मुझे दुःख इस बात का नहीं है कि तुम छोड़ के चले गए। दुःख इस बात का है कि तुमनें जो वादे किए थे उन वादों का क्या, उन शब्दों और उन जज़्बातों का क्या और उन ख्वाब का क्या जो हमने एक दूसरे के साथ देखे थे। जब तुमनें पहली दफ़ा मेरी माँ को मां बोला था तब मैं कितना खुश हुआ था, लगा था, कोई हैं जो मुझे और मेरी माँ को संभाल सकता हैं। मगर वक़्त ने वक़्त ऐसा बदला की आज तुम्हें देखे 2 वर्ष से ज़्यादा हो गया है। पर आज भी तुम्हारी तस्वीरों से बातें करना अच्छा लगता हैं। शायद यहीं जुर्म है कि तुमसे सच्ची मोहब्बत की थीं....
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बहुत कुछ कहने के बजाय अक्सर चुप रह जाता है। वही जो अपनी डायरी के पन्नों पर तुम्हारे नाम के आसपास अनगिनत अनकहे शब्द लिखता है। वही जो दुनिया से लौटकर अपने एकांत में बैठता है, तो उसे तुम्हारी स्मृति किसी प्रार्थना की तरह घेर लेती है।
जानती हो, मैं चुपचाप तुम्हारे भीतर रहता हूँ, मगर सच मानों तुम्हें अपने भीतर रखते-रखते, मैं स्वयं भी अपने भीतर पहले जैसा नहीं रहा। मेरे मौन में अब तुम्हारी आहट है, मेरी तन्हाई में तुम्हारी छाया है, मेरी प्रार्थनाओं में तुम्हारा मंगल है और मेरे हृदय में एक ऐसा कोना है, जहाँ समय की पहुँच भी बहुत धीमी पड़ जाती है।
वहाँ तुम हो और तुम्हारे होने की यह अनुभूति है, जिसे मैं किसी नाम, किसी वचन, किसी परिभाषा में बाँधना नहीं चाहता।
बस इतना चाहता हूँ कि जब कभी तुम अपने हृदय की गहराइयों में झाँको, तो तुम्हें वहाँ प्रेम का एक छोटा सा, निश्छल दीप अवश्य दिखाई दे जो तुम्हारे लिए जलता है, मगर तुम्हें अपनी रौशनी में बाँधना नहीं चाहता। जो तुम्हें चाहता है, मगर तुम्हारी राहों का स्वामी नहीं बनना चाहता। जो तुम्हारे भीतर रहना चाहता है, मगर तुम्हारी आत्मा की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए।
शायद इसी को प्रेम कहते हैं…किसी के भीतर इस तरह बस जाना कि उसके जीवन में अपनी उपस्थिति का शोर न हो, मगर अपने होने की कोमलता बनी रहे।
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राघवेन्द्र चतुर्वेदी 🥰
(एक लड़का जो हर कहानी में खुद को ढूंढता है)