भारतीय लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया हमेशा से विवादों का केंद्र रही है। आजकल बूथ कैप्चरिंग और डाटा कैप्चरिंग के बीच अंतर को लेकर खास चर्चा हो रही है। दोनों ही तरीके लोकतंत्र को प्रदूषित करते हैं, लेकिन नियंत्रण की दृष्टि से इनमें बड़ा फर्क है।
बूथ कैप्चरिंग को सुरक्षा बलों, सीसीटीवी और सख्त निगरानी से रोका जा सकता है, जबकि डाटा कैप्चरिंग यानी ईवीएम या इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में कथित हैकिंग और मैनिपुलेशन को रोकना तकनीकी और प्रक्रियागत रूप से ज्यादा जटिल है।
विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस, लगातार ईवीएम पर सवाल उठा रहे हैं और हारने वाली पार्टियां ईवीएम को दोषी ठहराती हैं। बूथ कैप्चरिंग 1980-90 के दशक में भारत की चुनावी सच्चाई थी।
इसमें गुंडे या पार्टी कार्यकर्ता पोलिंग बूथ पर कब्जा कर लेते, मतदान अधिकारियों को धमकाते और मतपत्रों को जबरन भर देते थे। ईवीएम लाने का मुख्य कारण यही था क्योंकि ईवीएम में प्रति मिनट सिर्फ 4-5 वोट ही दर्ज हो सकते हैं, जिससे बड़े पैमाने पर फर्जी वोट डालना असंभव हो जाता है।
वहीं डाटा कैप्चरिंग आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युग का रूप है, जिसमें कथित तौर पर ईवीएम के सॉफ्टवेयर या डाटा स्टोरेज में छेड़छाड़ कर वोटों को बदलने का आरोप लगाया जाता है। यह बिना शारीरिक कब्जे के, चुपके से हो सकता है।
भारत के ईवीएम तीन मुख्य हिस्सों से बने हैं—बैलट यूनिट, कंट्रोल यूनिट और वीवीपीएटी। मतदाता बैलट यूनिट पर उम्मीदवार का बटन दबाता है, कंट्रोल यूनिट इसे रजिस्टर करती है और वीवीपीएटी तुरंत एक पेपर स्लिप प्रिंट करता है, जिसे मतदाता 7 सेकंड तक देख सकता है।
ईवीएम में कोई इंटरनेट, मॉडेम या नेटवर्क कनेक्शन नहीं होता। यह स्टैंड-अलोन माइक्रोकंट्रोलर पर चलता है। 2004 से पूरे देश में इस्तेमाल हो रहे ईवीएम ने बूथ कैप्चरिंग पर लगभग पूर्ण विराम लगा दिया है।
ईवीएम की उपयोगिता कई गुना है। यह तेज गिनती सुनिश्चित करता है, अमान्य वोट शून्य हो जाते हैं, लागत प्रभावी है और पुन: उपयोग योग्य है। चुनाव आयोग के अनुसार, यह भारतीय चुनावों को ज्यादा स्वच्छ और कुशल बनाता है।
हालांकि विपक्ष का कहना है कि ईवीएम ब्लैक बॉक्स है, इसका सोर्स कोड सार्वजनिक नहीं है और हैकिंग का खतरा बना रहता है। अंतरराष्ट्रीय अनुभव इस मामले में महत्वपूर्ण है। जर्मनी, नीदरलैंड्स, आयरलैंड, बांग्लादेश और कुछ अन्य देशों ने पारदर्शिता की कमी, हैकिंग के खतरे और जन विश्वास की कमी के कारण डायरेक्ट इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को प्रतिबंधित या छोड़ दिया है।
भारत ने वीवीपीएटी जोड़कर इस कमी को दूर करने का प्रयास किया है, लेकिन पूर्ण 100 प्रतिशत वेरिफिकेशन की मांग अभी भी उठती रहती है। भारत में मतपत्र से मतदान कानूनी और व्यावहारिक रूप से संभव है, लेकिन अवांछनीय माना जाता है।
मतपत्र पूरी तरह दृश्यमान होता है, लेकिन इससे बूथ कैप्चरिंग और बैलट स्टफिंग का पुराना खतरा वापस लौट सकता है। 98 करोड़ मतदाताओं वाले देश में मतपत्रों की छपाई, भंडारण, परिवहन और गिनती का कार्य बेहद जटिल और महंगा होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल में मतपत्र पर लौटने की मांग खारिज कर दी है। ईवीएम पूरी तरह परफेक्ट नहीं है, लेकिन भारत के पैमाने पर यह सबसे व्यावहारिक, सुरक्षित और पारदर्शी विकल्प साबित हुआ है।
वीवीपीएटी ने मतदाता को अपना वोट देखने का अधिकार दिया है। असली समाधान अधिक पारदर्शिता, मजबूत रैंडम ऑडिट, सोर्स कोड की समीक्षा और सभी दलों का सहयोग है।
लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब हम संदेह को तथ्यों और सुधारों से पार करें, न कि केवल राजनीतिक आरोपों से। ईवीएम ने बूथ कैप्चरिंग को रोका है, अब डाटा कैप्चरिंग के संदेह को और बेहतर ऑडिट और तकनीकी अपग्रेडेशन से दूर करने का समय है। भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा है—इसे और मजबूत बनाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
@ECISVEEP@BJP4India@INCIndia
एक छोटा सा सवाल @sachin_rt और उनके @STF_India से…
वे बताएँ कि किन किन गाँवों में कितनी-कितनी लागत से कब से वे खेल मैदान का विकास करवा रहे हैं?
ताकि यह जानकारी बाहर आ सके कि तेंदुलकर फ़ाउंडेशन की ख़र्च के बाद विभाग कहीं इसी मद की राशि को काग़ज़ में खपा तो नहीं रहा है?
विश्व क्रिकेट के महानतम बल्लेबाज़ भारत रत्न सचिन तेंदुलकर दो दिन पहले दंतेवाड़ा ज़िले के छिंदनार गाँव पहुँचे। यहाँ उन्होंने अपने फ़ाउंडेशन के बैनर तले खेल व खिलाड़ियों के विकास के लिए किए जा रहे प्रयासों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि उनके फ़ाउंडेशन के द्वारा 50 गाँवों में मैदान तैयार करवाया गया है।
छत्तीसगढ़ में जिला खनिज न्यास से प्राप्त राशि के आधार पर कोरबा के बाद दंतेवाड़ा ज़िले का नाम सबसे ज़्यादा कमाई वाला माना जाता है। यह राशि हज़ार करोड़ के आसपास की है। वह भी प्रति वर्ष!
यदि इसके बाद भी ज़िले के स्कूलों में खेल मैदान के विकास के लिए तेंदुलकर फ़ाउंडेशन के सहायता की ज़रूरत पड़ी है तो सवाल उठता है।
यह सवाल छत्तीसगढ़ सरकार की व्यवस्था पर भी उठता है। क्या सरकारी स्कूलों में खेल मैदानों के विकास और व्यवस्था के लिए राशि की कमी है? यदि यह कमी है तो ऐसा क्यों है?
मेरे मन में सवाल बीते दो दिनों से लगातार उठ रहा है। यह समझ नहीं पा रहा कि सचिन तेंदुलकर अपने परिवार के साथ दंतेवाड़ा ज़िले के छिंदनार पहुँचे पूरा आयोजन सरकार प्रायोजित ही रहा। यानि इस कार्यक्रम के लिए सरकार ने ही सारी व्यवस्थाएँ की।
नक्सल मुक्त घोषित हो चुके बस्तर संभाग में सचिन तेंदुलकर का सपरिवार आना पूरी दुनिया के सामने इसकी नई छवि गढ़ने में सहायक है पर यदि यह संदेश दुनिया के सामने जाए कि आदिवासी बहुल प्रदेश के सर्वाधिक आकांक्षी ज़िले में खेल मैदान तक के लिए सरकार किसी व्यक्तिगत फ़ाउंडेशन की सहायता पर निर्भर है तो विचारणीय होना चाहिए…
उन्होंने कहा “उनका फाउंडेशन बस्तर के गांवों में केवल 50 नहीं, बल्कि 100 से ज्यादा खेल मैदानों के निर्माण में सहयोग करेगा। उन्होंने कहा कि जब उन्हें पता चला कि यहाँ बच्चों में टैलेंट है लेकिन खेलने के लिए बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं, तो उन्हें अपना बचपन याद आ गया।”
मुझे उनका यह कहना चुभ रहा है। क्योंकि केंद्र और राज्य सरकार की कई योजनाएं जिसमें हर बरस सैकड़ों करोड़ रुपये केवल इसी नाम पर खर्च किए जा रहे हैं… इसके बाद तेंदुलकर यदि दुनिया के सामने सरकार की कमियों पर बात कर रहे हैं तो सरकार ज़मीन पर किए जा रहे खर्च की निगरानी बढ़ाए आख़िर सरकार की इज़्ज़त का सवाल है…
छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में सामूहिक बलात्कार की शर्मनाक घटना
छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के भैरमगढ़ थाना क्षेत्र में 11 अप्रैल 2026 की रात एक नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार की घृणित घटना सामने आई है। पीड़िता अपने परिचित युवक के बहाने घर से घूमने निकली थी, जिसने उसे फुसलाकर सुनसान जंगल वाले इलाके में ले जाकर पहले खुद दुष्कर्म किया और फिर अपने चार अन्य साथियों को बुलाकर सामूहिक बलात्कार का कुकृत्य किया।
इस जघन्य अपराध में पांच आरोपी शामिल हैं, जिनमें अंकित परबुलिया, लक्ष्मीनाथ लेकाम, सुनील परबुलिया, जातवेद मोड़ियाम और एक नाबालिग शामिल हैं। भैरमगढ़ पुलिस ने कार्रवाई करते हुए सभी पांचों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है।
पीड़िता को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उसका इलाज चल रहा है। पुलिस ने पॉक्सो एक्ट तथा भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। आरोपीयों को दंतेवाड़ा कोर्ट में पेश किया जाएगा, जबकि नाबालिग आरोपी को किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष रखा जाएगा।
यह घटना स्थानीय स्तर पर आक्रोश का विषय बनी हुई है और पुलिस आगे की जांच में जुटी हुई है। मोबाइल और इंटरनेट के इस दौर में अपराध की बुनियाद तैयार हो रही है… सब कुछ नियंत्रण से बाहर है…
मुझे @kunalkamra88 से प्यार हो गया है।
क्यों पता है?
दरअसल जिस दौर में चूहा समझकर पिंजरे से दूर भागते नेता, अभिनेता, साहित्यकार, कवि, न्यायाधीश, सिस्टम से जुड़ा हर वह शख़्स जब दूसरे किसी पिंजरे में समाकर खुद को खुदा समझने में लगा है… यहाँ तक कि मैं भी…
तब कुछ ही ऐसे लोग ज़िंदा दिखाई दे रहे हैं जो ना तो पिंजरा पिंजरा खेल रहे हैं और ना ही अपनी संवैधानिक सीमाओं को लाँघ रहे हैं… मैं यह साफ़ कर देना चाहता हूँ कि सरकार की आलोचना संवैधानिक सीमाओं का लाँघना नहीं होता है..
सरकार की रीति, नीति, नीयत पर सवाल करना, व्यंग्य करना भी सीमा लाँघना नहीं होता है…
मुझे नहीं लगता कि एकनाथ शिंदे को लेकर की गई टिप्पणी झूठ है और माफ़ी मांगने लायक़ है। कुनाल कामरा ने बिलकुल सही किया… हर तरह से माफ़ी माँगने से इंकार कर दिया..
वैसे भी कुनाल कामरा हो या कोई ऐसा व्यक्ति जो सरकार पर, मुखिया पर, नेतृत्व करने वाले पर तंज कसता है, आलोचना करता है वह मेरी नज़र में उन नेताओं से लाख दर्जे का बेहतर है जो अपने लाभ और संवैधानिक सुख प्राप्ति के लिए अपने बोले गए शब्दों से मुकर कर मुस्कुराते घूम रहे हैं…
@DrKumarVishwas को कई रूपों में देखता हूँ अब लेटेस्ट लंबा टीका लगाकर प्रवचन देने वाले अवतार के साथ… करोड़ों रूपए राम नाम से बनाने के लिए अपने द्वारा घोषित तमाम मर्यादाओं को लाँघना कोई इनसे सीखे… ऐसे में कभी कुमार विश्वास का पहले मेरी पसंद होने पर मुझे खीझ आती है…
मुझे लगता है मैं लोगों को पहचानने में सबसे नालायक हूं…
ऐसे समय में तमाम दबावों से लड़ते जूझते कुनाल कामरा का माफ़ी नहीं माँगना करोड़ों लोगों के लिए रास्ता खोलने वाला है…
ग़लत को ग़लत कहने में ही सब की भलाई है मलाई के लिए जीभ लपलपाते तो हज़ारों कुत्ते भौंकते, दुम हिलाते रात दिन चैनलों में दिखाई दे ही रहे हैं…
अब जरा सोचिए विशेषाधिकार समिति क्या सजा सुना सकती है? सैकड़ों हत्याएं करने वाले पुनर्वासित किये जा रहे हैं… बलात्कारी चुनाव प्रचार के लिए पैरोल पर छूट रहे हैं… संगीन अपराधों के आरोपी पार्टी के झंडों में छिप रहे हैं… सच कहने वाले निशाने पर लिए जा रहे हैं ऐसे समय में एकनाथ शिंदे को गद्दार कहकर अपनी ज़ुबान पर टीके रहने के लिए कुनाल कामरा का आभार.., भाई मुझे तुमसे प्यार हो गया है…
#EknathShinde #kunalkamra #kumarvishwas
फ़रवरी 2006
स्थान दरबागुड़ा (कोंटा) अब जिला सुकमा तब दंतेवाड़ा जिला छत्तीसगढ़…
अख़बार दैनिक भास्कर के प्रथम पृष्ठ पर लीड प्रकाशित इस समाचार में आपको बस्तर के सिसकने की आवाज़ सुनाई देगी… तब आज जैसे हालात नहीं थे। ना डिजिटल मीडिया थी और ना ही वैसे स्मार्ट फ़ोन… बहुत कठिन हुआ करता था समाचार संकलित करना… रायपुर में संपादक और पूरी टीम की गहरी छानबीन के बाद एक-एक शब्द जोड़े घटाए जाते थे। तब कहीं जाकर अख़बार में अपनी ख़बर छपी हुई दिखाई देती थी।
इस ख़बर में हमने मानवीय दृष्टिकोण को भी रेखांकित किया है। क्रूरता को शब्दों में पिरोया है। 2005 में सलवा जुडूम के महज़ आठ महीने बाद की या घटना है। जून 2005 में यह अभियान अब के बीजापुर ज़िले से शुरू हुआ था। महेंद्र कर्मा ने इसे दक्षिण पश्चिम बस्तर से दक्षिण में शिफ़्ट कर दिया था।
बीजापुर विधायक राजेंद्र पामभोई और कोंटा विधायक कवासी लखमा इस अभियान के खिलाफ थे। दोनों सलवा जुडूम की सभा और रैलियों से ख़ुद को दूर रखने की कोशिश करते थे। जब फ़रवरी 2006 में दरबागुड़ा में नक्सलियों ने अटैक कर दिया जिसमें आदिवासियों की मौतों के बाद दोनों ने काँग्रेस के भीतर इस अभियान के ख़िलाफ़ दबाव बनाना शुरू कर दिया।
बीस बरस पहले की इस घटना की रिपोर्ट कॉपी आज़ भांजे Adarsh ने मुहैया करवाई…
@AdarshP73463280@Amit_MishraaCG@AwadheshMishra_@rashmidTOI@BastarManish
#MilitaryCivilFusion#WholeOfNationApproach
A delegation of 14 Journalists from Chhattisgarh visited the HQ Western Command, Chandigarh, as part of the PIB Media Tour. The delegation interacted with Brig GS Bedi, BGS IW, HQ Western Command and other officers. The visit aimed to strengthen the media engagement with Indian Army, while fostering informed, accurate and responsible reporting. The programme also included a visit to the Western Command Museum and screenings of movies on the history and operational role of Western Command, including its contributions during the 1965 & 1971 wars and Operation Sindoor.
@adgpi@PIB_India