उत्तर प्रदेश की जनसंख्या में 9% की हिस्सेदारी रखने वालों यादवों के वोट के बिना बीजेपी की इतनी बड़ी जीत संभव नही थी,
यादवों ने भी अब जातिवाद को छोड़कर राष्ट्रवाद व विकास के लिए @narendramodi जी को वोट दिया है।
@yadavakhilesh के लिए एक नसीहत;- यादवों के ठेकेदार नही हैं आप।
जन्मदिन की शुभकामनाएं प्रदीप 🎂 @thepradeep01 आने वाला वर्ष तुम्हारे लिए वह सब कुछ लेकर आए जिसके लिए तुम काम कर रहे हों। तुम्हारा जन्मदिन खुशी और हँसी से भरा हो🎊🎉🥳
जय श्री कृष्णा। राधे राधे
@sudhir_bop @MoniYaduvanshii@Panchpradhan_ अकाउंट तो अब भी डोरमेंट ही रहेगा बस ये सरपंच है कुछ भी लिखेगा तो सीधा व्हाट्स एप पर लिंक चेप कर तब तक मेसेज करता रहेगा जब तक आरटी न कर दो
स्त्रोत- अमीर अली रिजवी द्वारा लिखित "फ्रीडम स्ट्रगल इन उत्तर प्रदेश" (प्रथम खंड) व कन्हैया सिंह द्वारा लिखित "उत्तर प्रदेश 1857 का स्वतंत्रता संग्राम"
बोधू सिंह जैसे लाखों सिपाहियों ने राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर देशहित में अपने प्राणों का उत्सर्ग किया हजारों गद्दारों की तरह ये सैनिक भी अंग्रेजों के साथ मिलकर पुरस्कार प्राप्त कर सकते थे, लेकिन उन्होंने पीड़ा संघर्ष और आत्मोसर्ग का कंटकाकीर्ण मार्ग चुना।
माधो सिंह ने बोधू के ���हने पर लेविस, हचिसन व 22वीं के कर्नल को गोली मारी...उन्होंने लगभग आठ लाख का खजाना लूटा....बागी सेना का नेतृत्व किया और सत्तीचौरा घाट के हत्याकाण्ड में शामिल रहे अतः उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई।
बोधू सिंह के भाई व पुत्र भी इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।
बोधू सिंह से जुड़े ट्रायल की फाइल के सारे बयान 10 जनवरी से 10 फरवरी 1860 के हैं,स्पष्ट है कि वे जनवरी 1860 में पकड़े गये।
उन पर लखनऊ के असिस्टेंट जनरल सुपरिटेण्डेण्ट कैप्टन जे०एच० चेम्बरलिन की कोर्ट में 'सरकार बनाम बोधू' के नाम से मुकदमा चला।
सैनिकों ने अंग्रेजो पर हमला बोल दिया नावों में आग लगा दी कुछ गोली से कुछ तलवारो से और कुछ जलकर मरे।
17वें के सैनिक फतेहपुर, औग-पांडु नदी, अहिरवाँ (कानपुर) में नाना की सेना के साथ मिलकर लड़ते रहे।
17 जुलाई 1857 को हैवलॉक का कब्जा हो गया।
बोधू सिंह ने नेतृत्व वाली सेना फैजाबाद के पड़ाव के बाद उन्नाव होते हुए कानपुर आ गई। बोधू सिंह ने पत्राचार के माध्यम से नाना साहेब से संपर्क साधा।
27 जून 1857 को सत्तीचौरा घाट की योजना बनी, उस दिन 40 नावें अंग्रेजो को लेकर जाने को तैयार थी तभी बिगुल बजा और देसी नाविक भाग लिए।
फैजाबाद में बगावत के बाद भाग रहे अंग्रेजों की दो नावें 17वीं के पड़ाव के पास आ गई जिस पर सैनिकों ने फायरिंग शुरू कर दी व कमिश्नर कर्नल गोल्डसे मारा गया।
तीसरी नाव टांडा की तरफ निकली जिस पर 17वीं ने हमला किया लेकिन हसन खान ने अंग्रेजो को बचाया व उन्हे राजा मान सिंह ने शरण दे दी।