दिल्ली में एक 17 साल की बच्ची के साथ क्रूरता की सारी हदें पार कर दी गईं और उसके बाद उसे बर्बरता से मार डाला गया। कुछ ही दिनों पहले एक और नाबालिग लड़की का बलात्कार किया गया।
देश में महिला सुरक्षा के लिए कोई ज़िम्मेदारी लेने को तैयार ही नहीं है - महिला��ं के विकास की सिर्फ़ खोखली बातें की जाती हैं। सैकड़ों महिलाओं पर अत्याचार होते हैं, हिंसा होती है मगर अपराधियों पर ठोस कार्रवाई की वे उम्मीद नहीं कर सकतीं - FIR दर्ज तक नहीं होते।
समाज और सरकार दोनों, महिलाओं को सुरक्षा, स्वतंत्रता और समानता का अधिकार देने में पूरी तरह से विफल हैं।
उप्र में सरकार नहीं, सत्ता सजातीयवाद चल रहा है।
सत्ता सजातीय अपनी हनक दिखाने के लिए पीडीए पर लगातार प्रहार कर रहे है। पीडीए पर किया गया हर आक्रमण, भाजपा को सदैव से सत्ता से दूर कर देगा।
कहा जा रहा है कि पंकज झा अभी भाजपा के एक मंत्री से पेम���ंट लेकर निकले हैं। कहे जाने से क्या होता है भाई। आप कथित तौर पर पत्रकार हैं, अपना तो बताइए कि ये कैसे लोकतंत्र की हत्या है, कैसे भाजपा वही गुंडागर्दी कर रही है जिसका आरोप वो TMC पर लगाती थी।
नंदीग्राम उपचुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान की गिरफ्तारी कोई संयोग नहीं, राजनीतिक प्रतिशोध है - लोकतंत्र की हत्या है।
BJP का निष्पक्ष चुनाव में भरोसा ही नहीं - इसलिए कभी वोट चोरी, कभी सरकार चोरी और कभी पार्टी चोरी से सत्ता बचाना चाहती है।
वो चुनाव नहीं लड़ना चाहते, चुनावी मुकाबला ही खत्म कर देना चाहते हैं।
कांग्रेस न डरेगी, न झुकेगी।
हम लड़ेंगे भी, जीतेंगे भी।
दिल्ली में 17 साल की युवती के साथ गैंगरेप हुआ, उसकी हत्या कर शव खुले मैदान में फेंक दिया गया। राजधानी में इतनी बड़ी दरिंदगी और पुलिस को कई दिनों तक भनक नहीं लगती।
दुर्भाग्य है कि दिल्ली आज राजधानी नहीं, महिलाओं के लिए हर दिन की खौफनाक कहानी बनकर रह गई है।
अमित शाह जी, दिल्ली पुलिस आपके अधीन है। महिला सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
या दिल्ली पुलिस का काम सिर्फ़ आम नागरिकों को डराना-धमकाना रह गया है? क्योंकि अपराधी तो बेखौफ घूम रहे हैं।
दरिंदों की तत्काल गिरफ्तारी हो, कड़ी कार्रवाई और सज़ा मिले, और इस आपराधिक गैर-जिम्मेदारी की जवाबदेही तय हो।
महिलाओं की सुरक्षा के बिना भारत आगे नहीं बढ़ सकता।
अब तक भाजपा राजनीति का अपराधीकरण कर रही थी अब भाजपा राजनीति का ‘अधिकारीकरण’ कर रही है।
जिलाधिकारी महोदय ‘दीये व उसके तेल-बाती व लगवाई’ के ख़र्चे का हिसाब-किताब सार्वजनिक करें कि ये उनके व्यक्तिगत खाते से किया गया ख़र्चा है न कि जनता के टैक्स का पैसा है।
पहले केयर फ़ंड और अब चापलूसी फ़ंड… इनकी खाता-बही दिखाई जाए��� यही जनता की डिमांड है।
दीये जलाने की मजबूरी में न जाने कितनों के दिल जले होंगे। वैसे उतने दीये नहीं जले या जलने नहीं दिये गये, जितने दीयों की संख्या से लखनऊवालों का रिकॉर्ड टूट जाता। जो लोग दीयों के लिए भी लड़ रहे हैं, वो रोशनी क्या लाएंगे?
वैसे UP 32 नंबर से शुरू हुई जो 500 बाइक कहीं भेजी जा रही हैं क्या उनसे विदेशी मुद्रा से ख़रीदे गये तेल की बर्बादी नहीं होगी? केवल खानेवाले तेल क��� प्रयोग कम करने की अपील की गई है या गाड़ी वाले तेल की भी या लालटेन व दीये के तेल की भी?
पहले शिवसेना, फिर NCP और अब तृणमूल कांग्रेस।
हर बार एक ही पैटर्न - BJP और चुनाव आयोग मिलकर एक पार्टी को तोड़ते हैं। फिर उसका चुनाव चिन्ह छीन लिया जाता है।
जब पूरी की पूरी ��ार्टी चोरी हो सकती है, तो करोड़ों भारतीयों के वोट चोरी होना भी हैरानी की बात नहीं।
वोट चोरी। सरकार चोरी। अब पार्टी चोरी - ये हमारे लोकतांत्रिक पतन के प्रतीक बन गए हैं।
ECI की संवैधानिक ज़िम्मेदारी जनादेश की रक्षा करना है - मगर उल्टा वो उन ताकतों की मदद कर रहा है, जो जनता के फैसले को ही पलट देते हैं।
यह लड़ाई सिर्फ़ ममता बनर्जी जी की नहीं है। यह हर राजनीतिक दल, हर मतदाता की लड़ाई है जो स्वतंत्र औ�� निष्पक्ष चुनाव चाहता है।
क्या कल के 'दीया जलाओ' महोत्सव की NASA के किसी सैटेलाइट की कोई तस्वीर सामने आई है..?? आई हो तो सूचित करें..देश जानना चाहता है कि अभी कितने प्रतिशत बचे हैं..जैसे कि हम लोग बहुत पहले से कहता आ रहा है..��रेंदर अब इस देश का बिता हुआ बुरा वक़्त है..!!
नरेंदर ने आज अपनी बुरी तरह भद पिटवा ली है…
ये जो दीये जलाए गए, ये जो भव्य आयोजन किए गए, और इन आयोजनों पर जो करोड़ों रुपये खर्च किए गए..इन सबके पीछे आखिर पैसा किसका है? यह जनता के टैक्स से आया सरकारी धन है..
सरकारी धन का इस्तेमाल किसी भी आयोजन में किया जाए, तो उससे जुड़े खर्च, प्राथमिकताएँ और उसके सार्वजनिक लाभ पर सवा�� उठना स्वाभाविक है। जब बड़ी रकम ऐसे आयोजनों पर खर्च होती है, तब जनता यह जानना चाहती है कि इस खर्च का वास्तविक लाभ उसे क्या मिला और क्या यही पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, बिजली, पानी या दूसरी बुनियादी जरूरतों पर खर्च किया जा सकता था..
राजनीतिक रूप से भी ऐसे खर्चों का असर महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि जनता को यह महसूस होता है कि सरकार ने सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक छवि या प्रचार को मजबूत करने के लिए किया, तो इससे सरकार के प्रति असंतोष पैदा हो सकता है। बीजेपी के लिए चुनौती यह होगी कि वह इन खर्चों की उपयोगिता, पारदर्शिता और सार्वजनिक लाभ को जनता के सामने स्पष्ट रूप से रखे..
सवाल सिर्फ दीयों या किसी भव्य आयोजन का नहीं है। असली सवाल है..जनता के पैसे का इस्तेमाल किस प्राथमिकता के आधार पर किया ग���ा, कुल कितना खर्च हुआ, किस मद में खर्च हुआ और उससे आम नागरिक को क्या ठोस फायदा मिला..??
लोकतंत्र में जनता को इन सवालों के जवाब मांगने का पूरा अधिकार है। सरकारी धन जनता का धन है, और उसके इस्तेमाल का हिसाब सरकार को जनता के सामने देना चाहिए…
नरेंदर ने आज अपनी बुरी तरह भद पिटवा ली है…
ये जो दीये जलाए गए, ये जो भव्य आयोजन किए गए, और इन आयोजनों पर जो करोड़ों रुपये खर्च किए गए..इन सबके पीछे आखिर पैसा किसका है? यह जनता के टैक्स से आया सरकारी धन है..
सरकारी धन का इस्तेमाल किसी भी आयोजन में किया जाए, तो उससे जुड़े खर्च, प्राथमिकताएँ और उसके सार्वजनिक लाभ पर सवाल उठना स्व��भाविक है। जब बड़ी रकम ऐसे आयोजनों पर खर्च होती है, तब जनता यह जानना चाहती है कि इस खर्च का वास्तविक लाभ उसे क्या मिला और क्या यही पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, बिजली, पानी या दूसरी बुनियादी जरूरतों पर खर्च किया जा सकता था..
राजनीतिक रूप से भी ऐसे खर्चों का असर महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि जनता को यह महसूस होता है कि सरकार ने सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक छवि या प्रचार को मज���ूत करने के लिए किया, तो इससे सरकार के प्रति असंतोष पैदा हो सकता है। बीजेपी के लिए चुनौती यह होगी कि वह इन खर्चों की उपयोगिता, पारदर्शिता और सार्वजनिक लाभ को जनता के सामने स्पष्ट रूप से रखे..
सवाल सिर्फ दीयों या किसी भव्य आयोजन का नहीं है। असली सवाल है..जनता के पैसे का इस्तेमाल किस प्राथमिकता के आधार पर किया गया, कुल कितना खर्च हुआ, किस मद में खर्च हुआ और उससे आम नागरिक को क्या ठोस फायदा मिला..??
ल��कतंत्र में जनता को इन सवालों के जवाब मांगने का पूरा अधिकार है। सरकारी धन जनता का धन है, और उसके इस्तेमाल का हिसाब सरकार को जनता के सामने देना चाहिए…
आडवाणी जी,मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता कल सुबह मोदी जी के इस्तीफे का इंतजार करेंगे..क्योंकि उनको 75 वर्ष का बोल के राजनीति से नेपथ्य में भेज दिया गया था…
नरेंदर ने आज अपनी बुरी तरह भद पिटवा ली है…
��े जो दीये जलाए गए, ये जो भव्य आयोजन किए गए, और इन आयोजनों पर जो करोड़ों रुपये खर्च किए गए..इन सबके पीछे आखिर पैसा किसका है? यह जनता के टैक्स से आया सरकारी धन है..
सरकारी धन का इस्तेमाल किसी भी आयोजन में किया जाए, तो उससे जुड़े खर्च, प्राथमिकताएँ और उसके सार्वजनिक लाभ पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जब बड़ी रकम ऐसे आयोजनों पर खर्च होती है, तब जनता यह जानना चाहती है कि इस खर्च का वास्तविक लाभ उसे क्या मिला और क्या यही पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, बिजली, पानी या दूसरी बुनियादी जरूरतों पर खर्च किया जा सकता था..
राजनीतिक रूप से भी ऐसे खर्चों का असर महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि जनता को यह महसूस होता है कि सरकार ने सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक छवि या प्रचार को मजबूत करने के लिए किया, तो इससे सरकार के प्रति असंतोष पैदा हो सकता है। बीजेपी के लिए चुनौती यह होगी कि वह इन खर्चों की उ���योगिता, पारदर्शिता और सार्वजनिक लाभ को जनता के सामने स्पष्ट रूप से रखे..
सवाल सिर्फ दीयों या किसी भव्य आयोजन का नहीं है। असली सवाल है..जनता के पैसे का इस्तेमाल किस प्राथमिकता के आधार पर किया गया, कुल कितना खर्च हुआ, किस मद में खर्च हुआ और उससे आम नागरिक को क्या ठोस फायदा मिला..??
लोकतंत्र में जनता को इन सवालों के जवाब मांगने का पूरा अधिकार है। सरकारी धन जनता का धन है, और उसके इस्तेमाल का हिसाब सर���ार को जनता के सामने देना चाहिए…
इस बात की संभावना कम ही है कि लोग नरेंदर के जन्मदिन पर दीये जलाएंगे..ऐसा सिर्फ़ उनकी पार्टी के बंधुआ मज़दूर ही करेंगे..अब नरेंदर अपने जन्मदिन पर जनता का पैसा बर्बाद करेंगे और जश्न मनाएंगे..याद रखिए, यह वही व्यक्ति हैं जो खुद को "नॉन-बायोलॉज���कल" बताते हैं..और जनता को पैसे खर्च न करने की सलाह भी देते हैं कि जनता सोना न ख़रीदे, शादी न करे, विदेश न घूमे आदि.. नरेंदर को यह समझना चाहिए कि देश ने उनकी बात सुनना बहुत पहले ही बंद कर दिया है..यह उत्सव भी फ्लॉप ही रहेगा..और यह नाटक भी लोगों के बीच कोई खास असर नहीं छोड़ पाएगा…#राष्ट्रीय_बेरोजगार_दिवस
इस बात की संभावना कम ही है कि लोग नरेंदर के जन्मदिन ���र दीये जलाएंगे..ऐसा सिर्फ़ उनकी पार्टी के बंधुआ मज़दूर ही करेंगे..अब नरेंदर अपने जन्मदिन पर जनता का पैसा बर्बाद करेंगे और जश्न मनाएंगे..याद रखिए, यह वही व्यक्ति हैं जो खुद को "नॉन-बायोलॉजिकल" बताते हैं..और जनता को पैसे खर्च न करने की सलाह भी देते हैं कि जनता सोना न ख़रीदे, शादी न करे, विदेश न घूमे आदि.. नरेंदर को यह समझना चाहिए कि देश ने उनकी बात सुनना बहुत पहले ही बंद कर दिया है..यह उत्सव भी फ्लॉप ही रहेगा..और यह नाटक भी लोगों के बीच कोई खास असर नहीं छोड़ पाएगा…