अरावली मुद्दे पर पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री द्वारा हाल ही मे�� दी गई "स्पष्टीकरण" से और भी कई सवाल और संदेह पैदा होते हैं।
1. उनका कहना है कि अरावली के 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में से फिलहाल केवल 0.19% ह��स्सा ही खनन पट्टों के अंतर्गत है। लेकिन यह भी लगभग 68,000 एकड़ होता है-जो कि अपने आप में एक बहुत बड़ा क्षेत्र है।
2. हालांकि 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर का आंकड़ा भ्रामक है। इसमें चार राज्यों के 34 अरावली ज़िलों का पूरा भौगोलिक क्षेत्र शामिल कर लिया गया है। यह एक गलत आधार (denominator) है, क्योंकि सही आधार तो इन ज़िलों के भीतर वास्तव में अरावली के अंतर्गत आने वाला भूभाग होना चाहिए। यदि अरावली के वास्तविक क्षेत्र को आधार माना जाए, तो 0.19% का आंकड़ा बहुत कम आकलन साबित होगा।
3. 34 ज़िलों में से जिन 15 ज़िलों के लिए आंकड़े सत्यापित किए जा सकते हैं, उनमें अरावली क्षेत्र पूरे भूभाग का लगभग 33% है। नई परिभाषा के तहत इन अरावली क्षेत्रों में से कितना हिस्सा बाहर कर दिया जाएगा और खनन व अन्य विकास कार्यों के लिए उपलब्ध कराया जाएगा-इस बा��े में किसी भी तरह की स्पष्टता नहीं है।
4. अगर मंत्री जी के सुझाव के अनुसार स्थानीय प्रोफाइल को आधार बनाया जाता है, तो 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाली कई पहाड़ियाँ भी संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएँगी।
5. संशोधित परिभाषा के बाद दिल्ली-एनसीआर में अरावली की अधिकांश पहाड़ी इलाके रियल एस्टेट विकास के लिए खोल दी जाएँगी, जिससे पर्यावरण पर दबाव और बढ़ेगा।
6. खनन की अनुमति देने के उद्देश्य से सरिस्का टाइग�� रिज़र्व की सीमाओं को फिर से परिभाषित करने की अगुवाई कर रहे मंत्री जी इस बुनियादी चिंता को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं कि मूल रूप से आपस में जुड़े हुए पारिस्थितिक तंत्र का विखंडन उसके पारिस्थितिक मूल्य को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाता है। ऐसे विखंडन के दुष्परिणाम देश के अन्य हिस्सों में पहले से ही देखे जा रहे हैं।
अरावली हमारी प्राकृतिक धरोहर का हिस्सा हैं और उनका पारिस्थितिक महत्व अमूल्य है। उन्हें व्यापक पुनर्स्थापन और ठोस संरक्षण की आवश्यकता है। फिर मोदी सरकार उन्हें फिर से परिभाषित करने पर क्यों तुली हुई है? किस उद्देश्य से? किसके लाभ के लिए? और वन सर्वेक्षण ऑफ इंडिया जैसी पेशेवर संस्था की सिफारिशों को जानबूझकर नज़रअंदाज़ कर किनारे क्यों किया जा रहा है?