दिल्ली पुलिस के परिवार वालों का छलका दर्द.
एक दिल्ली पुलिस वाले कि बेटी ने कहा :-
- जिस संसद में नेता पुलिस वालों को क्रिमिनल बोल रहे हैं, उसी पार्लियामेंट को प्रोटेक्ट करने के लिए मेरे पापा घायल हुए
इन पुलिस वालों के बच्चे भी Gen Z है, शर्म कीजिए राहुल गाँधी। #WeStandWithDelhiPolice
हरिद्वार में लगभग 40 साधु पकड़े गए जो बिरयानी खाते थे.
छान बिन के बाद पता चला कि...
ये सब मु@ल्ले थे.
सनातन को बदनाम करने का हर प्रकार साजिश चलाते है
ये हलाला पुत्र
कॉकरोचों ने 'जंतर मंतर' पर बहुत गंदगी फैलाई, ना बाद में इनमें से किसी ने साफ सफाई की, ये बदलेंगे देश को, जिनमे बेसिक अक्ल तक नही है
https://t.co/m4aD8JPRXE
@elonmusk Education, urbanization, career priorities, and the rising cost of raising children tend to reduce fertility rates.
Many developing countries are seeing the same trend.
उदास हूँ…..
ये दो लफ़्ज़ कहने में हम क्यूँ इतना झिझकते हैं?
हँसी तो बाँट देते हैं सारी दुनिया में,
पर अपने दर्द पर ताला क्यूँ जड़ देते हैं?
अपनों की बज़्म में बैठकर भी
हम अपनों के अपनेपन को क्यूँ तरसते हैं?
एक दस्तरख़्वान पर होते हुए भी
दिल से दिल का फ़ासला क्यूँ रखते हैं?
आँसू आँखों से क्यूँ खुलकर नहीं बरसते हैं?
किसके डर से हमने बरसात रोक रखी है?
बादल भी तो रो लेते हैं जी भर के,
फिर हम इंसान होकर ख़ामोश क्यूँ रहते हैं?
क्यूँ गैरों की महफ़िलों में हम हमदर्द ढूँढते हैं?
जो अपने हैं, उनसे ही परदा क्यूँ करते हैं?
बाहर की तालियों में सुकून तलाशते हैं,
और घर के सन्नाटे से मुँह मोड़ लेते हैं?
क्यूँ घरों की देहरी को चूमने से चूकते हैं?
वो चौखट जो दुआएँ देती है,
उसे लाँघते वक़्त सर क्यूँ नहीं झुकाते हैं?
माँ की हथेली, बाप का साया,
इन जन्नतों से नज़रें क्यूँ चुराते हैं?
सोचो, क्यूँ जाते को हम रोक नहीं पाते?
“रुक जाओ” कहने से अहंकार टूट जाएगा क्या?
एक “ठहरो” बोल दो तो शायद,
कई रिश्ते बिखरने से बच जाते हैं।
क्यूँ प्रेम के ढाई आखर भी हँसकर बोल नहीं पाते?
माफ़ करना , शुक्रिया , तुमसे प्यार है…!!
इन तीन लफ़्ज़ों का बोझ क्यूँ नहीं उठता ज़ुबान से?
जबकि ताने, शिकायतें, शिकवे
पलभर में हज़ार बोल जाते हैं।
क्यूँ दिलों पर नफ़रतों के छाए गहरे साये हैं?
किसने हमारे घरों में ये अँधेरा भर दिया?
हमने ही तो चिराग़ बुझाए हैं,
फिर उजाले की दुहाई क्यूँ देते हैं?
दिल दुखाकर हम किसी का क्या ही पाए हैं?
जीतकर भी हार ही तो जाते हैं।
किसी की आँख नम करके
हम किस ख़ुशी के हक़दार रह जाते हैं?
उठो, चलो आज झिझक तोड़ दें।
उदास हूँ…कहकर देखो,
शायद कोई गले लगा ले।
माफ़ करना… बोलकर देखो,
शायद कोई मुस्कुरा दे।
क्योंकि दिल तोड़ना आसान है,
“स्वरा” दिल जोड़ना ही इंसानियत है।✨♥️
#રાધાસ્વરા
#बज़्म