BJP के पूर्व सांसद सुभाष चंद्रा पर 22,000 करोड़ का कर्ज था.
अब सुभाष चंद्रा को सिर्फ 6.5 करोड़ रुपए देने हैं, बाकी का कर्ज रफा दफा हो गया.
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दूसरी तरफ देश में किसान 50 हजार के कर्ज की वजह से आत्महत्या कर लेते हैं, लेकिन देश की सरकार कभी उनका नहीं सोचती.
उन्नाव में एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रगान बज रहा था, लेकिन सतीश महाना चल दिए.
सतीश महाना BJP विधायक हैं और यूपी विधानसभा के स्पीकर हैं.
सवाल है- अब कितने चैनल इस अपमान पर डिबेट करेंगे?
@BoltaHindustan 2014 के बाद से साइंटिफिक टेंपरामेंट, education और स्पोर्टस डेवलप करने से वोट नहीं मिलता है ये सरकार जानती है इसलिए धर्म और धार्मिक कर्म कांड को ज्यादा करो जिससे भर भर कर वोट मिलता है।
छात्र आंदोलन की आड़ में यह काम किया गया है। झारखंड को पता ही नहीं चला कि छात्रों के भविष्य की बात करने वाले राज्य के भविष्य को गोल कर गए।यह राज्य बना ही इसलिए था कि इसके संसाधनों पर अधिकार हो, खनिज पर टैक्स हो, अब वही अधिकार ले लिया गया है। झारखंड की जनता को अब पता चलेगा भी तो कुछ नहीं होगा।
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में सर्वणों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण!!!!😡
जी हां सही सुन रहे है आप...
UPPSC द्वारा आयोजित होने वाली UP-PCS और RO-ARO सहित सभी द्विस्तरीय या त्रिस्तरीय परीक्षाओं में सवर्णों को सीधा 50 प्रतिशत का आरक्षण दिया जा रहा है।
UPPCS और RO-ARO जैसी नौकरियों के प्री परीक्षा में UN RESERVED सीटों पर केवल सवर्णों को ही पास किया जा रहा है,
ऐसे OBC,SC,ST अभ्यर्थी जिन्होंने पहले से कोई लाभ नहीं किया है उनको भी इन UN RESERVED सीटों पर पास नहीं किया जा रहा है।
OBC,SC,ST अभ्यर्थियों को उनके संबंधित कोटे क्रमशः 27 प्रतिशत,21 प्रतिशत,2प्रतिशत में ही सीमित कर दिया गया है।
यानी अगर OBC,SC,ST अभ्यर्थी UN RESERVED कैटगरी से ज्यादा नंबर प्राप्त करेगा तब भी उन्हें UN RESERVED कैटगरी में पास नहीं किया जाएगा,
बल्कि वो अभ्यर्थी अपने संबंधित कोटे में ही पास होंगे यानी सवर्णों को सीधा सीधा 50 प्रतिशत का आरक्षण दे दिया गया है।
माननीय मुख्यमंत्री @yadavakhilesh जी इस बात का संज्ञान लीजिए वरना 20270का विधानसभा चुनाव दूर नहीं है।
आपके पास चुनाव लड़ने के ऐसे भी मुद्दे है लेकिन आपके सलाहकार लोग न आपसे मिलने देते है न इन मुद्दों की जानकारी आप तक पहुंचने देते है।
आप भूल जाते है कि 2027 में इसी उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के कारण आपकी सरकार गई गई क्योंकि बीजेपी ने ये भ्रम फैला दिया था कि 86 में से 56 SDM यादव बने है।
लेकिन फिर भी आप लोग उसी लोक सेवा आयोग में हो रहे आरक्षण घोटाले को मुद्दा नहीं बना पा रहे है।
एक एयर एंबुलेंस मंगलवार को दोपहर में दिल्ली से वाराणसी पहुंची।
लैंडिंग के दौरान पायलट की नजर रनवे पर फैली गिट्टियों पर पड़ी।
पायलट ने तत्काल इसकी सूचना ATC को दी। इस घटना के बाद 2 घंटे एयरपोर्ट बंद रहा।
पता है- रनवे विस्तार का काम करने वाली कंपनी कौन सी है?
जवाब है: PNC Infratech
ये वही कंपनी है, जिसने कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे बनाया है।
This is belt treatment 🔥
Journalist –– Who do you support between Gandhi and Savarkar?
Prashant Kishor 🗿 – "How dare you took these two names in a single sentence? This is an insult to the father of the nation"
Godi anchor went silent 🤣🤣
#Bankipur chose the right man
"अमेरिका में पेटेंट है गौमूत्र"
- तोता रटंत त्रिवेदी
भाई आपको किसने रोका है गौमूत्र पीने से, पानी के जगह 4 लीटर गौमूत्र डेली पीजिये।
ऐसे नमूने भाजपा के इंटेलेक्चुअल कहलाते है!
आलमबदी आजमी 1996 से लेकर 2022 तक 5 बार विधायक निर्वाचित हुए थे – राजीव रंजन
आलमबदी आजमी अपने जीवन में पहली बार 2007 में बीएसपी नेता अगंद यादव से चुनाव हारे..!
आप किसी पहली बार के विधायक को देखोगे तो उनके साथ हाईक्रोस इनोवा फॉर्च्यूनर गाड़ी मिलेगी..!
लेकिन आलमबदी आजमी साब के पास 5 बार विधायक होने के बाद भी उनकी कोई कार नहीं थी..!
उन्होंने कभी अपने लिए नया मकान नहीं बनवाया, वो जीवन एक रोटी एक दूध की गिलास एक फल खाते थे...!
आलमबदी आजमी जी यदि 93साल की उम्र भी विधायक का पर्चा भरते तो 93 साल की उम्र में 6टी बार विधायक चुने जाते.....!
बात सही कही है जस्टिस भुयान ने। एक पूरा समुदाय नदी में जीवन बिताता है। नाव चलाता है। नाव में खाना बनाता है। मछली बनाता है। वहीं खाता है और सोता है। बचपन से देख रहा हूँ मछली बनाते और खाते हुए। जब मछली बनाते होंगे तो मटन और चिकन भी खाते होंगे। अगर राजनीति की यह सनक नहीं रूकी तो एकदिन मूर्खों की यह फ़ौज सारे मछुआरों और नाविकों को जेल में बंद करा देगी। बनारस में जब कुछ मुस्लिम युवाओं को जेल में डाला गया वहीं से यह शुरू हुआ। क्या किसी को यह नहीं पता होगा कि नाविक नाव में ही खाना बनाते हैं ।
إِنَّا لِلَّٰهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ
आज़मगढ़ के निज़ामाबाद विधानसभा क्षेत्र से विधायक जनाब आलम बदी आज़मी साहब के इंतक़ाल की ख़बर बेहद अफ़सोसनाक है।
उनका जाना मिल्लत, समाज और सियासत के लिए एक बड़ा ख़सारा है। उनकी ख़िदमात और ख़ुलूस को हमेशा याद रखा जाएगा।
अल्लाह तआला मरहूम की मग़फिरत फरमाए और तमाम अहल-ए-ख़ाना को सब्र-ए-जमील अता फरमाए। आमीन।
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं आज़मगढ़ की निज़ामाबाद विधानसभा से लोकप्रिय विधायक जनाब आलम बदी साहब का इंतकाल, अत्यंत दुखद!
दिवंगत आत्मा को शांति दें भगवान।
शोकाकुल परिजनों को यह असीम दुःख सहने का संबल प्राप्त हो।
भावभीनी श्रद्धांजलि!
समाजवादी आंदोलन के वरिष्ठ स्तंभ, आज़मगढ़ की निज़ामाबाद विधानसभा से पाँच बार विधायक रहे जनाब आलमबदी आज़मी साहब का निधन अत्यंत दुःखद और अपूरणीय क्षति है।
उन्होंने राजनीति को सत्ता का नहीं, बल्कि समाज सेवा का माध्यम बनाया। सादगी, ईमानदारी, संघर्ष और जनसमर्पण उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान रही। जीवन भर वे समाजवादी मूल्यों के प्रति अडिग रहे और आम लोगों के सुख-दुःख में हमेशा उनके साथ खड़े रहे। उनकी विनम्रता, सहृदयता और जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता ने उन्हें केवल आज़मगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश और देश में सम्मान दिलाया।
उनके जाने से समाजवादी आंदोलन ने अपना एक अनुभवी, कर्मठ और जनप्रिय अभिभावक खो दिया है। उनका जीवन, उनके आदर्श और संघर्ष की विरासत आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी। यह रिक्तता कभी भर नहीं सकेगी।
शोकाकुल परिवार, शुभचिंतकों और समर्थकों को इस असहनीय दुःख को सहन करने की शक्ति मिले।
आदरणीय आलमबदी साहब को विनम्र एवं भावभीनी श्रद्धांजलि।
अगर मैं आपसे कहूँ कि उत्तर प्रदेश के किसी विधायक की कल्पना कीजिए, तो शायद आपके मन में सत्ता का वैभव उभरे—लंबा काफ़िला, महँगी गाड़ियाँ, सुरक्षा का घेरा, आलीशान बंगला और जनता की भीड़ से दूर खड़ा एक चमचमाता शख़्स।
मगर राजनीति की इसी भीड़ में एक ऐसा नाम भी था, जिसने इस पूरी तस्वीर को झुठला दिया। पाँच बार विधायक बनने के बाद भी सरकारी बसों में सफ़र करने वाला, वर्षों तक एक साधारण कीपैड वाला फ़ोन इस्तेमाल करने वाला, बिना किसी तामझाम के गाँव-गाँव घूमने वाला, और जहाँ विकास कार्य चल रहा हो वहाँ ख़ुद फ़ीता लेकर उसकी नाप-जोख करने वाला जनप्रतिनिधि। वे थे जनाब आलमबदी आज़मी साहब।
सत्ता उनके लिए सुविधा का नहीं, ज़िम्मेदारी का नाम थी। कई बार वे स्कूटर पर बैठकर ही विधानसभा पहुँच जाते थे। आज़मगढ़ में किसी चाय की साधारण-सी दुकान पर लकड़ी की बेंच पर बैठे, लोगों का हालचाल पूछते या उनकी समस्याएँ सुनते हुए उन्हें देख लेना कोई असामान्य बात नहीं थी। उनके और जनता के बीच न सुरक्षा का घेरा था, न औपचारिकताओं की दीवार; केवल विश्वास का रिश्ता था।
कहते हैं, सत्ता इंसान को बदल देती है। मगर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो सत्ता का चरित्र बदल देते हैं। आलमबदी साहब उन्हीं विरले लोगों में थे। विधायक बनने के बाद उनके घर के दरवाज़े ऊँचे नहीं हुए, बल्कि आम लोगों के लिए और अधिक खुले रहे। उनके पास पहुँचने के लिए किसी सिफ़ारिश, किसी परिचय या किसी औपचारिकता की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। वे जनता से मिलने का समय नहीं निकालते थे, बल्कि जनता के बीच ही अपना समय बिताते थे।
उन्होंने समाजवाद को सत्ता के केंद्रों पर कम, अपने जीवन में अधिक जिया। उनके लिए राजनीति चुनाव जीतने की कला नहीं, बल्कि लोगों के दुख-दर्द को अपना मान लेने का संस्कार थी। वे जानते थे कि जनप्रतिनिधि की असली पहचान उसकी गाड़ी नहीं, उसके दरवाज़े पर आने वाले आख़िरी व्यक्ति के चेहरे पर लौटती उम्मीद होती है। शायद यही कारण था कि लोग उन्हें नेता कम, अपने घर का बड़ा मानते थे।
कहना भारी पड़ रहा है कि अब वे हमारे बीच नहीं रहे। लंबी बीमारी के बाद उनका इंतक़ाल हो गया। आज उनके जाने से केवल एक पाँच बार के विधायक का नहीं, बल्कि उस समाजवादी परंपरा का एक सशक्त अध्याय हमसे बिछड़ गया है, जिसमें सादगी प्रतिष्ठा थी, ईमानदारी पहचान थी और जनता ही सबसे बड़ा परिवार।
आलमबदी साहब का जीवन आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाता रहेगा कि समाजवाद केवल विचारधारा नहीं, बल्कि जीने का एक तरीका है; जहाँ पद से पहले इंसान और सत्ता से पहले समाज खड़ा होता है। आज़मगढ़ ही नहीं, समूचे प्रदेश की सियासत से आज जो एक अध्याय ख़ाली हो गया, उसे दुबारा लिखा जा पाना मुश्किल है।
विनम्र एवं भावभीनी श्रद्धांजलि।