लवणेन भोज्यम का स्वाद चख रही कांग्रेस?
इंदौर में राहुल गांधी के मंच पर जो हुआ, उससे मोदी वार्ड के मरीज 'पुलकित' हैं. लेकिन अज्ञानता में वे उस मोदी को ही मजबूत कर रहे हैं, जो पहली बार नैरेटिव में थोड़ा पीछे दिखे थे. ऐसा इसलिए क्योंकि राहुल गांधी के मंच पर वह हर शख्स जगह पा रहा है, जो भारत, हिंदुत्व और भारतीयता के खिलाफ है. यदि ऐसा लगातार चलता रहा तो मोदी से नाराज हुए लोग किसी नमूने के मजबूत होने की आहट भर से फिर सक्रिय हो जाएंगे. चाहे चाय की दुकानों पर जाति देखकर कप देने वाली बात हो या फिर मनु स्मृति का फेक नैरेटिव या फिर पुलकित मनी जैसे दिमागी दिवालिये के साथ मिलकर एक बुजुर्ग महिला की मदद का मजाक उड़ाना हो. राहुल गांधी ने हर तरीके से लवणेन भोज्यम वाली बात की है. इस सूक्ति को जिस अश्लीलता से उनका ईकोसिस्टम शेयर करता है, वह भी बताता है कि वे भारत की संस्कृत भाषा से लेकर संस्कृति तक से कितना ईर्ष्या करते हैं. अनजाने में ही सही उनका लवणेन भोज्यम ही हो जाएगा.
अङ्गेन गात्रं नयनेन वक्त्रं न्यायेन राज्यं लवणेन भोज्यम्।
धर्मेण हीनं खलु जीवितं च न राजते चन्द्रमसा विना निशा॥
इसका सहज अर्थ हुआ- जिस प्रकार हाथ-पैर के बिना शरीर, आँखों के बिना चेहरा, न्याय के बिना राज्य और नमक के बिना भोजन फीका लगता है, चन्द्रमा के बिना रात शोभा नहीं देती उसी प्रकार अच्छे आचरण के बिना मनुष्य का जीवन भी शोभित नहीं होता.
कांग्रेसी भी आचरण की कमी से जूझ रहे हैं और इसका स्वाद लवणेन भोज्यम जैसा ही होगा. See less
प्रचार भी उसी का सफल होता है, जिसके उत्पाद में कुछ दम होता है. निश्चित ही बीता कुछ समय भाजपा और उसकी राजनीति के लिए थोड़ी चुनौती वाला रहा है. लेकिन संगठन, विचारधारा और जमीन पर काम हमेशा विपरीत परिस्थिति से उबार लाता है. पहले पंजाब यूनिवर्सिटी में जीत और अब दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ में ABVP की जीत एक उदाहरण है कि युवा किधर हैं. विशुद्ध छात्र किधर हैं. मैंने जंतर मंतर पर चल रहे विरोध के दौरान भी कहा था कि यह मोदी वार्ड के मरीजों का एक जमावड़ा है और इसे जेन जी या पीढ़ीगत समस्या जैसा रूप नहीं देना चाहिए. दो छात्र संघ चुनावों ने इसे स्पष्ट किया है. किसी की बदजुबानी जनता का स्वर नहीं है. वोटर साइलेंट होता है और विरोधी वोकल होता है. यह फर्क समझना होगा. यदि ऐसा नहीं होता तो लेफ्ट आज भारत की राजनीति से लेफ्ट न करता बल्कि उसका अस्तित्व बना रहता.
#ABVP
मनुष्य क्या है? विरासत में मिली पहचान, नौकरी-कारोबार से मिला रुतबा और पैसों से मिली हनक यदि न रहे तो वह क्या है? यह जानने के लिए 4 हजार करोड़ की संपत्ति के मालिक भाजपा विधायक पराग शाह ने पूरे एक दिन सड़कों पर भीख मांगी. उनका कहना है कि इस दौरान मुझे आभास हुआ कि मैं सिर्फ एक मनुष्य हूं. भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अकसर आत्म विस्मृत हो जाते हैं. यह मूल सवाल खुद से पूछते रहना चाहिए. इससे मन के एक कोने में मानवता हमेशा जागृत रहेगी. संवेदनशील मनुष्य बनने में मदद मिलेगी. जीवन के सही मूल्यों को हम समझ पाएंगे. तभी यह सवाल पूछ सकेंगे कि यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?
#ParagShah
5 days since my iPhone 15, worth Rs 91,000, was stolen at Mangal Market, under Noida Sector 142 Police Station. I filed complaint within minutes, yet @noidapolice continue to dilly-dally. Locals say 8–10 phones stolen weekly. No warning, no crackdown. How long will this continue?
शिखर पर पहुंचना आसान है, लेकिन बने रहना मुश्किल. मायावती ने अपनी कहानी से यही साबित किया है. वह उत्तर प्रदेश में 4 बार की मुख्यमंत्री रहीं और आखिरी कार्यकाल तो ऐसा रहा कि यमुना एक्सप्रेसवे, नोएडा-लखनऊ के विकास, सर्वजन की बात और दंगा मुक्त माहौल के लिए याद किया जाता है. फिर भी वह 2012 में सत्ता से विदाई के बाद जिस तरह सीमित होती गई हैं, उसने दलित समाज की राजनीति को हाशिये पर धकेला है. फिर उसी हाशिये से ऐसे अराजक तत्व निकले हैं, जो राज्य का माहौल खराब कर रहे हैं. आंबेडकरवाद के नाम पर सुधार नहीं बदले की चाह रखने वाले उभर रहे हैं. इसलिए मायावती उत्तर प्रदेश की जरूरत होते हुए भी जरूरत को समझ नहीं पा रही हैं. बहुजन की राजनीति में 'हाथी' की धमक कमजोर हो रही है और मायावती की 'माया' एक नाटकीय पारिवारिक ड्रामे में क्षीण हो रही है. बहनजी कभी राजनीति का सबसे बड़ा प्रश्न थीं और आज प्रहसन हैं. उनकी ढलान की यह यात्रा समाज के ताने-बाने पर भी असर डाल रही है.
#Mayawati #AkashAnand #BSP
स्वतंत्र भारद्वाज और निशु आजाद. दोनों ही चर्चापिपासु हैं. पेशे से इन्फ्लुएंसर हैं और हर हाल में वीडियो के व्यूज की तलब रखते हैं. ऐसे में जो कुछ हो रहा है, वह ठीक है. लेकिन एससी-एसटी एक्ट यहां भी खलनायक बनकर आया है. स्वतंत्र पर एससी-एसटी एक्ट लगाया गया है, जो पहली नजर में गलत है. इसलिए क्योंकि इनके बीच विवाद एक-दूसरे की जाति देखकर नहीं हुआ था. इसके अलावा निशु के पिता का भी कहना है कि दो मिनट पुलिस नहीं आती तो तुम्हारा बुरा हाल कर देते. इसके बाद भी किस तर्क से एससी-एसटी एक्ट लगाया गया है? यह सवाल है. यह ऐसा एक्ट है, जिसके नाम की धमकी सांसद चंद्रशेखर आजाद भी किसी अधिकारी को दे देते हैं. सोचिए कि जब कोई अधिकारी सुरक्षित नहीं है तो आम लोगों की क्या बिसात? इस एक्ट के प्रावधानों में यह जोड़ने की जरूरत है कि झूठा केस पाए जाने पर शिकायतकर्ता के खिलाफ ही एक्शन हो. इसके बिना यह दहेज उत्पीड़न एक्ट की तरह ही डरावना कानून है, जिसका आम लोग तो सपना देखकर भी घबरा जाएं. #स्वतंत्र_भारद्वाज
आप जब लोकप्रिय बने रहने के लिए गलत नैरेटिव को ही मजबूत करने लगते हैं तो आप विकास दिव्यकीर्ति हो जाते हैं. एक पॉडकास्ट में उन्होंने कहा कि भारत में महिलाओं को पढ़ने की आजादी तब मिली, जब सावित्री फुले ने स्कूल खोला. यह एक नैरेटिव है, लेकिन सत्य नहीं. वेदों की ऋचाओं को लिखने वालों में 22 स्त्रियां भी रही हैं. इन्हें ऋषिका अथवा ब्रह्मवादिनी कहा जाता था. इसके अतिरिक्त नालंदा में भी कुछ महिला स्कॉलर्स की पढ़ाई के प्रमाण मिलते हैं. यदि कुछ चिंता ही करनी है तो इस बात की होनी चाहिए कि विदेशी आक्रांताओं के आने के बाद महिलाओं की स्थिति में बदलाव कैसे आता चला गया. पहले जो सभ्यता सबके लिए बराबर अवसर वाली थी, उसमें वर्गभेद कैसे हुआ? इसलिए भारतीय सभ्यता को टारगेट करना कैसे उचित है, जिसके प्रारंभिक काल में ही महिलाओं की शिक्षा के मामले में अच्छी स्थिति थी. यही वह संस्कृति है, जहां शंकराचार्य और मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ में न्यायाधीश की भूमिका में मंडन मिश्र की पत्नी उभया भारती थीं. यह उनकी सशक्त स्थिति ही रही होगी कि उन्होंने निष्पक्षता दिखाते हुए पति के तर्कों को कमजोर बताया. अपनी कीर्ति को गलत नैरेटिव को मजबूत करके दिव्य बनाने की चाह में इन उदाहरणों और इतिहास को नहीं भूलना चाहिए.
#vikasdivyakirti #vikasdivyakirtisir
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिका, कनाडा में हिंदू संस्कृति के विषय में जो कहा है, वह भारत के सात्विक मूल्यों का विश्व स्तर पर परिचय कराने जैसा है. एक तरफ मोहन भागवत हिंदू संस्कृति, भारतीयता के मूल्यों से दुनिया को अवगत करा रहे हैं तो कुछ लोग एक गैर-प्रासंगिक और अंग्रेजों के फर्जी अनुवाद वाली पुस्तक के जरिए देश को नीचा दिखा रहे हैं. यही संस्कार का अंतर है. एक स्व के बोध को दुनिया से जोड़ रहा है और दूसरा संस्कार स्व के तिरस्कार में जुटा है.
#MohanBhagwat
चुनाव हमेशा वॉर ऑफ नैरेटिव होते हैं. अब इसे और ज्यादा रफ्तार मिल रही है. जाति, धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण तेज है तो वहीं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस किसी भी सूचना को आभासी माध्यमों पर और गति दे रहा है. लेकिन इसमें रिस्क भी है. जैसे रविशंकर प्रसाद का एक वीडियो बांकीपुर में वायरल हुआ और फिर फर्जी पाया गया. इसी तरह यूपी चुनाव में भी ऐसे कुछ वाकये हो सकते हैं. राजनीतिक दल लड़ते रहें, लेकिन नैरेटिव के लिए रचनात्मक संघर्ष में इसका ध्यान रखना जरूरी है कि कोई भी फर्जी सूचना या वीडियो समाज में बवाल का कारण न बने. इस लिहाज से उत्तर प्रदेश का यह चुनाव ऐतिहासिक होगा. यह चुनाव AI से पहले और उसके बाद के दौर के बीच में एक कड़ी है. AI के प्रचलन में तेजी के बीच यह पहला इलेक्शन है. #ArtificialIntelligence #aivideo
'इस्लाम दूसरे सभी धर्मों से बेहतर है. इस्लाम महान और मानवीयता से भरा धर्म है. कुरान सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं है, इसे कोई भी पढ़ सकता है. पैगंबर ने यह पूरी दुनिया के लिए दी है.' कर्नाटक के कांग्रेस नेता और मंत्री बसवराज रायरेड्डी का यह कहना है. उनकी राय पर आपकी क्या राय है? #Congress #RahulGandhi
टूटेंगे सारे भरम धीरे-धीरे...
एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक का कहना है कि कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं. यह भी बताया कि हमारी मंशा राहुल गांधी के हाथ से अनशन तोड़ने की थी. बदलाव के नाम पर कैसे अपनी जिंदगी बदली और शीशमहल तक अरविंद केजरीवाल पहुंचे थे. यह 12 साल पहले की ही बात है. सोनम वांगचुक की बात का मतलब है- फ्यूचर केजरीवाल इज लोडिंग...
#SonamWangchuk #wangchuk
पैसा से ज्यादा सेकुलर कुछ भी नहीं होता. ऐसे में जब कोई दुकान खोलता है तो जाति और धर्म नहीं देखता. फिर भी राहुल गांधी झूठ फैलाने में जुटे हैं. उनका कहना है- 'चाय की दुकानों पर दो तरह के कप होते हैं. एक प्लास्टिक के और एक कांच के. कांच के गिलासों में अन्य लोगों को चाय मिलती है और दलितों को प्लास्टिक के कपों में चाय दी जाती है.' सच यह है कि मांगने वाले को ही डिस्पोजल कप दिए जाते हैं. देश बहुत आगे बढ़ गया है, पर राहुल गांधी को ऐसा लगता है कि अब भी भारत में नेहरू और इंदिरा के जमाने वाला भेदभाव जारी है. झूठ बोले कौआ काटे सुना था, लेकिन ऐसा हो क्यों नहीं रहा.
#FakeNarrative @BJP4India@INCIndia@RahulGandhi
यह समय न्यूज का नहीं बल्कि नैरेटिव का है. इसलिए क्योंकि न्यूज के हजारों माध्यम हैं और उनमे से कुछ ही सत्य बताते हैं. अधिकतर फर्जी हैं और वे गलती से ऐसा नहीं करते बल्कि एक खास नैरेटिव के चलते ऐसा करते हैं. ऐसा ही एक झूठ सपा के नेता राजकुमार भाटी ने पिछले दिनों रखा था कि मदन मोहन मालवीय ने भीमराव आंबेडकर के हाथों का दिया पानी नहीं पिया था. इस पर मैंने तथ्य को गलत बताया और प्रमाण मांगा जो नहीं दे सके. मेरी तरह कई लोगों ने कॉमेंट किया तथ्य भी रखा था. मदन मोहन मालवीय का पूरा साहित्य संकलित करने वाले कुमार गुंजन अग्रवाल ने भी इसे गलत बताया. फिर भी उस शख्स ने पोस्ट को डिलीट नहीं किया. सोचिए कि कितनी ढिठाई से समाज मैं वैमनस्य पैदा करने के लिए महापुरुषों को भी ये लोग बदनाम कर रहे हैं. ये उन महामना मालवीय को बदनाम कर रहे हैं, जिन्होंने मंदिरों में सभी को प्रवेश मिले, इसके लिए आंदोलन किया था. पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने भी बताया था कि उनके पिता जगजीवन राम की मालवीय जी ने कैसे मदद की थी. फिर भी इतना झूठ बोला जा रहा है.
#narrative #fakenews #FakeNarrative
इतिहास में बहुत कुछ हुआ, लेकिन मनोहर कहानियां भी बहुत सी प्रचलित हैं. ऐसी ही एक मनोहर कहानी राजकुमार भाटी ने यह पेश कर दी है. चुनाव से पहले ऐसी फर्जी कहानियां बहुत आएंगी. इनका काम विभाजन करना है, पर समाज को सतर्क रहने की जरूरत है. इनसे मैंने फैक्ट मांगा है, दे नहीं पाएंगे. #RajKumarBhati
यह व्यक्ति कभी निराश नहीं करता. यह सही है कि हिजाब पहने या अबाया, यह किसी मुस्लिम लड़की की इच्छा हो सकती है. वह भी अपने घर या बाजार में. किसी स्कूल, कॉलेज में नहीं. पर यहां यह चर्चा इन्होंने क्यों नहीं की कि ऐसी मानसिकता कैसे बनी. इसी शख्स ने हिंदू युवतियों से बात करते हुए मनु स्मृति पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि इसके चलते हिंदू महिलाएं पिंजरे में हैं. कितना पतित है यह शख्स. हजारों विडंबनाओं में घिरा यह चेहरा घर जाकर आईने में खुद से नजरें कैसे मिलाता होगा? जब सोच के स्तर पर यह यह इतना पक्षपाती है तो कोई भूमिका मिली तो कैसे-कैसे कामों को अंजाम देगा, यह सोचकर भी चिंता होती है.
(यह वीडियो भारत जोड़ो यात्रा के दौरान का है, यहां प्रासंगिक हो गया है)
समाज की 'स्मृति' और मनु स्मृति
दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेने पर एक कॉलेज डिबेट के दौरान यह पता चला था कि मनु स्मृति नाम की कोई किताब है. इससे पहले घर, परिवार या फिर समाज में इसके बारे में चर्चा नहीं सुनी थी. वजह यही कि किसी भी परिवार में यह नहीं मिलती. इस तरह एक प्रायोजित पुस्तक को आधार बनाकर समाज पर थोपने की साजिश रची जाती रही है. आज ही एक साथी से बहस हुई तो वह मनु स्मृति के बारे में कहने लगे कि यह लागू हुई थी. इस पर मैंने गूगल सर्च की सलाह दी. सच यह है कि यह पुस्तक कभी भी और कहीं भी भारत में लागू नहीं हुई. भारत की परंपरा में रामायण, महाभारत, भगद्वगीता रमे हुए हैं. यही समाज की चेतन और अवचेतन स्मृति में हैं. याज्ञवल्क्य स्मृति को गुप्त काल में लागू किया गया था और उसकी चर्चा कोई नहीं करता. खैर, यह तो थी हिंदुओं की बात. अब सवाल है कि क्या अब्राहमिक मजहबों की मुख्य किताबों में क्या लिखा है और महिलाओं की स्थिति पर क्या विचार दिए गए हैं. इस पर कोई बात करेगा?