No matter how depressed the king, he must motivate his army !
No matter how sad the joker, he must perform !!
No matter who you are, the show must GO ON !!
मुझे नफरत करना आया ही नहीं,
मैने माफ करने के बाद लोगों को छोड़ दिया ।।
कड़वाहट खुद को ही तकलीफ देती है । माफ करने का मतलब ये नहीं होता है कि सब कुछ भूल जाओ । कभी कभी खुद के शुकून के लिए जरूरी की दुरियां बना ली जाए ।
Dear Man,
Sit back and Stay calm.
When She needs you—emotionally, physically, or professionally—she will remember you.
Otherwise, you are invisible to them.
Don’t chase people who value you only when it’s convenient !!
काशी पहले लोग पैदल जाते थे। आज वायुयान और वंदे भारत से जाते हैं। जो हवाई अड्डे पर उतरते हैं, उनका मानना है कि हवाई अड्डा बनने तक आधुनिकीकरण स्वीकार्य है, इसके आगे कुछ नया बनेगा या रेलवे स्टेशन भी बेहतर होगा तो नगर के पौराणिक चरित्र का हनन हो जाएगा, जो वंदे भारत से आते हैं, उनके अनुसार स्टेशन तक सुविधाएँ विश्व स्तरीय हो जाएँ परंतु बस स्टॉप के आस पास कोई विस्तार, अवैध निर्माण का भंजन शहर के मूल चरित्र को प्रभावित कर देगा। जो पाँच सितारा में ठहरते हैं, उन्हें पाँच सितारा के निर्माण तक विकास स्वीकार्य है, जिनकी सामर्थ्य में तीन सितारा है, उन्हें तीन सितारा तक विकास शास्त्रोचित लगता है, धर्मशाला विश्व स्तरीय हॉस्टलों के स्तर की हो जाये तो तीर्थ टूरिज्म हो जाएगा। यह कौन तय करेगा कि किस स्तर तक पहुँचने की कठिनाई, रहने खाने की असुविधा तीर्थ को शास्त्रों के अनुरूप स्वीकार्य होगी। कई ऐसे मंदिर होंगे जिन पर लिखा हुआ है कि यह एक ऐसी गुफा थी जिसमे साहसी लोग ही घुसते थे और अहिल्या बाई ने वहाँ मंदिर बनवाया। कितने ही घाट राजाओं के बनवाये हुए काशी में हैं और अब वाराणसी का प्रतिनिधि चित्र हैं। महाराजा रणजीत सिंह में जब स्वर्ण कलश ज्ञानवापी पर बैठाया होगा तो क्या उसका चरित्र दूषित हुआ या कच्चे घाटों पर कब सीढ़ियाँ बनी तो काशी का स्तर गिर गया? या उनका सौभाग्य था कि यह सब परिवर्तन सोशल मीडिया के आने के पहले हुए, और जिसे जो तीर्थयात्रियों की यात्रा को सुगम बनाने का साधन सूझा, धर्म की प्रतिष्ठा बढ़ाने का साधन सूझा, उसने बनाया। मक्का में पैगंबर साहब के जीवन से जुड़े भवन ध्वस्त हुए, वेटिकन में एक सुनियोजित नगर व्यवस्था के लिए नई व्यवस्था बनायी गई। धर्म की निरंतरता के लिए राजा तालाब और बावड़ी बनवाते रहे हैं। तीर्थयात्रियों के आगमन को सुगम बनाने के लिए राजशाही में भी शासन प्रयासरत रहा है। विशाल हज हाउस बनते रहे हैं, अरब देशों से आने वाले धन से विराट मस्जिदें बनती रही हैं। यह धर्म की शक्ति का प्रतिबिंब बन के युवाओं को अपने धर्म में गौरव की अनुभूति करा के उन्हें अपनी ओर खींचता रहा है। सात सौ वर्ष एक हिंदुओं से घृणा करने वाले शासन और सत्तर साल के हिन्दू लज्जा और अपराधबोध पर आधारित व्यवस्था ने हिंदू तीर्थों को बढ़ती जनसंख्या के साथ आगे नहीं बढ़ने दिया और अधिकांश तीर्थ दुर्गम क्षेत्रों, संकरी गलियों और गन्दगी का पर्याय हो गए। हिंदू बच्चे गोवा में चर्च के विस्तृत प्रांगणों में रील बनाते रहे और माँ बाप के साथ काशी विश्वनाथ की संकरी गलियों में पंडों की कृपा से दर्शन करने से बचते रहे। इनकी अगली पीढ़ी छुट्टियों में कहाँ जाएगी सोचिएगा ज़रूर।
The current status of Vande Bharat @AshwiniVaishnaw Ji Train No 22416 is still on the platform, as its scheduled departure time is at 03:00 PM. It seems that the public's time doesn't seem to matter to you, does it?
@RailMinIndia@IRCTCofficial@narendramodi Vande Bharat lol 🤣
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राम मंदिर धर्मध्वजा
मंदिर जब टूटते हैं, तो केवल शिलाएँ, ध्वजा या प्रतिमाएँ खंडित नहीं होती, तोड़ने वालों का लक्ष्य मंदिरों में बसी सनातन आत्मा का भंजन होता है। उनकी सोच उस पवित्र देवालय को अदृश्य करने मात्र की नहीं होती, वरन एक-एक टूटता मंदिर, एक-एक जलता गाँव, एक-एक धर्मविमुख होता व्यक्ति उसी सोच के विस्तार को अवलम्ब देती सीढ़ियाँ होती हैं कि यदि आक्रांता लगा रहे, तो एक दिन सनातन के धरातली अर्थ का आध्यात्मिक लोप भी हो जाएगा।
एक पुस्तक वालों ने हमारे पुस्तकालयों को जला कर यह सोचा कि हमारी सभ्यता या तो वो मिटा देंगे, या उनकी आने वाली पीढ़ियाँ। परंतु ऐसा हो नहीं पाया। हड्डियों में धँसे छर्रे हों या खोपड़ी में लगी सात-सात गोलियाँ, वो खंडित शिलाएँ, प्रतिमाओं के नोंचे टुकड़े, वायु में जलते पताकाओं के उड़ते धागे, अपने समय की प्रतीक्षा करते रहे कि कालचक्र घूमेगा और धर्मचक्र पुनर्स्थापित होगा।
राम मंदिर के शिखर पर शोभायमान भगवा ध्वज एक मंदिर मात्र की पूर्णता नहीं बल्कि लाखों हिन्दुओं की टूटती साँसों, बिखरते विमर्श और धुँधली होती जाती आशा की राह पर खड़ा वह स्तंभ है, जो आज हमारा सामूहिक अवलम्ब बन चुका है।
यह धर्मध्वजा और मंदिर, कपड़े और पत्थर नहीं सनातन की गति, लहर और शाश्वत स्थायित्व का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि हिन्दू था, हिन्दू है, और हिन्दू, ब्रह्मांडों की उत्पत्तियों और विनाशों के बाद हर बार पुनः आ जाएगा। मैंने पहले भी कहा था कि राम मंदिर के महत्व का अनुभव हमें वर्तमान में नहीं हो पाएगा क्योंकि हमें यह ‘एक और मंदिर परिसर’ की तरह बताया जाएगा।
हालाँकि कालांतर में, जब हजारों वर्षों के इतिहास, संघर्ष, आक्रमण, विनाश और जीर्णोद्धार की समय रेखा बनाई जाएगी तो राम मंदिर वह उदाहरण बनेगा जिसके समक्ष सब फीका होगा।
माता अहिल्याबाई, या कृषणदेवराय, राजा सुहंगमंग, शिवाजी महाराज या सवाई मान सिंह द्वितीय आदि के शत्रु ज्ञात थे, विधर्मी थे, परंतु राम मंदिर उस काल खंड में नकारा जाता रहा जब सत्ता हिन्दुओं के हाथ में थी और उन हिन्दुओं ने जीर्णोद्धार के नाम पर राम लला को वैसे कपड़े के नीचे रखा जैसे अवैध लोग किसी स्लम में विज्ञापन के फ्लेक्स की छत बना कर रहते हैं।
हमने उनसे भगवान को मिथक बताते सुना और अंततः स्वयं के ही समूहों से स्वयं ही लड़ते हुए इस मंदिर का निर्माण किया है।
आज २५ नवंबर २०२५ है, लहू के थक्कों का बोझ उठाते यज्ञोपवीतों ने आज मानो एक रक्तबंध का निर्माण किया है जो हमारे पूर्वजों के शौर्य की पताका को सभ्यता के इस प्रतीकात्मक शिखर पर स्थापित करता है। इस यात्रा के हर पथिक, हर नेता, हर गिलहरी और हर जटायु-सम्पाति को प्रणाम।