यूपी में 5 हजार 695 ऐसे स्कूल हैं जहां सिर्फ एक-एक शिक्षक हैं। सुधार की सबसे ज्यादा जरूरत तो यही हैं।
कोई अभिभावक अपने बच्चों को ऐसे स्कूलों में क्यों भेजेगा जहां पर्याप्त शिक्षक ही नहीं हैं।
यदि गरीबों की "शिक्षा" के लिए सरकारें वास्तव में गंभीर रही होतीं तो प्रत्येक न्याय पंचायत पर न्यूतनम एक राजकीय इंटर कॉलेज और ब्लॉक स्तर पर एक सरकारी डिग्री कॉलेज संचालित करा चुकी होतीं।
#SaveVillageSchools
आपको यह पता है कि यूपी सरकार कम बच्चों वाले प्राइमरी स्कूलों को दूसरे स्कूलों में मर्ज करने जा रही। लेकिन शायद आपको न पता हो 2017-18 से अब तक 28 हजार स्कूल मर्ज किए जा चुके हैं। इसका नुकसान यह हुआ कि 28 हजार से ज्यादा प्रिंसिपल के पद खत्म हो गए।
एक बात और, 2021-22 में प्राइमरी स्कूलों में छात्रों का नामांकन 1 करोड़ 91 लाख तक पहुंच गया था। जो अब घटकर 1 करोड़ 49 लाख पर आ गया है। यानी 4 साल में 42 लाख छात्र कम हो गए।
विचार यहां होना चाहिए कि आखिर स्कूलों में बच्चों की संख्या कम क्यों हो रही?
प्राइमरी स्कूल इस देश का प्राण हैं. अगर कोई यह कहते हुए बंद करने की सिफारिश कर रहा कि टीचर पढ़ाते नहीं, स्कूल में बच्चे नहीं आते, सरकारी खर्च बहुत ज्यादा है, तो वह गलत कह रहा।
प्राइमरी स्कूलों की बदहाली की वजह से ही प्राइवेट स्कूल मोटा रहे। अगर सरकारी स्कूल पूरी तरह से बदहाल हो जाए तो प्राइवेट स्कूल मनमानी पर उतर आएंगे। फिर जो दिहाड़ी मजदूर है, चना-चूरन बेचने वाले लोग हैं वह अपने बच्चों को प्राइवेट में नहीं पढ़ा पाएंगे। फिर इनकी आबादी पूरे देश में 50% से अधिक है।
आप प्राइमरी की आलोचना करते हुए अक्सर अपने गांव को देखते हैं, आपका गांव संपन्न हो सकता है, कमाई के मामले में लोग आगे आ गए हों, लेकिन सुदूर किसी एरिया में जाइए। आप देखेंगे कि पढ़ाई की स्थिति अभी भी भयावह है। लोगों के पास आज भी खाने की व्यवस्था नहीं है। पढ़ाई को लेकर जागरुकता नहीं है।
सरकारी टीचर किसी भी राज्य का सबसे जरूरी एसेट्स है। सारे बौद्धिक लोग हैं। राज्य में जो भी लिखा-पढ़ी वाली चीजें होती हैं उनमें आप इन्हीं की सेवा लेते हैं। आप पुलिस या फिर किसी और सर्विस विभाग से काम नहीं ले पाएंगे।
आप सरकारों का शिक्षा बजट पर खर्च पता करिएगा। आपको पता चलेगा कि यह कुल बजट का 10% भी नहीं है। मिड-डे-मील पर आज भी प्रति बच्चा 5 रुपए से ज्यादा खर्च नहीं हो रहा। जबकि आपको टीचर की सैलरी ज्यादा लगती है।
आप एक चीज और देखिए, जिन स्कूलों में टीचर्स या फिर वहां के ग्राम प्रधान ने अपने से पैसा लगाया, स्कूल को सजाया, बिजली, कुर्सी-मेज, पंखे और पानी की अच्छी व्यवस्था की, वहां बच्चों की संख्या बहुत अधिक मिलेगी। जबकि यह सब व्यवस्था करने का काम शिक्षक का नहीं है।
जरूरी है कि स्कूलों की बेहतरी पर काम किया जाए। कुर्सी-मेज, बिजली, पीने की व्यवस्था बेहतर करना सुनिश्चित किया जाए। इंग्लिश मीडिया में तब्दील किया जाए। स्कूल को बारातघर न बनाया जाए। ताश खेलने का अड्डा न बनाया जाए। कम से कम 4 टीचर्स की व्यवस्था की जाए। तब आप देखिए, लोग कैसे अपने बच्चों का एडमिशन करवाने के लिए लाइन लगाकर खड़े नजर आएंगे।
यह वीडियो कुछ महीने पहले का है। लखनऊ के एक स्कूल का है। देखिए।