mayor and anti-Israeli Prime Minister are silent.
The Jew haters rule this land.
I would hunt them all down, no support for Hamas in my Holland! Hopefully soon new elections!
#PVV#Wilders#Amsterdam
The "student protesters" in Brussels are asked: "What are you protesting about?":
"Student": "I don't know".
Asked again: “so, what is your message?”
"Student": "Destroy everything!!"
चेन्नई में राहुल गांधी के मंच पर एक मुस्लिम लड़की आई
और उसने तमिल भाषा में काफी कुछ बोला
फिर जब ट्रांसलेटर ने उसे ट्रांसलेट किया कि यह कह रही है कि मैं मुस्लिम लड़की हूं हमारे धर्म में पूरी तरह से पितृसत्तात्मक व्यवस्था है हमें पढ़ने नहीं दिया जाता हमें आगे बढ़ने नहीं दिया जाता हमें तमाम बंदिशों में रखा जाता है और दूसरी तमाम बातें चुपचाप राहुल गांधी सुने और कुछ नहीं बोले
राहुल गांधी एक शब्द तक नहीं बोले
और उस लड़की को मंच से उतार दिया गया
अब सीन बदल देते हैं
अगर कोई हिंदू लड़की आई होती और राहुल गांधी से कहती कि वह हिंदू है उसके धर्म में पितृसत्तात्मक व्यवस्था है उसे बंदिशें में रखा जाता है फिर राहुल गांधी 1 घंटे तक हिंदू धर्म पर हिंदुओं पर हिंदू किताबों पर जहर उगलते और पूर्व में कई बार राहुल गांधी जहर उगल चुका है
इसीलिए हिंदुओं में बार-बार कहता हूं कि विदेशियों का औलाद कभी तुम्हारा नहीं हो सकता
यह कभी हिंदुओं का तो क्या भारत देश का भी नहीं हो सकता
अभिजीत दीपके की दादी का अंतिम संस्कार हुआ….. दीपके नहीं पहुंचे।
बौद्ध भिक्षु ने करवाया अंतिम संस्कार।
क्या दीपके के परिवार ने बौद्ध धर्म अपना लिया है?
फिर अभिजीत दीपके ख़ुद को दलित क्यों कहते हैं?
याद दिला दूँ कि @narendramodi या @PMOIndia की ओर से तीन दिन बाद भी 'जेवर एयरपोर्ट' को मोदी एयरपोर्ट नामकरण का कोई खंडन नहीं आया है।
इसके बाद भी यदि आपको भ्रम है कि यह कार्य PMO ने दवाब डाल कर नहीं करवाया है, तो आपका नशा अभी उतरा नहीं है।
मैं आश्वस्त हूँ कि मोदी की टीम ने 'नरेंद्र मोदी अंतरराष्ट्रीय विमानपत्तन' की लेटरिंग का फोंट डिसाइड करने के लिए मीटिंग बिठा ली होगी आज सुबह।
आने वाले समय में, यह भी आशा की जा सकती है कि नरेंद्र मोदी के नाम से ही 'नमो यूनिकोड' फोंट भी कोई बना कर मोदी जी को गिफ्ट कर देगा। पहला सेमीकंडक्टर चिप जो पूर्णतः भारतीय होगा, उसका नाम 'NaMo 1' रखा जाएगा।
समाचार समाप्त हुए।
11 हज़ार YES कमेंट में आए तो
तीनो हिन्दुओं की बेल हम कराएँगे।
आधी वीडियो वायरल कर के जो सच छिपाया गया
अब वो समाज के सामने भी आ गया
@ANI@ians_india@VikasNagwan
तिलचट्टे बहुत बुरे हैं! मुझसे 5-5 घंटे लाइव करवाते हैं और YT पर रात के 2:45 AM पर भी 6000 लोग देखते रहते हैं। 22,878 कमेंट्स! अंत होते-होते 4.3 लाख व्यूज़ (YT स्टूडियो में एक्चुअल दिखते हैं, YT पर थोड़ा टाइम लेता है)। आज मेरे रोड माइक की बैटरी खत्म हो गई, एक लाइट की बैटरी खत्म हो गई और वो बंद हो गया। पर लाइव चलता रहा!
X पर भी 8,000 से अधिक लोग जुड़े रहे पर साढ़े चार घंटे के आस-पास अब्रप्टली कनेक्शन कट गया!
टेस्ला की गाड़ियां भारत में बिक नहीं रहीं... BYD की इंट्री अमेरिका में रुकवा कर चीता बन रहे @elonmusk की टेस्ला को यहां कोई पूछ ही नहीं रहा.. भाई फ्रस्ट्रेट हो रखा है
ऊपर से स्टारलिंक का लाइसेंस अटक गया। ऊपर से दौ कौड़ी के ट्वीट करके भाई ने साबित कर दिया कि क्यों इसको लाइसेंस नहीं देना चाहिए।
वैसे भी पहले ही फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे विदेशी कंपनियों के प्लेटफॉर्म दुनियाभर में बदनाम हैं और सरकार विरोधी टूल की तरह इस्तेमाल होते ही हैं.. अब अगर इंटरनेट भी किसी विदेशी कंपनी को दे दिया तो एक नया सिरदर्द होगा।
इसलिए बेहतर है @narendramodi सरकार इसको लाइसेंस ना ही दे। फड़फड़ाने दो भाई को।
चंद्रशेखर ब्रो एकदम ही शांत पड़ गए हैं। पिछली बार तो जे बिम सेना ने ही आंदोलन को हिंसक गति दी थी। इस बार 24 सितंबर की कॉल के बाद तो गायब से ही हो गए हैं।
अभी भी भाई भाजपा वालों की बात मानता है। जड़ों में लौट तो नहीं आए?
बिहार में द्वितीय श्रेणी से भी पास होने के पर सरकार ₹8,000 देगी। क्योंकि यह पैसा सम्राट चौधरी और मोदी जी के पारिवारिक ट्रस्ट से रिलीज किया जाता है। टैक्सदाता इसमें क्यों बिलबिला रहा है!
CJP कभी भी अभिजीत दीपके के बेडरूम में नहीं बना था।
CJP के पीछे की असली ताकत 'ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन' (Human Rights Foundation) है...
...और यह पूरा खेल ओस्लो फ्रीडम फोरम (Oslo Freedom Forum) में रचा गया था, जिसका आयोजन ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन ने किया था।
और अंदाजा लगाइए कि भारत से वहां कौन-कौन से बड़े प्रतिभागी (attendees) पहुंचे थे?
सौरभ दास और सुप्रिया शर्मा।
और वहां की प्रमुख वक्ताओं (featured speakers) में से एक थीं हेलेन स्वैनसन — वही पत्रकार जिन्होंने मोदी जी के ओस्लो दौरे के समय (18 से 20 मई के दौरान) उनके सामने हंगामा (heckling) किया था।
इसकी पटकथा काफी समय पहले ही तैयार कर ली गई थी।
और इस पूरे तंत्र (ecosystem) को सौरभ दास और ठाकुर फाउंडेशन (Thakur Foundation) के ज़रिए भारत में लाया गया।
ठाकुर फाउंडेशन ने सौरभ दास को शुरुआती स्टार्टअप फंड के तौर पर लगभग 11 लाख रुपये दिए थे।
उन्होंने एक किताब भी लिखी है — दरअसल वे एक किताब लिख रहे हैं जिसके लिए उन्हें अग्रिम राशि (advance) मिली है। ठीक वैसे ही जैसे न्यूट गिंगरिच (Newt Gingrich) ने तब किया था जब वे अमेरिका में 'फॉक्स न्यूज़' (Fox News) लाने की कोशिश कर रहे थे। सौरभ दास के लिए भी वही तरीका अपनाया जा रहा है।
तो, ये सारी चीजें बहुत पहले से ही तय थीं।
दीपके को 'ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन' और 'जॉर्ज सोरोस फाउंडेशन' द्वारा अमेरिका में पूरे एक साल तक ट्रेनिंग दी गई थी।
दूसरे साल उनके बोस्टन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने का कोई रिकॉर्ड नहीं है।
अब एक भारी भरकम डोनेशन की बातें सामने आ रही हैं, ताकि वहां से उनकी डिग्री पक्की की जा सके।
सुप्रिया शर्मा 'ओस्लो फ्रीडम फोरम' में दूसरी प्रमुख वक्ता थीं। और उन्होंने उमर खालिद पर खुलकर बात की — कि कैसे भारत में अन्य धर्मों का उत्पीड़न हो रहा है और हिंदू लोग हिटलर और मुसोलिनी जैसे हैं।
यही उनकी सोच और विचारधारा थी, और उनके मुताबिक मोदी तानाशाह हैं...
हां, सुप्रिया शर्मा ने 'लव जिहाद' पर एक किताब भी सह-लिखी (co-authored) है और बताया है कि यह एक काल्पनिक (fictional) कहानी है।
वे भारत में भारी मात्रा में पैसा झोंक रहे हैं, इसीलिए FCRA इतना महत्वपूर्ण है और यही वजह है कि अन्य राजनीतिक दल इसका विरोध कर रहे हैं।
अधिकांश आंदोलनों की शुरुआत वामपंथी (Left) विचारधाराओं से हुई है, जहाँ छात्रों का माइंडवॉश करके आंदोलन खड़े किए जाते हैं।
यह नेपाल में हुआ, बांग्लादेश में हुआ और बहुत पहले क्यूबा में भी ऐसा ही हुआ था।
इस देश की Gen Z और Gen Alpha से मेरी यही अपील है — सरकार से जितने चाहें सवाल पूछें, उनसे वे काम करवाएं जो आप चाहते हैं, खासकर शिक्षा के क्षेत्र में।
लेकिन कृपया करके CJP, AAP, ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन और ओस्लो फोरम जैसी विचारधाराओं के बहकावे में न आएं।
वे भारत को अस्थिर कर देंगे और इसे वापस अंधकार युग (Dark Ages) में धकेल देंगे।
बंगाल में जब भाजपा के कार्यकर्ता मारे जा रहे थे, उस समय तक 135 लोग मारे जा चुके थे। मैं तभी से आलोचना कर रहा था कि आप लोग आखिर कर क्या रहे हैं? उनकी कोई सूची तक नहीं थी। मैं एक दिन में बीस-बीस लोगों से मिला हूँ, आठ-दस लोगों के इंटरव्यू किए हैं। वे इंटरव्यू आपको आराम से मिल जाएंगे if not deleted.
मुझे उसी समय भागवत की नीचता भी दिख गई थी, जब उन्होंने मुझसे कहा था कि संघ ने हिंदुओं का ठेका ले रखा है क्या?
भाई, उन लोगों का नाम लेकर आपने क्या किया? आप डराते रहे कि कोई और मर जाएगा, इसको मार दिया, उसको मार दिया। लेकिन उनके लिए किया क्या? उनसे मिलने के लिए 26 जनवरी को बुला लिया, बस यही सब करते रहे। क्या भाजपा का कार्यकर्ता नहीं मर रहा था? क्या एक पत्रकार के तौर पर हम इस पर चुप रह जाते? नहीं रह सकते, हमारी आत्मा कचोटती है।
मैं उस पत्नी से मिला हूँ, जिसके पति की गर्दन काटकर धड़ फेंक दिया गया और सिर को एक टोपी में रखकर किसी अनजान ट्रेन में छोड़ दिया गया। सिर्फ इसलिए, क्योंकि वह भाजपा का कार्यकर्ता था।
इसलिए मुझे देशभक्ति और राष्ट्रवाद का ज्ञान मत दीजिए। इतने वर्षों से घास नहीं छील रहा हूँ। मैं किसी घटिया कॉलेज का बीटेक इंजीनियर नहीं था, जो फेल होकर पत्रकारिता में आ गया। मैं जो करता हूँ, पूरे कन्विक्शन के साथ करता हूँ। और उसकी एक पूरी प्रक्रिया है। मैं जिस विषय को पकड़ता हूँ, उसके लिए पूरी दुनिया एक तरफ हो जाए, तब भी मैं पीछे हटने वाला नहीं हूँ।
ट्रोल से हमको घंटा फर्क नहीं पड़ता। नौ-दस महीने से ट्रोल झेल रहे हैं, क्या उखाड़ लिया मेरा? YouTube और Twitter पर मेरी इंगेजमेंट बढ़ी है, लोग अधिक जुड़ रहे हैं। तुम्हारी रैलियों में लोगों की संख्या घट रही है, तुम्हारी थू-थू हो रही है।
एक मिनट को मान लेता हूँ कि योगी जी 350 सीटों के साथ वापसी करेंगे, जैसा बहुत सारे लोग कह रहे हैं। ठीक है, जीत भी जाएँ, तब भी UGC उचित नहीं हो जाएगा। दोनों अलग चीजें हैं। हो सकता है लोगों को UGC से फर्क नहीं पड़ता हो, लेकिन एक व्यक्ति और पत्रकार के तौर पर मुझे तो फर्क पड़ेगा।
मान लीजिए, राजनीतिक रूप से मैं गलत साबित हो जाऊँ। दिल्ली यूनिवर्सिटी में ABVP जीत गई, तो क्या इसका मतलब यह है कि वहाँ के विद्यार्थियों को UGC याद नहीं है या वे इसे मुद्दा नहीं मानते? यह तो हमारे मुँह पर सबसे बड़ा तमाचा है। मानेंगे या नहीं? लेकिन उस तमाचे के बाद भी मेरा प्रश्न वही है, क्या UGC के प्रावधान उचित हैं? इस बिंदु पर सोचिए।
IT सेल वालों का जीवन दूसरों पर लांछन लगाने में निकल गया और ये हमें ज्ञान देंगे!
“मैं भी असमंजस में हूँ। मोदी जी को हारते नहीं देखना चाहता। मैं चाहता हूँ कि स्थिति बदले।”
यही भाव मेरे भी थे। लेकिन हम अपनी बात ठीक करवाने के लिए दबाव किस पर बनाएँ?
तिलचट्टे बीस-तीस दिन बैठे, सरकार झुक गई और ठीक उसी माँग को माना, जिसे मैं फरवरी से उठा रहा था। मैं अपनी बात छोड़ दूँ? बाकी लोग भी प्रधान के इस्तीफे की माँग कर रहे थे। वह सांकेतिक माँग थी, उसे मान लेते, लेकिन वह भी नहीं हुआ।
हम तो लगातार वही बात उठा रहे हैं। UGC पर आज भी स्टे लगा हुआ है। हम जानते हैं कि स्टे क्यों लगा हुआ है। सात महीने में दूसरी तारीख मिलती है। वामपंथियों को राहत दिलानी हो तो तीन दिन में तीन बार तारीख मिल जाएगी, लेकिन जिस UGC का करोड़ों विद्यार्थियों पर असर पड़ना है, उस पर सरकार सात महीने में दूसरी तारीख लेती है?
और उसमें भी दो लाइन बोलकर भूल जाएँ कि हम रीकंसिडर कर रहे हैं, it can go both ways। आप चाहते हैं कि फिर एक तारीख आए, उसके बाद कोई और तारीख मिले, फिर मार्च के बाद की कोई तारीख आ जाए। तब तक हम यही बोलते रहें कि स्टे लगा हुआ है।
फिर मोहन भागवत से बुलवा लेंगे कि कोई कानून है ही नहीं, जैसे हमें पता ही नहीं कि कानून क्या है और नियमावली क्या है। गिरिराज सिंह से बुलवाया जा रहा है, तो…
जब ये सब कुछ चल रहा था, सबको दिख रहा था कि जो गलत है, सो गलत है, लेकिन किसी बड़े हैंडल ने नहीं लिखा।
चाटुकारों ने कहा, दो दिन बोल लो अजीत भारती, लेकिन तीसरे-चौथे दिन भी बोल रहे हो? तुम्हारी माँ की चिता की आग भी ठंडी नहीं हुई।
दाह संस्कार के बाद मैं चार-पाँच दिन घर में था। संभवतः मैंने फोन तक नहीं देखा, किसी पर प्रतिक्रिया नहीं दी। आकाश ने मुझे रोते-रोते बताया कि क्या-क्या लिखा जा रहा था। वह कह रहा था कि मैंने सब रखा हुआ है, और यह बताते-बताते रो रहा था। मैंने आज तक नहीं देखा कि किसने क्या लिखा था। मुझे लगता है, क्यों देखना? ईश्वर सबका हिसाब करेगा। ईश्वर नहीं, तो समय करेगा, और उनका हिसाब हो भी रहा है।
लेकिन उसके बाद भी आप कहाँ रुक गए, भाई? देश में हर दिन 42 बच्चे आत्महत्या करते हैं। NEET के कारण इतने बच्चे मरे, पेपर लीक के कारण इतना कुछ हुआ। सरकार ने क्या किया? स्कूलों और कॉलेजों में काउंसलर लगाए? नहीं लगाए। कोई नीति देखी आपने?
यह एक तरह की महामारी है। सोचिए, देश में हर दिन 40-42 बच्चे आत्महत्या कर रहे हों, क्या यह पैनिक की स्थिति नहीं है? बच्चे आत्महत्या क्यों करते हैं? मार्गदर्शन की कमी भी इसकी एक वजह हो सकती है।
साहिल वाकोड़े क्यों चला गया? यार, नकल किसने नहीं की अपने जीवन में? अधिकांश लोगों ने की है, 5% को छोड़ दीजिए। कोई कम करता है, कोई ज्यादा, कोई बहुत ज्यादा। बच्चे आपस में हँसी-मजाक में बताते भी हैं कि कैसे फोन निकालकर देख लिया और टीचर पकड़ने ही वाले थे। पकड़ भी लिया तो हँसकर बात खत्म कर दी, मुर्गा बन गए, जो भी सजा मिली, भुगत ली।
लेकिन वह बच्चा मानसिक रूप से कितना अशक्त रहा होगा, अगर इस घटना के बाद उसने आत्महत्या कर ली? उसे काउंसलिंग मिलती, उसे समझाया जाता कि यार, ये सब जीवन के कुछ उतार-चढ़ाव हैं। आगे तुम्हारे जीवन में बहुत कुछ है। अगले सेमेस्टर में सारे पेपर दे देना, ऑड का ऑड में, इवन का इवन। कोई उसे यह समझा देता, तो शायद उस बच्चे का जीवन बच सकता था।
लेकिन आपने देखा, सरकार ने इस पर दो लाइन बोलीं। मैं NEET वाले मामले की बात कर रहा हूँ, साहिल वाकोड़े की आत्महत्या से पहले की। कह दिया, मेरी जिम्मेदारी नहीं है। कोई समाधान दिया आपने? नहीं दिया।
People are looking for a remedy. लोग समाधान चाहते हैं, इलाज चाहते हैं। क्या आपने कभी सोचा कि शिक्षाविदों को बैठाकर इस पर चर्चा की जाए? प्रधानमंत्री को इस पर विचार करना चाहिए।
मैं जिन बातों के लिए प्रधानमंत्री की तारीफ किया करता था कि वे बच्चों से सीधे संवाद करते हैं, अब मुझे लगता है कि कहीं यह सब सिर्फ दिखावा तो नहीं है? बच्चों से बात करने की छवि बननी चाहिए, लेकिन क्या वास्तव में उनकी समस्याओं को समझा भी जा रहा है?
अगर आप बच्चों को लेकर गंभीर हैं, तो इस आँकड़े को कैसे अनदेखा कर सकते हैं? आपके देश में हर दिन 42 बच्चे मर रहे हैं, आधी लड़कियाँ, आधे लड़के। इसके लिए कोई नीति होनी चाहिए या नहीं?
स्टूडेंट काउंसलर होने चाहिए। शिक्षकों को काउंसलिंग की ट्रेनिंग मिलनी चाहिए। हर 100-50 बच्चों पर एक मनोवैज्ञानिक जैसा विशेषज्ञ होना चाहिए, जो बच्चों से संवाद करे, उनकी समस्याएँ समझे और समय रहते उनकी मदद करे। लेकिन आपने यह पूरा क्षेत्र ही छोड़ रखा है।
यही मैं कह रहा हूँ, कहने को मेरे पास बहुत कुछ है। इस विषय पर मैं लगातार, हर दिन बोल सकता हूँ, लिख सकता हूँ, और आप बोर भी नहीं होंगे।