@SerpentForce Ek janm kundali teen janmo ko chupaye rehti hai. Bas us level ka padhne wala chaiye. Aur pichle janmo ko jaana bahut bhari hota hai. Not everyone cups of tea.
One must gain prior knowledge of Vedanta by studying Prakarana Granthas & Upanishads under a Guru, before jumping to study advanced texts like Ashtavakra Gita, Yoga Vasistha, etc. The text is actually a final-stage pointer, not a beginner's guide.
My grandparents never went to school, yet they were the most voracious readers I knew. I have inherited their treasure- a massive library which also includes almost every single issue of ‘Kalyan’ by @GitaPress
As Kalyan enters its 100th year, calling them the ‘best’ at preserving and propagating Sanatan Dharma is truly an understatement.
मुझे धार्मिक स्थलों के पर्यटन स्थल बन जाने से परेशानी है। मुझे वहां VVIP नहीं चाहिए, मुझे वहां स्पेशल दर्शन नहीं चाहिए। मुझे वहां अभद्र वस्त्र पहने रील बनाते मवाली नहीं चाहिए। मुझे उन पुराने मंदिरों में वही ऊर्जा चाहिए जो पंद्रहवीं या सोलहवीं शताब्दी में थी। स्थलों को बदलना नहीं सुधरना चाहिए।
💕
मेरा तो यही मानना है कि भारत के धार्मिक स्थल आजकल तीर्थ से ज्यादा पर्यटन स्थल बन चुके हैं। जहाँ कभी केवल श्रद्धा और मौन की ऊर्जा बहती थी, वहाँ अब भीड़, चमक-दमक, होटल, शॉपिंग और इंस्टाग्राम रील्स का शोर है। मैने अपनी यात्राओं में पाया है कि पवित्रता अब धीरे-धीरे खो रही है, और उसकी जगह कॉमर्शियलाइजेशन ने ले ली है।
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, अयोध्या राम मंदिर, केदारनाथ, सोमनाथ, तिरुपति, ये सभी जगहें अब मेगा-प्रोजेक्ट्स का हिस्सा हैं। करोड़ों पर्यटक आते हैं, अर्थव्यवस्था को बूस्ट मिलता है, लोकल लोग होटल, गाइड, प्रसाद, गारमेंट्स, फोटो बेचकर कमाते हैं। लेकिन वह गहन आध्यात्मिक ऊर्जा जो सदियों से वहाँ बसी थी, अब वह कमजोर पड़ती जा रही है। लोग अब "दर्शन" कम, "चेक-इन" ज्यादा करते हैं।
लगभग सभी प्रसिद्ध मंदिर बेवजह की तिरंगी लाइट्स, LED स्क्रीन्स और ड्रोन शो से सजे है। सोमनाथ में ड्रोन्स से मंदिर की 3D इमेज बनाना, अयोध्या में भव्य लाइट-एंड-साउंड स्पेक्टेकल, काशी में गंगा आरती के साथ ड्रोन कैमरे घूमना, ये सब दिखने में भव्य है, लेकिन क्या यह वही पवित्र अनुभव देता है जो पहले एक साधारण भक्त को मिलता था?
(अब पहले और अभी की गंदगी पर कमेंट मत करिएगा। अभी भी स्थिति केवल सोशल मीडिया पर ही सुधरी है)
जहाँ कभी सिर्फ घंटियों और मंत्रों की ध्वनि होती थी, वहाँ अब लेजर लाइट्स का तमाशा है। यह धर्म को एंटरटेनमेंट में बदलने जैसा है।सबसे दुखद बात यह है कि ये धार्मिक स्थल समाप्ति की ओर अग्रसर लगते हैं।
मैं भौतिक रूप से समाप्ति की बात नहीं, बल्कि मंदिरों के अपनी मूल पवित्रता और ऊर्जा के संदर्भ में बात कह रहा हूं। भीड़ इतनी बढ़ गई है कि ध्यान लगाना मुश्किल, शोर इतना कि मंत्र सुनाई नहीं देते, और कमर्शियल दबाव इतना कि पुजारी भी अब "सर्विस प्रोवाइडर" जैसे लगते हैं।
अब लोग बस आते हैं, फोटो खींचते हैं, खरीदारी करते हैं, और चले जाते हैं। बिना उस आंतरिक परिवर्तन के जो सदियों से तीर्थ का उद्देश्य रहा है।
और यह सब एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है।
क्या हम धर्म को बचा रहे हैं या उसे ब्रांड बना रहे हैं? विकास जरूरी है, सुविधा भी, लेकिन अगर पवित्रता की कीमत पर हो तो वह विकास नहीं, विनाश है। शायद समय आ गया है कि हम फिर से सोचें तीर्थ पर्यटक स्पॉट नहीं, आत्मा का शांत आश्रय होना चाहिए।
किन्तु यह सरकार तो .....