वो ज़माना गुज़र गया कब का
था जो दीवाना मर गया कब का
ढूँढता था जो इक नई दुनिया
लूट के अपने घर गया कब का
वो जो लाया था हम को दरिया तक
पार अकेले उतर गया कब का
उस का जो हाल है वही जाने
अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का
ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा
अब कहाँ है बिखर गया कब का
@Rekhta
बताऊँगा कबूतर-तीतरों की क्या ज़रूरत है,
तू पहले ये बता चिड़िया-घरों की क्या ज़रूरत है!
वो चिड़िया के परों को काटने के बाद ये बोला—
इसे दाना मयस्सर है, परों की क्या ज़रूरत है!
ज़िंदा रहना है तो हर साँस हुकूमत से न माँग,
अस्ल मुंसिफ़ है ख़ुदा, रहम अदालत से न माँग!ज़िंदगी अगर भीख है तो न मिलना बेहतर,
और अगर हक़ है तो इतनी शराफत से न माँग!!
@Perwejhamid
ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना
पाँव बख़्शें हैं तो तौफ़ीक़-ए-सफ़र भी देना
गुफ़्तुगू तू ने सिखाई है कि मैं गूँगा था
अब मैं बोलूँगा तो बातों में असर भी देना
मैं तो इस ख़ाना-बदोशी में भी ख़ुश हूँ लेकिन
अगली नस्लें तो न भटकें उन्हें घर भी देना
@Perwejhamid
तेरे इर्द-गिर्द वो शोर था मेरी बात बीच में रह गई
न तू सुन सका न मैं कह सका मेरी बात बीच में रह गई
तेरी खिड़कियों पर झुके हुए कई फूल थे मुझे देखते
चाँद तेरी छत पर ठहर गया मेरी बात बीच में रह गई
मुझे वहम था कि नही खुल सकेगी मेरी जबां तेरे आगे
सो हकीकतन भी वही हुआ मेरी बात बीच में रह गई
🖤🌸
- अज़मद इस्लाम अज़मद
चन्द ख़्वाबों के अता करके उजाले मुझको
कर दिया वक्त ने दुनिया के हवाले मुझको।
जिनको सूरज मेरी चौखट से मिला करता था
अब वो ख़ैरात में देते हैं उजाले मुझको
- नईम अख़्तर
चंद गज़ की शहरियत किस काम की
उड़ना आता है तो छत किस काम की
जब तुम्हें चेहरे बदलने का है शौक़
फिर तुम्हारी असलियत किस काम की
पूछने वाला नहीं कोई मिजाज़
इस क़दर भी ख़ैरियत किस काम की
हम भी कपड़ों को अगर तरजीह दें
फिर हमारी शख़्सियत किस काम की
🖤😎
- Mehshar Afridi