Smt. @gupta_rekha , Hon’ble Chief Minister of Delhi, inaugurated Project SAKSHAM by @honeywell , implemented by Ladli Foundation, on 9 July 2026 at GGSSS, Shalimar Village advancing girls’ education, health, STEM learning & digital inclusion.
#ProjectSAKSHAM#LadliFoundation
Time is not merely a movement of hours; it is the silent expression of Divine order. Wealth, strength, and knowledge may return, but a vanished moment never comes back. Therefore, the wise do not spend time; they consecrate it.
Bhagavatpada Adi Shankaracharya reminds us that the deepest loss of human life is not worldly failure, but forgetfulness of the Self. Human birth is rare, and rarer still is the awakening of the desire to realize Brahman. To waste life in fleeting distractions is to turn away from the very purpose for which this precious existence has been granted.
According to Advaita Vedānta, sorrow arises from avidyā - ignorance of our true nature. When we mistake the body, mind, and ego for the Self, we become bound by desire, fear, attachment, and restlessness. But when every moment is dedicated to discrimination, devotion, meditation, selfless service, and remembrance of the Divine, time becomes a sacred bridge from ignorance to Self-realization.
A pure resolve transforms the direction of life. When the heart chooses truth, compassion, righteousness, and God-realization, every thought becomes worship, every action becomes purification, and every duty becomes an offering. Spirituality does not mean renouncing action; it means renouncing ego and attachment in action.
The realized one sees Brahman alone shining through all. For such a soul, every sunrise is grace, every being is the Self, every challenge is a teacher, and every success belongs to the Divine.
Therefore, value time as a sacred trust. Guard it with awareness, illumine it with wisdom, dedicate it to service, and sanctify it through remembrance of God. When time is offered to Truth, life blossoms into knowledge; and when the mind abides in the indivisible Brahman, every moment becomes eternity itself.
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#AvdheshananadG_Quotes
।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
वेदाहमेतं पुरुषं महान्त-मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।।८।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - तृतीयोऽध्यायः)
उपनिषदों का समस्त प्रयोजन मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराना है। समस्त वैदिक वाङ्मय का चरम निष्कर्ष आत्मविद्या है, क्योंकि आत्मज्ञान ही जन्म-मरणरूप संसार से मुक्ति का एकमात्र साधन है। श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह महत्त्वपूर्ण मन्त्र उसी सनातन सत्य की उद्घोषणा करता है कि परमात्मा का साक्षात्कार ही अमृतत्व का मार्ग है; उसके अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नहीं।
भगवत्पादाचार्य आदि शंकराचार्य अपने भाष्य में इस मन्त्र को अद्वैत वेदान्त के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रमाणों में स्वीकार करते हैं। यहाँ वर्णित पुरुष कोई सीमित देहधारी सत्ता नहीं, अपितु समस्त विश्व का आधार, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सर्वव्यापक और स्वयंप्रकाश ब्रह्म है, जो प्रत्येक जीव के हृदय में आत्मरूप से विद्यमान है।
“वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्” ऋषि का प्रत्यक्ष आत्मानुभव ! मन्त्र का प्रारम्भ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है - “वेद अहम् एतं पुरुषं महान्तम्।” यहाँ “वेद” का अर्थ केवल शास्त्रीय ज्ञान नहीं, अपितु प्रत्यक्ष आत्मानुभूति है। ऋषि यह नहीं कहते कि “मैंने सुना है” अथवा “मैंने अनुमान किया है”; वे उद्घोष करते हैं - “मैंने उस महान् पुरुष का साक्षात्कार किया है।”
भगवान् आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्म का ज्ञान इन्द्रियों का विषय नहीं है। वह न आँखों से देखा जा सकता है, न बुद्धि के तर्क से पूर्णतः प्राप्त होता है। गुरु के उपदेश, श्रवण, मनन और निदिध्यासन के द्वारा जब अविद्या का आवरण हटता है, तब आत्मा स्वयं अपने स्वरूप में प्रकाशित होती है। इसीलिए बृहदारण्यकोपनिषद् कहती है -
“ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्।” और छान्दोग्य उपनिषद् उद्घोष करती है - “तत्त्वमसि।”
“पुरुषं महान्तम्” सर्वव्यापक ब्रह्म !
“महान्तम्” शब्द ब्रह्म की अनन्तता का द्योतक है। यह कोई विशाल भौतिक आकार नहीं, बल्कि ऐसी सत्ता है, जो देश, काल और वस्तु की सभी सीमाओं से परे है।
भगवत्पादाचार्य आदि शंकराचार्य के अनुसार यही पुरुष समस्त विश्व का आधार है। वही प्रत्येक जीव में आत्मरूप से स्थित है और वही सम्पूर्ण विश्व के रूप में प्रकट होता हुआ भी उससे सर्वथा असंग रहता है।
इसलिए उपनिषद् कहती है - “सर्वं खल्विदं ब्रह्म।” “आदित्यवर्णम्” -स्वयंप्रकाश चैतन्य मन्त्र में परमात्मा को “आदित्यवर्णम्” कहा गया है। भगवान् आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि इसका अर्थ सूर्य के समान भौतिक प्रकाश नहीं है। यहाँ सूर्य केवल उपमा है। जिस प्रकार सूर्य स्वयं प्रकाशित होकर समस्त जगत् को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार ब्रह्म स्वयंप्रकाश चैतन्य है, जिसके कारण मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और सम्पूर्ण अनुभव-जगत् प्रकाशित होते हैं।
केनोपनिषद् इसी सत्य को व्यक्त करती है - “यदादित्यगतं तेजः…” और कठोपनिषद् कहती है -
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।।”
अर्थात् ब्रह्म किसी प्रकाश से प्रकाशित नहीं होता; उसी के प्रकाश से सब कुछ प्रकाशित है। “तमसः परस्तात्” अविद्या से परे; यहाँ “तमस्” का अर्थ भौतिक अन्धकार नहीं है, बल्कि अविद्या है।
भगवत्पादाचार्य आदि शंकराचार्य कहते हैं कि संसार का समस्त बन्धन इसी अविद्या से उत्पन्न होता है। आत्मा न कभी बँधती है, न मुक्त होती है; बन्धन केवल अज्ञान का अध्यास है। परमब्रह्म इस अविद्या से सर्वथा परे है। वह कभी अज्ञान से स्पर्शित नहीं होता।
जब साधक आत्मज्ञान प्राप्त करता है, तब अज्ञान उसी प्रकार नष्ट हो जाता है; जैसे - सूर्य के उदय से रात्रि का अन्धकार।
“तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति” आत्मज्ञान ही मृत्यु का अतिक्रमण है ! यह मन्त्र का चरम सिद्धान्त है। “तमेव” केवल उसी परमात्मा को। “विदित्वा” अपने ही स्वरूप के रूप में जानकर। “अतिमृत्युमेति” मृत्यु का अतिक्रमण कर जाता है। भगवान् आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि यहाँ मृत्यु का अर्थ केवल शरीर का अन्त नहीं, बल्कि जन्म-मरण का सम्पूर्ण संसार है। जब तक जीव स्वयं को शरीर मानता है, तब तक वह जन्म और मृत्यु का अनुभव करता है। किन्तु जब वह जान लेता है - “अहं ब्रह्मास्मि” तब उसके लिए मृत्यु का कोई अस्तित्व नहीं रहता।
भगवत्पादाचार्य भगवान आदि शंकराचार्य अपने भाष्य में स्पष्ट करते हैं कि आत्मज्ञान के अतिरिक्त कोई साधन परम मोक्ष प्रदान नहीं कर सकता। कर्म चित्तशुद्धि प्रदान करते हैं। उपासना मन को एकाग्र बनाती है। भक्ति अन्तःकरण को पवित्र करती है।किन्तु अविद्या का प्रत्यक्ष नाश केवल ब्रह्मज्ञान से होता है।
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काल की महिमा और जीवन की सार्थकता !
समय ईश्वर की अत्यंत अमूल्य देन है। धन खोकर पुनः प्राप्त किया जा सकता है, ज्ञान अभ्यास से फिर अर्जित किया जा सकता है, शक्ति भी प्रयत्न से लौट सकती है; परन्तु समय का एक क्षण, एक बार बीत जाने के बाद, फिर कभी लौटकर नहीं आता। इसलिए विवेकी पुरुष समय को केवल व्यतीत नहीं करता, वह उसे साधना, सेवा, सद्कर्म और आत्मोन्नति में पवित्र करता है।
भर्तृहरि जी ने वैराग्यशतक में काल की महिमा का सुंदर वर्णन किया है;
आदित्यस्य गतागतैरहरहः संक्षीयते
जीवितं;
व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते।
अर्थात् सूर्य के प्रतिदिन उदय और अस्त होने के साथ जीवन क्षीण होता जाता है, किन्तु अनेक कार्यों के भार में उलझा मनुष्य काल की गति को पहचान नहीं पाता।
महर्षि वेदव्यास जी ने महाभारत में कहा है;
कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः।
कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि बलवत्तरः॥
अर्थात् काल ही सृष्टि करता है, काल ही संहार करता है। सबके सो जाने पर भी काल जाग्रत रहता है; काल अत्यंत बलवान है।
कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः।
कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः॥
अर्थात् काल ही समस्त प्राणियों को परिपक्व करता है, काल ही उनका संहार करता है। सबके सो जाने पर भी काल जाग्रत रहता है; काल का अतिक्रमण किसी के लिए सम्भव नहीं।
भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन के अनुसार मानव जीवन का परम लक्ष्य केवल बाह्य उपलब्धियाँ नहीं, अपितु अपने नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त आत्मस्वरूप का साक्षात्कार है। संसार के विषय, सुख और परिस्थितियाँ परिवर्तनशील हैं; परन्तु आत्मा नित्य, अविनाशी और अखण्ड ब्रह्मस्वरूप है। जो साधक इस सत्य को समझता है, वह अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को व्यर्थ चिंताओं, क्षणभंगुर आकर्षणों और अहंकारजनित प्रवृत्तियों में नष्ट नहीं करता।
समय का वास्तविक मूल्य तभी प्रकट होता है, जब उसे उच्च, पवित्र और दिव्य उद्देश्य में लगाया जाए। निष्काम सेवा, स्वाध्याय, ध्यान, सत्संग, करुणा, कर्तव्यपालन और ईश्वर-स्मरण ये सभी समय को साधारण से असाधारण बना देते हैं। जब प्रत्येक कर्म शुद्ध भावना, समर्पण और लोकमंगल के संकल्प से किया जाता है, तब वही कर्म साधना बन जाता है।
श्रेष्ठ संकल्प ही दिव्य जीवन का प्रथम चरण है। मनुष्य का जीवन बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अंतःकरण में स्थित संकल्प की पवित्रता से दिशा पाता है। यदि संकल्प सत्य, धर्म, करुणा, आत्मज्ञान और परमात्म-प्राप्ति का हो, तो साधारण जीवन भी महान् आध्यात्मिक यात्रा में परिवर्तित हो जाता है।
आदि शंकराचार्य की दृष्टि में कर्म का त्याग नहीं, अपितु कर्म में आसक्ति और अहंकार का त्याग आवश्यक है। अपने कर्तव्यों का निष्ठा, कुशलता और समर्पणपूर्वक पालन करते हुए भी भीतर यह भाव बना रहे कि सब कुछ उसी परम ब्रह्म की सत्ता में, उसी की प्रेरणा से और उसी को अर्पित होकर घटित हो रहा है। ऐसी भावना से किया गया कर्म अंतःकरण को शुद्ध करता है और साधक को आत्मबोध के निकट ले जाता है।
अतः समय को पहचानिए, उसका सम्मान कीजिए और उसे शुभ, पवित्र, सार्थक तथा दिव्य कार्यों में समर्पित कीजिए। प्रत्येक क्षण को ईश्वर-स्मरण, आत्मचिंतन, निष्काम सेवा और सदाचार से आलोकित कीजिए। जीवन में उच्च लक्ष्य धारण कीजिए और उसे अटूट निष्ठा, अनुशासन तथा समर्पण के साथ साधते रहिए।
जब समय सत्य को अर्पित होता है, तब जीवन साधना बन जाता है। जब कर्म पूजा बन जाता है, तब अंतःकरण निर्मल हो जाता है। और जब निर्मल अंतःकरण में आत्मज्ञान का प्रकाश उदित होता है, तब साधक अनुभव करता है कि वह सीमित देह-मन नहीं, बल्कि वही अखण्ड, अनन्त, आनन्दरूप ब्रह्म है।
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।। ""श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
ततः परं ब्रह्म परं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितार-मीशं तं ज्ञात्वाऽमृता भवन्ति ।।७।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - तृतीयोऽध्यायः)
उपनिषदों का परम उद्देश्य मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराना है। भगवत्पादाचार्य भगवान् आदि शंकराचार्य के अनुसार जीव अपने स्वरूप से नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त एवं अद्वय ब्रह्म है; किन्तु अविद्या के कारण वह स्वयं को शरीर, मन और अहंकार के साथ अभिन्न मानकर संसार के बन्धनों में पड़ जाता है। आत्मविद्या ही इस अज्ञान का नाश कर मोक्ष का द्वार खोलती है।
इस मन्त्र में उपनिषद् उस परम ब्रह्म का निरूपण करती है, जो समस्त कारणों का भी कारण, अनन्त, सर्वव्यापक तथा प्रत्येक प्राणी के अन्तःकरण में आत्मरूप से स्थित है। “ततः परं ब्रह्म” का तात्पर्य उस नित्य, स्वयंप्रकाश और अकारण सत्य से है, जिससे सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है, जिसमें स्थित रहता है और अन्ततः जिसमें लीन हो जाता है। इसी सत्य को तैत्तिरीयोपनिषद् उद्घोष करती है - “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते…”
मन्त्र का “परं बृहन्तम्” पद ब्रह्म की अनन्तता का उद्घोष करता है। यह किसी भौतिक विस्तार का नहीं, अपितु उसकी अपरिमेय एवं अखण्ड सत्ता का संकेत है। इसलिए उपनिषद् कहती है - “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” तथा “सर्वं खल्विदं ब्रह्म।”
“सर्वभूतेषु गूढम्” यह बताता है कि परमात्मा प्रत्येक प्राणी के भीतर आत्मस्वरूप से विद्यमान है। वह कभी अनुपस्थित नहीं होता, किन्तु अविद्या के कारण अप्रकट प्रतीत होता है। "कठोपनिषद्" इसी सत्य का उद्घोष करती है - एषः सर्वेषु भूतेषु गूढोऽत्मा…”। आत्मा को देखने के लिए बाह्य नेत्र नहीं, अपितु निर्मल, सूक्ष्म और विवेकयुक्त बुद्धि की आवश्यकता है।
मन्त्र में परमात्मा को “विश्वस्यैकं परिवेष्टितारम्” कहा गया है, अर्थात् वही सम्पूर्ण विश्व का आधार और सर्वव्यापक ईश्वर है। भगवत्पादाचार्य भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार वही निर्गुण ब्रह्म मायोपाधि से ईश्वर के रूप में सृष्टि का कारण, पालनकर्ता और नियन्ता प्रतीत होता है। इसी भाव को ईशावास्योपनिषद् तथा भगवद्गीता उद्घोषित करती हैं - ईशावास्यमिदं सर्वम्” तथा “मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।”
इस मन्त्र का चरम सन्देश है - “तं ज्ञात्वाऽमृता भवन्ति”। अमृतत्व कर्म, यज्ञ या बाह्य उपलब्धियों से नहीं, अपितु आत्मज्ञान से प्राप्त होता है। जब साधक गुरु-उपदेश, श्रवण, मनन और निदिध्यासन के द्वारा अपने स्वरूप का साक्षात्कार करता है और अनुभव करता है - अहं ब्रह्मास्मि”, तब जन्म-मरण, भय, शोक और समस्त बन्धनों का अन्त हो जाता है। यही “ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति” का उपनिषद्-सिद्ध सत्य है।
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र अद्वैत वेदान्त का सार प्रस्तुत करता है। यह उद्घोष करता है कि परमब्रह्म ही समस्त जगत् का आधार, प्रत्येक प्राणी का अन्तरात्मा तथा एकमात्र परम सत्य है। भगवत्पादाचार्य भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार मोक्ष किसी नवीन वस्तु की प्राप्ति नहीं, अपितु अपने नित्य ब्रह्मस्वरूप की पहचान है। उसी आत्मसाक्षात्कार में अमृतत्व, शाश्वत शान्ति और परम आनन्द की उपलब्धि निहित है।
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श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद श्रीस्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री जी” के विभिन्न प्रवासों, आध्यात्मिक कार्यक्रमों एवं सार्वजनिक आयोजनों से सम्बंधित अद्यतन जानकारी हेतु कृपया नीचे दिए गए संपर्क सूत्रों से सम्पर्क करें।
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Note: For all information related to Pujya Acharya Shree Ji’s programmes in the United States of America, please contact:
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
याभिषुं गिरिशन्त हस्ते बिभर्ष्यस्तवे।
शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिंसीः पुरुषं जगत् ।।६।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - तृतीयोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र वैदिक रुद्रभावना का उपनिषदात्मक विस्तार है। इसमें साधक भगवान् रुद्र से प्रार्थना करता है कि हे गिरिशन्त ! आपके हाथ में जो बाण है, वह हमारे लिए कल्याणकारी हो जाए और किसी भी प्राणी को पीड़ा न पहुँचाए।
भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार यहाँ बाण ईश्वर की दण्डशक्ति का प्रतीक है, जो अधर्म, अविद्या और अहंकार के विनाश के लिए है। ईश्वर का दण्ड द्वेष से प्रेरित नहीं होता; वह कर्मफल का निष्पक्ष विधान और अन्ततः जीव के कल्याण का साधन है। इसलिए साधक यह नहीं चाहता कि ईश्वर न्याय छोड़ दें, बल्कि यह प्रार्थना करता है कि प्रभु की कृपा से उसके भीतर ऐसा विवेक जागे कि दण्ड की आवश्यकता ही न रहे।
‘गिरिशन्त’ और ‘गिरित्र’ शब्द परमात्मा के विश्वाधिष्ठाता और विश्वरक्षक स्वरूप को प्रकट करते हैं। अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से यह कोई पृथक् देवता नहीं, बल्कि वही निर्गुण ब्रह्म है, जो उपासना के लिए सगुण रुद्ररूप से प्रकट होता है। इस मन्त्र में ईश्वर का बाण गहरा दार्शनिक प्रतीक है। वह बाह्य हिंसा का नहीं, अपितु अविद्या, अहंकार, ममता और अधर्म के उन्मूलन का संकेत है। जैसे - शल्यचिकित्सक का उपकरण शरीर को काटकर भी जीवन की रक्षा करता है, वैसे ही ईश्वर का बाण जीव के अहंकार को भेदकर आत्मस्वरूप का प्रकाश करता है।
“शिवां तां कुरु” का अर्थ है - हे प्रभो ! दण्ड भी अनुग्रह बन जाए, दुःख भी अन्तःकरण-शुद्धि का साधन बन जाए और प्रतिकूलता भी आत्मजागरण का द्वार बन जाए। ज्ञानी हर परिस्थिति में ईश्वर की करुणा देखता है।
“मा हिंसीः पुरुषं जगत्” उपनिषद् की सार्वभौम करुणा का उद्घोष है। यहाँ साधक केवल अपनी रक्षा नहीं चाहता, बल्कि सम्पूर्ण जगत् के कल्याण की प्रार्थना करता है। यही भारतीय अध्यात्म की विश्वमंगलमयी दृष्टि है।
अद्वैत वेदान्त के अनुसार वास्तविक विनाश आत्मा का नहीं होता; नष्ट होता है केवल अज्ञान, देहाभिमान, कर्तृत्व, भोक्तृत्व और अहंकार। अतः यह मन्त्र बाह्य हिंसा से रक्षा की अपेक्षा आन्तरिक अज्ञान के विनाश की प्रार्थना है। आज के जीवन में भी यह मन्त्र अत्यन्त प्रासंगिक है। मनुष्य बाहरी अस्त्रों से अधिक भीतर के क्रोध, लोभ, भय, ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार से घायल है। इसलिए सच्ची प्रार्थना यही है; हे शिव ! मेरे भीतर की हिंसा को करुणा में, द्वेष को प्रेम में और अज्ञान को आत्मज्ञान में रूपान्तरित कर दीजिए।
अन्ततः ज्ञानी के लिए यह सम्पूर्ण प्रार्थना एक ही सत्य में विलीन हो जाती है - जो रुद्र है, वही शिव है; जो शिव है, वही ब्रह्म है; और वही ब्रह्म प्रत्येक जीव के अन्तरतम आत्मस्वरूप के रूप में स्वयं प्रकाशित है। अतः वास्तविक संरक्षण बाह्य अस्त्रों से नहीं, आत्मज्ञान से प्राप्त होता है। जब अविद्या का अन्धकार विदीर्ण होता है, तभी ईश्वर का बाण करुणा बन जाता है, दण्ड अनुग्रह बन जाता है, और साधक अनुभव करता है कि “नायमात्मा हन्यते, न हन्ति कञ्चन; स एव शिवः, स एव आत्मा, स एव परं ब्रह्म।” यही इस मन्त्र का परम अद्वैतार्थ, यही उसका दार्शनिक सौन्दर्य और यही उसका सनातन सन्देश है।
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Self-confidence illumines the path to success and fills life with courage, clarity, and inner strength. Place unwavering faith in the infinite power of the Divine and in His ever-flowing grace. With devotion, sincerity, alertness, and dedication, continue to fulfill your duties and responsibilities, knowing that every noble effort is blessed by the Supreme.
When each action is performed with enthusiasm, skill, humility, and purity of intention, the heart becomes peaceful and joyful. Such work does not remain merely worldly duty; it becomes worship, meditation, and a sacred offering to the Divine.
Always remember, you are not separate from the Omnipotent Supreme Being. The same divine power, wisdom, and light dwell within you. Realize your pure Self, your inherent strength, and your eternal, unconquerable spiritual nature. When the awareness of the true Self awakens, life becomes filled with boundless bliss, deep peace, fearlessness, and completeness.
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी ।
तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ।।५।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - तृतीयोऽध्यायः)
समस्त उपनिषदों का एक ही स्वर है - मनुष्य को उसके वास्तविक आत्मस्वरूप का बोध कराना। वे किसी नवीन सत्य की स्थापना नहीं करते, अपितु उस सनातन सत्य का आवरण हटाते हैं, जो प्रत्येक जीव के अन्तःकरण में नित्य, स्वयंप्रकाश और अखण्ड रूप से विद्यमान है। भगवत्पाद भगवान आदि शङ्कराचार्य के अनुसार समस्त उपनिषद् ब्रह्मविद्या के प्रतिपादक हैं और उनका परम प्रयोजन आत्मज्ञान है, क्योंकि अविद्या ही संसार-बन्धन का कारण तथा आत्मविद्या ही मोक्ष का एकमात्र साधन है।
यह मन्त्र केवल स्तुति या कृपा-याचना नहीं, अपितु उस साधक की गहन आध्यात्मिक प्रार्थना है, जो अनुभव कर चुका है कि बाह्य उपलब्धियाँ जीवन की परम सिद्धि नहीं हैं। वह उस दिव्य अनुग्रह की याचना करता है, जिसके प्रकाश में आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करती है।
यहाँ ‘रुद्र’ का अर्थ केवल संहारकर्ता देवता नहीं, अपितु अज्ञान का संहार करने वाला परमब्रह्म है। वही समस्त विश्व का आधार, नियन्ता और प्रत्येक जीव का आत्मस्वरूप है। मनुष्य का वास्तविक शत्रु बाह्य संसार नहीं, बल्कि अपने सत्यस्वरूप का विस्मरण है। अतः रुद्र का संहार वस्तुतः अविद्या का संहार है।
‘शिवा तनुः’ से अभिप्राय परमात्मा के उस कल्याणमय, करुणामय और अनुग्रहस्वरूप प्राकट्य से है, जो साधक के अन्तःकरण को आत्मज्ञान के योग्य बनाता है। ‘अघोरा’ का अर्थ है - जहाँ भय का कोई स्थान नहीं। अद्वैत वेदान्त के अनुसार भय का मूल कारण द्वैत है - “द्वितीयाद्वै भयं भवति।” आत्मानुभूति में जब द्वैत का लय होता है, तब भय स्वतः समाप्त हो जाता है।
‘अपापकाशिनी’ का तात्पर्य है - वह दिव्य प्रकाश जो पाप के मूल कारण, अर्थात् अविद्या, का नाश कर देता है। भगवत्पादाचार्य भगवान आदि शङ्कराचार्य के अनुसार आत्मज्ञान के उदय पर कर्तृत्वाभिमान और कर्मबन्धन स्वतः विलीन हो जाते हैं। ‘शान्तमयी तनु’ वह परम शान्ति है, जिसे माण्डूक्योपनिषद् “शान्तम् शिवम् अद्वैतम्” कहकर ब्रह्म का स्वरूप घोषित करती है।
‘गिरिशन्त’ का संकेत बाह्य कैलास से अधिक उस निर्मल, स्थिर और निष्कम्प अन्तःकरण की ओर है, जहाँ शिव का वास्तविक निवास है। अन्तिम पद ‘अभिचाकशीहि’ सम्पूर्ण मन्त्र का सार है - हे प्रभो ! अपने ज्ञानस्वरूप प्रकाश से हमारे अन्तःकरण को आलोकित कीजिए।” साधक न धन माँगता है, न स्वर्ग; वह केवल आत्मप्रकाश की याचना करता है।
भगवत्पादाचार्य भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार मोक्ष किसी नवीन वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि सदैव विद्यमान आत्मस्वरूप का अनावरण है। यही कारण है कि यह मन्त्र साधक और ईश्वर के संवाद से प्रारम्भ होकर अद्वैत की अनुभूति पर समाप्त होता है - जहाँ ज्ञात होता है कि जिसकी उपासना बाहर की जा रही थी, वही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्म स्वयं अपने आत्मस्वरूप के रूप में विद्यमान है।
अतः यह मन्त्र भय से रक्षा की नहीं, भय के कारणभूत अज्ञान के विनाश की प्रार्थना है; पाप-क्षमा की नहीं, पाप के मूल कारण अविद्या के निवारण की याचना है। यही इसका आध्यात्मिक संदेश है और यही भगवत्पाद भगवान आदि शङ्कराचार्य के अद्वैत वेदान्त का परम निष्कर्ष।
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह दिव्य मन्त्र समस्त आध्यात्मिक साधना का सार है। इसमें भय से सुरक्षा की याचना नहीं, अपितु भय के मूल कारण-अविद्या के विनाश की प्रार्थना है। इसमें पापों की क्षमा नहीं, पाप के कारणभूत अज्ञान के नाश की याचना है। इसमें बाह्य कल्याण नहीं, आत्मस्वरूप के परम कल्याण का आह्वान है।भगवत्पाद भगवान् आदि शंकराचार्य की अद्वैत दृष्टि में यह मन्त्र जीव को उसकी विस्मृत दिव्यता का स्मरण कराता है। जब परमात्मा अपनी शिवा, अघोरा, अपापकाशिनी और शान्तमयी सत्ता से अन्तःकरण को आलोकित करता है, तब ज्ञात होता है कि जिस रुद्र का दर्शन साधक बाहर खोज रहा था, वही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सच्चिदानन्द ब्रह्म उसके अपने आत्मस्वरूप के रूप में सदा से विराजमान था।
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।। "श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च
विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः।
हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं
स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ।।४।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - तृतीयोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का तृतीय अध्याय परमात्मा की अद्वितीय, सर्वव्यापक एवं सर्वाधार सत्ता का प्रतिपादन करता है। पूर्ववर्ती मन्त्र में उपनिषद् ने उद्घोष किया है - “एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः”, अर्थात् एकमात्र रुद्र ही समस्त जगत् का परम अधिष्ठाता है, उसके अतिरिक्त कोई दूसरी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। वर्तमान मन्त्र उसी सत्य को और अधिक स्पष्ट करता है।
भगवत्पादाचार्य भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार यहाँ “रुद्र” शब्द किसी सीमित देवता का नहीं, अपितु समस्त देवताओं के भी अधिष्ठानभूत परब्रह्म का वाचक है। उपनिषद् कहती है कि जो देवताओं की उत्पत्ति का कारण है, जो उनके अस्तित्व और शक्ति का आधार है, वही सम्पूर्ण विश्व का स्वामी है। इससे स्पष्ट होता है कि देवता भी स्वतन्त्र नहीं हैं; उनकी सत्ता भी परम ब्रह्म पर आश्रित है।
मन्त्र में परमात्मा को “विश्वाधिपः” कहा गया है। भगवत्पादाचार्य भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार इसका अर्थ यह नहीं कि वह किसी राजा की भाँति बाहर से शासन करता है, बल्कि सम्पूर्ण जगत् उसकी सत्ता पर आश्रित है। जैसे स्वप्न के सभी दृश्य स्वप्नद्रष्टा के चित्त पर आधारित होते हैं, वैसे ही यह सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म पर आश्रित है।
“रुद्र” शब्द का एक गूढ़ अर्थ है - “रुदं द्रावयति इति रुद्रः”, अर्थात् जो दुःख का नाश करता है - वही रुद्र है। अतः यहाँ रुद्र वह परम तत्त्व है, जो अविद्या, शोक और संसार-बन्धन का विनाश करता है। उसके ज्ञान से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करता है।
मन्त्र में परमात्मा को “महर्षिः” भी कहा गया है। भगवत्पादाचार्य भगवान आदि शंकराचार्य इसके द्वारा उसकी सर्वज्ञता का प्रतिपादन करते हैं। वह समस्त भूत, वर्तमान और भविष्य का ज्ञाता है तथा प्रत्येक जीव के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित है।
इसके पश्चात् उपनिषद् कहती है - “हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वम्”। हिरण्यगर्भ सृष्टि की प्रथम प्रकट चेतना तथा समष्टि सूक्ष्म सत्ता का नाम है। किन्तु उपनिषद् स्पष्ट करती है कि हिरण्यगर्भ भी परम कारण नहीं है; उसका भी कारण वही परब्रह्म है। इस प्रकार यह मन्त्र ब्रह्म को हिरण्यगर्भ से भी परे और समस्त सृष्टि का आदिकारण सिद्ध करता है।
मन्त्र का अन्त अत्यन्त मार्मिक प्रार्थना से होता है - “स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु”, अर्थात् वह परमात्मा हमें शुभ बुद्धि से युक्त करे। भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार यहाँ शुभ बुद्धि का अर्थ केवल नैतिक सद्बुद्धि नहीं, बल्कि वह विवेकयुक्त बुद्धि है, जो नित्य और अनित्य, आत्मा और अनात्मा का भेद कर सके तथा साधक को ब्रह्मज्ञान की ओर अग्रसर करे। यही बुद्धि मोक्ष का द्वार है।
अतः यह मन्त्र शाङ्करवेदान्त के अनुसार इस सत्य का उद्घोष करता है कि परमात्मा ही देवताओं का कारण, विश्व का अधिपति, हिरण्यगर्भ का भी उत्पादक तथा समस्त ज्ञान का स्रोत है। वही दुःख का नाश करने वाला रुद्र है और वही साधक को शुभ बुद्धि प्रदान कर आत्मज्ञान एवं मोक्ष के पथ पर अग्रसर करता है।
यही इस मन्त्र का सार है - परमात्मा ही समस्त कारणों का कारण, समस्त शक्तियों का आधार और समस्त अस्तित्व का परम अधिष्ठान है; वही हमें शुभ बुद्धि प्रदान कर सत्य और मोक्ष की ओर ले जाए।
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