◆ एक सुकून की तलाश सभी को है, उस सुकून की जो मन चाहता है | सब-कुछ होने के नाद भी लगता है कुछ कमी सी है, और उस कमी से ऐसा लगता है कि यह जग सुना सा है, हम जिंदा होकर भी जिंदा नही है, मात्र एक देह भर है जो न चाहते हुए भी एक मशीन की भाँति चल रही है,
यह मानव मन है
आहत हो ही जाता है-
कितना भी समझा को,
कुछ भी कर लो-
जहाँ एक उम्मीद होती है
यहाँ तो अब सब ठीक होगा !
पर उलट वहाँ
वही होता है जिसे
सोच भी नही सकते |
कुछ इस तरह के
लगातार घटित होते हादसे
जीवन को
जीवन नही रहने देते-
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अशोक चौहान